चेन्नई में फ्लू, डेंगू और सांस संक्रमण की लहर, अस्पतालों में बेड के लिए 12 घंटे का इंतजार
सारांश
मुख्य बातें
चेन्नई के निजी अस्पतालों में फ्लू, डेंगू और सांस से जुड़े संक्रमणों के मामलों में अचानक तेज़ उछाल आया है, जिससे 22 सितंबर 2026 तक ओपीडी में लंबी कतारें, वार्ड भरे हुए और भर्ती के लिए घंटों का इंतजार जैसी स्थिति बन गई है। इमरजेंसी में आने वाले कुछ मरीजों को बेड मिलने में 12 घंटे तक का इंतजार करना पड़ रहा है।
मुख्य घटनाक्रम
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, वार्डों पर दबाव इतना अधिक है कि आईसीयू से जनरल वार्ड में स्थानांतरित होने वाले मरीजों को भी कमरों की कमी के कारण देरी झेलनी पड़ रही है। ओपीडी में प्रतीक्षा समय भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ गया है, जो शहर के स्वास्थ्य ढाँचे पर बढ़ते बोझ का संकेत है।
चेन्नई के एक निजी अस्पताल की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. आर. राजम्मल ने बताया कि वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा, 'जब मरीज इमरजेंसी में आते हैं तो कमरे या बेड के लिए 12 घंटे तक इंतजार करना पड़ रहा है। इसी तरह आईसीयू से बाहर शिफ्ट होने वाले मरीजों को भी जनरल वार्ड में बेड के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। ओपीडी में भी इंतजार का समय काफी बढ़ गया है।'
संक्रमण के कारण और लक्षण
डॉक्टरों के अनुसार, मौजूदा मामलों में बड़ा हिस्सा रेस्पिरेटरी सिंकाइटियल वायरस (RSV), एडेनोवायरस, राइनोवायरस और पैराइन्फ्लुएंजा जैसे वायरसों के कारण हो रहा है। इसके अलावा इन्फ्लुएंजा, जिसमें H1N1 भी शामिल है, और डेंगू के मामले भी बड़ी संख्या में सामने आ रहे हैं।
मरीजों में तेज़ बुखार, गले में खराश, जुकाम, लगातार खाँसी, बदन और पैरों में तेज़ दर्द, सीने में तकलीफ, थकान तथा भूख न लगने जैसे लक्षण दर्ज किए जा रहे हैं। बच्चों और किशोरों में लंबे समय तक बुखार और अत्यधिक थकान देखी जा रही है। कुछ बच्चों में बुखार के कारण घबराहट या भ्रम की स्थिति भी बनी है। कुछ मरीजों को नेबुलाइजेशन या फ्लूइड थेरेपी की आवश्यकता पड़ रही है, जिससे अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या और बढ़ रही है।
किसे है ज़्यादा खतरा
डॉक्टरों का कहना है कि ज़्यादातर संक्रमण हल्के हैं और मरीज दवा, आराम तथा पर्याप्त जलापान से ठीक हो रहे हैं। हालाँकि, बुजुर्गों और पहले से किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए ये संक्रमण अधिक गंभीर रूप ले सकते हैं। कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों में मृत्यु के मामले कम हैं, किंतु जोखिम बना हुआ है — ऐसा चिकित्सकों का कहना है।
यह ऐसे समय में आया है जब मानसून के बाद का मौसम परंपरागत रूप से वेक्टर-जनित और श्वसन रोगों में वृद्धि का काल रहा है। गौरतलब है कि चेन्नई में पिछले कुछ वर्षों में इसी अवधि में डेंगू और फ्लू के मामले बढ़ते रहे हैं, और इस बार RSV तथा एडेनोवायरस की सहवर्ती उपस्थिति ने स्वास्थ्य तंत्र पर दोहरा बोझ डाल दिया है।
विशेषज्ञों की सलाह
डॉक्टरों ने नागरिकों से अपील की है कि बुखार को नज़रअंदाज़ न करें और लक्षण बने रहने पर स्वयं दवा लेने से बचें। हाथों की नियमित सफाई, संक्रमित व्यक्तियों से उचित दूरी और भीड़-भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनने की सलाह दी गई है।
आगे की स्थिति
फिलहाल चेन्नई के अस्पताल बढ़ती माँग के अनुरूप क्षमता बढ़ाने की कोशिश में हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौसमी परिस्थितियाँ बनी रहीं तो अगले कुछ हफ्तों तक यह दबाव जारी रह सकता है। समय पर चिकित्सा परामर्श और रोकथाम के उपायों को अपनाकर अस्पतालों पर बोझ कम किया जा सकता है।