छत्तीसगढ़ की पूर्णिमा बासिन बनीं 'लखपति दीदी', जैविक खेती और एसएचजी से बदली बलरामपुर की तस्वीर

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
छत्तीसगढ़ की पूर्णिमा बासिन बनीं 'लखपति दीदी', जैविक खेती और एसएचजी से बदली बलरामपुर की तस्वीर

सारांश

बलरामपुर की पूर्णिमा बासिन की कहानी सिर्फ एक महिला की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की है जो एसएचजी, बैंक लिंकेज और जैविक खेती को मिलाकर ग्रामीण जीवन को बदल सकती है। जीराफूल चावल की खेती से लाखों की कमाई तक — यह सफर बताता है कि सही अवसर मिले तो ग्रामीण महिलाएँ किसी से पीछे नहीं।

मुख्य बातें

पूर्णिमा बासिन ( बलरामपुर, छत्तीसगढ़ ) ने स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़कर बैंक लिंकेज और सीआईएफ ऋण प्राप्त किया।
उन्होंने जीराफूल चावल की जैविक खेती अपनाई, जिसकी बाज़ार में माँग तेज़ी से बढ़ रही है।
आज वह लाखों रुपये की वार्षिक कमाई कर रही हैं और 'लखपति दीदी' के नाम से पहचानी जाती हैं।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने उनकी सफलता को ग्रामीण महिला आत्मनिर्भरता का मजबूत उदाहरण बताया।
बलरामपुर जिले में गांधी समूह , संतरा समूह और दुर्गा समूह जैसी महिला समितियाँ भी हस्तशिल्प और खाद्य उत्पादों से बड़े बाज़ारों तक पहुँच बना रही हैं।

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले की पूर्णिमा बासिन की कहानी आज ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा का सबसे सशक्त उदाहरण बन चुकी है। स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ने और जीराफूल चावल की जैविक खेती अपनाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति पूरी तरह बदल गई है। कभी रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करना भी जिनके लिए कठिन था, वह आज 'लखपति दीदी' के नाम से पहचानी जाती हैं।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

पूर्णिमा बासिन के पास खेत थे और मेहनत की कमी नहीं थी, लेकिन पारंपरिक खेती से होने वाली आमदनी परिवार की ज़रूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं थी। असली बदलाव तब आया जब वह स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ीं। समूह की सदस्यता के ज़रिए उन्हें बैंक लिंकेज और सामुदायिक निवेश निधि (सीआईएफ) के माध्यम से ऋण मिला, जिसने उनके सपनों को नई दिशा दी।

पूर्णिमा ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर जैविक खेती का रास्ता चुना और जीराफूल चावल की खेती शुरू की। यह धान की एक पारंपरिक और सुगंधित किस्म है, जिसकी बाज़ार में माँग तेज़ी से बढ़ रही है। ऋण का सही उपयोग और जैविक पद्धति ने उनकी आमदनी को लगातार बढ़ाया, और आज वह लाखों रुपये की वार्षिक कमाई कर रही हैं।

पूर्णिमा की अपनी ज़ुबानी

पूर्णिमा बासिन ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में कहा कि उन्होंने मिले हुए लोन का सही तरीके से इस्तेमाल किया। उन्होंने बताया कि जैविक खेती शुरू करने के बाद आमदनी लगातार बढ़ती गई और आज वह लाखों रुपये की कमाई कर रही हैं। पूर्णिमा ने यह भी कहा कि इसी आय की बदौलत वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला पा रही हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर हो गई है।

उन्होंने मुख्यमंत्री का धन्यवाद करते हुए कहा कि सरकार के सहयोग और योजनाओं की वजह से ही वह आज 'लखपति दीदी' बन पाई हैं। गौरतलब है कि 'लखपति दीदी' योजना के तहत ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

मुख्यमंत्री से मुलाकात और सराहना

हाल ही में पूर्णिमा बासिन की मुलाकात छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री से हुई, जहाँ उन्होंने अपनी संघर्ष से सफलता तक की पूरी कहानी साझा की। मुख्यमंत्री ने उनके प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और आत्मनिर्भरता का मजबूत उदाहरण है। यह ऐसे समय में हो रहा है जब ग्रामीण महिला उद्यमिता को राष्ट्रीय नीति में केंद्रीय स्थान दिया जा रहा है।

बलरामपुर में महिला समूहों की आत्मनिर्भरता की लहर

पूर्णिमा बासिन अकेली ऐसी महिला नहीं हैं जिन्होंने मेहनत और सरकारी योजनाओं के सहारे नई पहचान बनाई हो। बलरामपुर जिले में बरियों का गांधी समूह, दुर्गापुर का संतरा समूह और दुर्गा समूह जैसी कई महिला समितियाँ हस्तशिल्प और खाद्य उत्पादों के ज़रिए अपना कारोबार बढ़ा रही हैं। सरकारी योजनाओं और बैंक लिंकेज की मदद से ये महिलाएँ अब केवल स्थानीय बाज़ारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बड़े बाज़ारों तक भी अपनी पहुँच बना रही हैं।

बदलते ग्रामीण भारत की तस्वीर

बलरामपुर की ये कहानियाँ बदलते ग्रामीण भारत का जीता-जागता प्रमाण हैं, जहाँ महिलाएँ मेहनत, आत्मविश्वास और सही अवसर के दम पर अपनी नई पहचान गढ़ रही हैं। पूर्णिमा बासिन जैसी महिलाएँ यह साबित कर रही हैं कि आत्मनिर्भरता की राह कठिन ज़रूर है, लेकिन सही मार्गदर्शन और योजनाओं के सहारे असंभव नहीं — और खेतों से शुरू हुआ यह सफर अब सपनों को नई उड़ान दे रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर बड़े बाज़ार तक पहुँच और उचित मूल्य की गारंटी बिना बिचौलिए के सुनिश्चित करना अभी भी बड़ी चुनौती है। पूर्णिमा की सफलता को नीतिगत मॉडल बनाने के लिए ऋण वितरण, बाज़ार संपर्क और कौशल प्रशिक्षण — तीनों को एक साथ मज़बूत करना होगा।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पूर्णिमा बासिन 'लखपति दीदी' कैसे बनीं?
पूर्णिमा बासिन ने छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़कर बैंक लिंकेज और सीआईएफ ऋण प्राप्त किया और जीराफूल चावल की जैविक खेती शुरू की। इस जैविक खेती से उनकी आमदनी लाखों रुपये तक पहुँच गई, जिससे वह 'लखपति दीदी' कहलाने लगीं।
जीराफूल चावल क्या है और इसकी खेती क्यों फायदेमंद है?
जीराफूल धान की एक पारंपरिक और सुगंधित किस्म है जो मुख्यतः छत्तीसगढ़ में उगाई जाती है। बाज़ार में इसकी माँग तेज़ी से बढ़ रही है, जिससे जैविक तरीके से इसकी खेती करने वाले किसानों को बेहतर मूल्य मिलता है।
'लखपति दीदी' योजना क्या है?
'लखपति दीदी' केंद्र सरकार की एक पहल है जिसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों, कौशल प्रशिक्षण और बैंक लिंकेज के ज़रिए सालाना एक लाख रुपये से अधिक की आमदनी तक पहुँचाना है। यह योजना महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है।
बलरामपुर में और कौन-से महिला समूह आत्मनिर्भरता की दिशा में काम कर रहे हैं?
बलरामपुर जिले में बरियों का गांधी समूह, दुर्गापुर का संतरा समूह और दुर्गा समूह जैसी महिला समितियाँ हस्तशिल्प और खाद्य उत्पादों के ज़रिए स्थानीय से बड़े बाज़ारों तक अपनी पहुँच बना रही हैं।
एसएचजी से जुड़ने से महिलाओं को क्या फायदा होता है?
स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ने पर महिलाओं को बैंक लिंकेज, सामुदायिक निवेश निधि (सीआईएफ) से ऋण, कौशल प्रशिक्षण और बाज़ार तक पहुँच जैसी सुविधाएँ मिलती हैं। इससे वे अपना छोटा व्यवसाय या कृषि उद्यम शुरू कर आत्मनिर्भर बन सकती हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 महीना पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 4 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 4 महीने पहले
  6. 5 महीने पहले
  7. 6 महीने पहले
  8. 7 महीने पहले