पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उबाल: बिजली-गेहूं से शुरू आंदोलन ने पाकिस्तान के शासन मॉडल को कठघरे में खड़ा किया
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) और गिलगित-बाल्टिस्तान में बिजली दरों में बढ़ोतरी, गेहूं की आसमान छूती कीमतों और प्रशासनिक विफलताओं के विरुद्ध भड़का आक्रोश अब एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है, जो सीधे इस्लामाबाद के शासन मॉडल पर सवाल उठा रहा है। इन घटनाओं ने उन राजनीतिक और आर्थिक विरोधाभासों को सतह पर ला दिया है जिन्हें पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय नज़रों से ओझल रखता आया है।
आंदोलन की जड़ें और मुख्य घटनाक्रम
हाल के वर्षों में पीओके में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेकेजेएएसी) जैसे नागरिक संगठनों की अगुवाई में कई बड़े आंदोलन हो चुके हैं। स्थानीय निवासियों ने महंगाई, जरूरी वस्तुओं की किल्लत और इस्लामाबाद की लगातार उपेक्षा के विरुद्ध सड़कों पर उतरकर अपना गुस्सा जाहिर किया है।
ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान के जांचकर्ताओं के अनुसार, 2024 के बड़े विरोध प्रदर्शनों के पीछे सस्ती बिजली और आटे की मांग, जवाबदेही की अपेक्षा, तथा राजनेताओं और नौकरशाहों को मिलने वाली विशेषाधिकार-सुविधाओं का विरोध प्रमुख वजह थे। 2025 और 2026 के दौरान भी अशांति जारी रही, जिसमें कई लोगों के हताहत होने की खबरें सामने आईं।
आर्थिक विरोधाभास: हाइड्रोपावर की धरती पर बिजली का संकट
इस आंदोलन का सबसे तीखा आर्थिक प्रश्न यह है कि पीओके बड़े पैमाने पर जलविद्युत (हाइड्रोपावर) उत्पादन करता है, फिर भी वहां के लोगों को महंगी बिजली और अनियमित आपूर्ति का सामना करना पड़ता है। प्रदर्शनकारियों की मांगों में सस्ती बिजली दरें, गेहूं पर सब्सिडी और स्थानीय संसाधनों से होने वाली आय में उचित हिस्सेदारी शामिल हैं।
आलोचकों का कहना है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संसाधन प्रबंधन और सुरक्षा जैसे अहम फैसलों पर इस्लामाबाद का वर्चस्व बरकरार है, जिससे स्थानीय स्वायत्तता महज कागज़ी बनकर रह गई है।
सरकारी दमन और बढ़ती खाई
कई रिपोर्टों के अनुसार, मांगों पर समाधान निकालने के बजाय अधिकारियों ने संचार सेवाएं ठप करने, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां करने, सुरक्षा बलों की भारी तैनाती और हिंसक झड़पों का रास्ता अपनाया। यह ऐसे समय में आया है जब जनता की अपेक्षाएं और सरकारी प्रतिक्रिया के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है।
गौरतलब है कि स्थानीय विधानसभाओं में उन लोगों के लिए सीटों के आरक्षण का मुद्दा भी विवादास्पद बना हुआ है जिन्हें कथित तौर पर 'जम्मू-कश्मीर के शरणार्थी' बताया जाता है और जो पाकिस्तान के अन्य हिस्सों में रहते हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि ये आरक्षित सीटें इस्लामाबाद को राजनीतिक नतीजों पर नियंत्रण बनाए रखने का औजार देती हैं।
गिलगित-बाल्टिस्तान में भी वही सवाल
विश्लेषकों के अनुसार, गिलगित-बाल्टिस्तान में भी लोग संवैधानिक दर्जे, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, कर व्यवस्था और स्थानीय संसाधनों के दोहन को लेकर लगातार सवाल उठा रहे हैं। रणनीतिक महत्व और प्राकृतिक संपदा से भरपूर होने के बावजूद वहां के निवासी अधिक स्वायत्तता और निर्णय-प्रक्रिया में सार्थक भागीदारी की माँग कर रहे हैं।
स्थानीय संस्थाओं पर संघीय सरकार के गहरे प्रभाव के आरोपों ने लोकतांत्रिक कमी की धारणा को और पुख्ता किया है।
पाकिस्तान के कश्मीर दावों की विश्वसनीयता पर असर
इन घटनाओं ने पाकिस्तान के सामने एक असहज विरोधाभास खड़ा कर दिया है — एक तरफ वह खुद को कश्मीरी आकांक्षाओं का वाहक बताता है, दूसरी तरफ उसके अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों के निवासी उसकी नीतियों और शासन की खुलकर आलोचना कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान अक्सर भारत से जुड़े कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है, लेकिन पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में उभरते ये जन-आंदोलन उसकी घरेलू शासन व्यवस्था की कमज़ोरियों को बेनकाब कर रहे हैं।
बार-बार के विरोध प्रदर्शन यह स्पष्ट संकेत देते हैं कि शासन की जड़ें मज़बूत किए बिना केवल बल-प्रयोग से इस असंतोष को दबाना संभव नहीं। पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती अब नियंत्रण रेखा के पार नहीं, बल्कि अपने प्रशासनिक नियंत्रण वाले क्षेत्रों के भीतर ही मौजूद है।