कोल गैंग्यू से जल शोधन: खदान के कचरे से पीएमएस उत्प्रेरक बनाने की नई रिसर्च
सारांश
मुख्य बातें
कोयला खदानों से निकलने वाले कोल गैंग्यू को अब तक केवल एक निरुपयोगी ठोस अपशिष्ट समझा जाता था — जिसे या तो विशाल ढेरों में डाल दिया जाता था या सस्ते निर्माण कार्यों में भराव के रूप में उपयोग किया जाता था। किंतु एक नई वैज्ञानिक समीक्षा अध्ययन ने इस धारणा को चुनौती दी है। शोधकर्ताओं के अनुसार, उचित प्रसंस्करण के बाद यही अपशिष्ट पेरॉक्सीमोनोसल्फेट (पीएमएस) को सक्रिय करने वाला प्रभावशाली उत्प्रेरक बन सकता है, जो औद्योगिक अपशिष्ट जल में मौजूद जिद्दी कार्बनिक प्रदूषकों को नष्ट करने में सक्षम है।
क्या है कोल गैंग्यू और क्यों है यह समस्या
कोयला खनन और प्रसंस्करण के दौरान बड़ी मात्रा में कोल गैंग्यू उत्पन्न होता है। इसे खुले मैदानों में जमा किया जाता है, जिससे भूमि का क्षरण, मिट्टी का प्रदूषण और आसपास के जल स्रोतों में अम्लीय पदार्थों, लवणों और धातुओं का रिसाव होता है। हालाँकि, इसी अपशिष्ट में सिलिका, एल्यूमिना, लौह युक्त खनिज और कई सूक्ष्म धातुएँ भी मौजूद होती हैं — जो इसे एक संभावित उत्प्रेरक के रूप में उपयोगी बनाती हैं।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत समेत कई देश एक साथ दो संकटों से जूझ रहे हैं — औद्योगिक ठोस अपशिष्ट का बढ़ता बोझ और जल प्रदूषण की गहराती समस्या।
शोध का मुख्य निष्कर्ष
इस अध्ययन के प्रमुख लेखक लिक्सिन ली के अनुसार, कोल गैंग्यू को महज एक निष्क्रिय पदार्थ मानना उचित नहीं है। उनका कहना है कि इसकी खनिज संरचना रासायनिक प्रतिक्रियाओं में सक्रिय भूमिका निभा सकती है। यदि इसकी प्राकृतिक क्षमता को सही ढंग से उपयोग में लाया जाए और उपयुक्त सक्रिय तत्व जोड़े जाएँ, तो एक अधिक असरदार एवं व्यावहारिक जल शोधन तकनीक विकसित की जा सकती है।
शोध में बताया गया है कि ताप उपचार (हीटिंग), पीसना (ग्राइंडिंग) और रासायनिक उपचार जैसी प्रक्रियाओं से कोल गैंग्यू की संरचना में बदलाव लाया जा सकता है। गर्म करने पर इसके स्थिर खनिज अधिक सक्रिय रूप धारण करते हैं; ग्राइंडिंग से कण सूक्ष्म होकर नई सतहें और रासायनिक दोष (डिफेक्ट्स) उत्पन्न करते हैं; जबकि अम्लीय या क्षारीय उपचार से इसके सतही गुणों में परिवर्तन आता है।
पीएमएस सक्रियण और प्रदूषक उन्मूलन
जब संशोधित कोल गैंग्यू पीएमएस को सक्रिय करता है, तो यह सल्फेट रेडिकल, हाइड्रॉक्सिल रेडिकल और सिंगलेट ऑक्सीजन जैसे अत्यंत सक्रिय रासायनिक कण उत्पन्न करता है। ये कण पानी में घुले जहरीले कार्बनिक प्रदूषकों को तोड़कर कम हानिकारक पदार्थों में रूपांतरित कर देते हैं। कुछ मामलों में यह प्रक्रिया सीधे इलेक्ट्रॉन स्थानांतरण (ट्रांसफर) के माध्यम से भी संपन्न होती है।
शोधकर्ताओं ने टेट्रासाइक्लिन एंटीबायोटिक और फिनॉलिक यौगिकों को परीक्षण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त प्रदूषक बताया है। टेट्रासाइक्लिन की जटिल रासायनिक संरचना यह जाँचने में सहायक है कि उत्प्रेरक प्रदूषकों को सतह पर पकड़कर कितनी कुशलता से तोड़ सकता है, जबकि फिनॉलिक यौगिक यह समझने में मदद करते हैं कि शोधन प्रक्रिया मुख्यतः रेडिकल आधारित है या किसी अन्य तंत्र पर।
व्यावहारिक उपयोग की चुनौतियाँ
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि प्रयोगशाला में सकारात्मक परिणाम मिलना पर्याप्त नहीं है। किसी तकनीक की वास्तविक उपयोगिता तभी सिद्ध होगी जब उसका परीक्षण वास्तविक औद्योगिक अपशिष्ट जल पर किया जाए। इसके अतिरिक्त यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उत्प्रेरक को बार-बार पुनः उपयोग किया जा सके, उससे धातुएँ पानी में न घुलें, प्रदूषकों के टूटने के बाद बनने वाले उत्पाद सुरक्षित हों और पूरी प्रक्रिया की लागत एवं ऊर्जा खपत व्यावहारिक सीमा में रहे।
आगे की राह
शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में उत्प्रेरक तैयार करते समय पहले कोल गैंग्यू की प्राकृतिक ऑक्सीडेशन क्षमता को अधिकतम करना चाहिए, उसके बाद ही बाहरी धातुओं या सक्रिय तत्वों को जोड़ा जाना चाहिए। यदि इन सभी पहलुओं पर अनुकूल परिणाम मिलते हैं, तो कोयला खदानों का यह अपशिष्ट एक साथ जल प्रदूषण और ठोस अपशिष्ट — दोनों समस्याओं का समाधान बन सकता है। यह शोध खनन उद्योग और पर्यावरण प्रबंधन दोनों के लिए एक नई दिशा का संकेत देता है।