7 नवंबर 2026
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पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उबाल: बिजली-गेहूं से शुरू आंदोलन ने पाकिस्तान के शासन मॉडल को कठघरे में खड़ा किया

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पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उबाल: बिजली-गेहूं से शुरू आंदोलन ने पाकिस्तान के शासन मॉडल को कठघरे में खड़ा किया

सारांश

बिजली और गेहूं से शुरू हुआ असंतोष अब पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान के पूरे शासन मॉडल को कठघरे में खड़ा कर रहा है। जो देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरी हकों की दुहाई देता है, वही अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में बढ़ते जन-विद्रोह को दबाने में जुटा है — यह विरोधाभास अब छिपाए नहीं छिप रहा।

मुख्य बातें

पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में बिजली दरों और गेहूं की ऊंची कीमतों के खिलाफ शुरू हुए विरोध एक बड़े शासन-विरोधी आंदोलन में तब्दील हो गए हैं।
जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेकेजेएएसी) जैसे नागरिक संगठनों ने 2024 से आंदोलन की अगुवाई की है।
ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान के अनुसार सस्ती बिजली, आटा सब्सिडी और जवाबदेही प्रमुख मांगें रहीं।
2025-2026 में जारी अशांति में कई लोगों के हताहत होने और संचार सेवाएं ठप किए जाने की खबरें सामने आईं।
आलोचकों का कहना है कि पीओके में जलविद्युत उत्पादन के बावजूद स्थानीय लोगों को महंगी और अनियमित बिजली का सामना करना पड़ता है।
इन विरोध प्रदर्शनों ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता को कमज़ोर करने वाला एक घरेलू विरोधाभास उजागर कर दिया है।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) और गिलगित-बाल्टिस्तान में बिजली दरों में बढ़ोतरी, गेहूं की आसमान छूती कीमतों और प्रशासनिक विफलताओं के विरुद्ध भड़का आक्रोश अब एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है, जो सीधे इस्लामाबाद के शासन मॉडल पर सवाल उठा रहा है। इन घटनाओं ने उन राजनीतिक और आर्थिक विरोधाभासों को सतह पर ला दिया है जिन्हें पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय नज़रों से ओझल रखता आया है।

आंदोलन की जड़ें और मुख्य घटनाक्रम

हाल के वर्षों में पीओके में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेकेजेएएसी) जैसे नागरिक संगठनों की अगुवाई में कई बड़े आंदोलन हो चुके हैं। स्थानीय निवासियों ने महंगाई, जरूरी वस्तुओं की किल्लत और इस्लामाबाद की लगातार उपेक्षा के विरुद्ध सड़कों पर उतरकर अपना गुस्सा जाहिर किया है।

ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान के जांचकर्ताओं के अनुसार, 2024 के बड़े विरोध प्रदर्शनों के पीछे सस्ती बिजली और आटे की मांग, जवाबदेही की अपेक्षा, तथा राजनेताओं और नौकरशाहों को मिलने वाली विशेषाधिकार-सुविधाओं का विरोध प्रमुख वजह थे। 2025 और 2026 के दौरान भी अशांति जारी रही, जिसमें कई लोगों के हताहत होने की खबरें सामने आईं।

आर्थिक विरोधाभास: हाइड्रोपावर की धरती पर बिजली का संकट

इस आंदोलन का सबसे तीखा आर्थिक प्रश्न यह है कि पीओके बड़े पैमाने पर जलविद्युत (हाइड्रोपावर) उत्पादन करता है, फिर भी वहां के लोगों को महंगी बिजली और अनियमित आपूर्ति का सामना करना पड़ता है। प्रदर्शनकारियों की मांगों में सस्ती बिजली दरें, गेहूं पर सब्सिडी और स्थानीय संसाधनों से होने वाली आय में उचित हिस्सेदारी शामिल हैं।

आलोचकों का कहना है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधन प्रबंधन और सुरक्षा जैसे अहम फैसलों पर इस्लामाबाद का वर्चस्व बरकरार है, जिससे स्थानीय स्वायत्तता महज कागज़ी बनकर रह गई है।

सरकारी दमन और बढ़ती खाई

कई रिपोर्टों के अनुसार, मांगों पर समाधान निकालने के बजाय अधिकारियों ने संचार सेवाएं ठप करने, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां करने, सुरक्षा बलों की भारी तैनाती और हिंसक झड़पों का रास्ता अपनाया। यह ऐसे समय में आया है जब जनता की अपेक्षाएं और सरकारी प्रतिक्रिया के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है।

गौरतलब है कि स्थानीय विधानसभाओं में उन लोगों के लिए सीटों के आरक्षण का मुद्दा भी विवादास्पद बना हुआ है जिन्हें कथित तौर पर 'जम्मू-कश्मीर के शरणार्थी' बताया जाता है और जो पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि ये आरक्षित सीटें इस्लामाबाद को राजनीतिक नतीजों पर नियंत्रण बनाए रखने का औजार देती हैं।

गिलगित-बाल्टिस्तान में भी वही सवाल

विश्लेषकों के अनुसार, गिलगित-बाल्टिस्तान में भी लोग संवैधानिक दर्जे, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कर व्यवस्था और स्थानीय संसाधनों के दोहन को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। रणनीतिक महत्व और प्राकृतिक संपदा से भरपूर होने के बावजूद वहां के निवासी अधिक स्वायत्तता और निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी की माँग कर रहे हैं।

स्थानीय संस्थाओं पर संघीय सरकार के गहरे प्रभाव के आरोपों ने लोकतांत्रिक कमी की धारणा को और पुख्ता किया है।

पाकिस्तान के कश्मीर दावों की विश्वसनीयता पर असर

इन घटनाओं ने पाकिस्तान के सामने एक असहज विरोधाभास खड़ा कर दिया है — एक तरफ वह खुद को कश्मीरी आकांक्षाओं का वाहक बताता है, दूसरी तरफ उसके अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों के निवासी उसकी नीतियों और शासन की खुलकर आलोचना कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान अक्सर भारत से जुड़े कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है, लेकिन पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उभरते ये जन-आंदोलन उसकी घरेलू शासन व्यवस्था की कमज़ोरियों को बेनकाब कर रहे हैं।

बार-बार के विरोध प्रदर्शन यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि शासन की जड़ें मज़बूत किए बिना केवल बल-प्रयोग से इस असंतोष को दबाना संभव नहीं। पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती अब नियंत्रण रेखा के पार नहीं, बल्कि अपने प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्रों के भीतर ही मौजूद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उठते ये आंदोलन उसी ढांचे की नींव हिला रहे हैं। असली विरोधाभास यह है कि जो क्षेत्र पाकिस्तान अपनी 'कश्मीर नीति' का आधार बनाता है, वहीं के लोग उसके शासन को चुनौती दे रहे हैं। संचार बंदी और सुरक्षाबलों की तैनाती जैसे जवाब यह दर्शाते हैं कि इस्लामाबाद के पास समस्या का राजनीतिक समाधान नहीं, केवल दमन का विकल्प है। और जब तक संसाधन-बंटवारे और प्रतिनिधित्व के मूल सवालों का जवाब नहीं मिलता, यह अशांति और गहरी होती जाएगी।
RashtraPress
7 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में विरोध प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
बिजली दरों में बढ़ोतरी, गेहूं की ऊंची कीमतों और प्रशासनिक विफलताओं के विरुद्ध शुरू हुए ये प्रदर्शन अब व्यापक शासन-विरोधी आंदोलन बन चुके हैं। स्थानीय लोग सस्ती बिजली, आटे पर सब्सिडी, स्थानीय संसाधनों में हिस्सेदारी और इस्लामाबाद से अधिक स्वायत्तता की माँग कर रहे हैं।
जेकेजेएएसी कौन है और इसकी भूमिका क्या है?
जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेकेजेएएसी) पीओके का एक प्रमुख नागरिक संगठन है जिसने हाल के वर्षों के बड़े आंदोलनों की अगुवाई की है। यह संगठन बिजली, आटा सब्सिडी और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर जनता को एकजुट करता रहा है।
पाकिस्तान सरकार ने इन प्रदर्शनों पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
कई रिपोर्टों के अनुसार अधिकारियों ने संचार सेवाएं ठप करने, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां करने और सुरक्षाबलों की तैनाती का सहारा लिया। 2025-2026 में हुई हिंसक झड़पों में कई लोगों के हताहत होने की खबरें भी सामने आईं।
पीओके में हाइड्रोपावर होते हुए भी बिजली संकट क्यों है?
पीओके बड़े पैमाने पर जलविद्युत उत्पादन करता है, लेकिन स्थानीय लोगों को महंगी बिजली और अनियमित आपूर्ति का सामना करना पड़ता है। प्रदर्शनकारियों का सवाल है कि स्थानीय संसाधनों से होने वाली आय का उचित हिस्सा क्षेत्र के निवासियों तक क्यों नहीं पहुंचता।
इन विरोध प्रदर्शनों का पाकिस्तान की कश्मीर नीति पर क्या असर पड़ता है?
विश्लेषकों के अनुसार, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरी हकों की पैरवी करता है, लेकिन अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में उठ रहे जन-आंदोलन उसकी शासन-विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हैं। यह विरोधाभास पाकिस्तान के कश्मीर दावों की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता को कमज़ोर कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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