9 अगस्त 2026
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कोयंबटूर: कास्ट आयरन यूनिट के प्रदूषण से फसलें और भूजल बर्बाद, किसानों ने जांच की माँग की

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कोयंबटूर: कास्ट आयरन यूनिट के प्रदूषण से फसलें और भूजल बर्बाद, किसानों ने जांच की माँग की

सारांश

कोयंबटूर के सुलूर तालुक के किसानों का आरोप है कि एक कास्ट आयरन यूनिट के ज़हरीले उत्सर्जन से उनकी फसलें, भूजल और स्वास्थ्य बर्बाद हो रहे हैं। वर्षों की शिकायतों के बाद भी कोई स्थायी समाधान नहीं मिला — अब किसानों ने जिला प्रशासन से तत्काल जाँच और कार्रवाई की माँग की है।

मुख्य बातें

कोयंबटूर के सुलूर तालुक के अप्पानायक्कनपट्टी और करादिवावी गाँवों के किसानों ने 8 अगस्त 2026 को नज़दीकी कास्ट आयरन यूनिट पर प्रदूषण फैलाने का आरोप लगाया।
कथित प्रदूषण रात के समय, रविवार और सरकारी छुट्टियों पर अधिक गंभीर होने का आरोप है।
किसान सुंदरा पांडियन ने दावा किया कि औद्योगिक इकाई से 200 मीटर दूर उनकी तीन एकड़ भूमि पर पिछले एक दशक में बार-बार फसल खराब हुई; प्रति एकड़ ₹50,000 की लागत बेकार गई।
रामकृष्णन के अनुसार भूजल दूषित हो गया है और सांस लेने में कठिनाई हो रही है।
ग्रामीणों ने पशुओं की मौत और भूमि दलालों द्वारा ज़मीन बेचने के दबाव का भी आरोप लगाया।
किसानों ने जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से तत्काल जाँच और स्थायी समाधान की माँग की है।

तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के सुलूर तालुक स्थित अप्पानायक्कनपट्टी और करादिवावी गाँवों के किसानों ने 8 अगस्त 2026 को एक नज़दीकी कास्ट आयरन कास्टिंग यूनिट पर गंभीर आरोप लगाए। किसानों के अनुसार, इस इकाई से निकलने वाले धुएँ और ज़हरीली गैसों ने उनकी फसलों, भूजल और स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे उनकी आजीविका संकट में पड़ गई है।

मुख्य घटनाक्रम

ग्रामीणों का आरोप है कि कास्टिंग यूनिट से निकलने वाला धुआँ और दुर्गंधयुक्त गैसें आसपास के वातावरण को लगातार प्रदूषित कर रही हैं। कथित तौर पर यह समस्या रात के समय, रविवार और सरकारी छुट्टियों के दिनों में और अधिक गंभीर हो जाती है — जब निगरानी तंत्र कमज़ोर पड़ जाता है।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि इलाके में पशुओं की मौत के मामले भी सामने आए हैं, हालाँकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।

किसानों पर आर्थिक असर

स्थानीय किसान पी. रामकृष्णन ने बताया कि कथित प्रदूषण के कारण कृषि कार्य बुरी तरह बाधित हुए हैं और भूजल भी दूषित हो गया है। उन्होंने कहा, "ज़हरीले उत्सर्जन के कारण हमारी फसलें नष्ट हो रही हैं। भूजल भी प्रभावित हुआ है और हमें खुलकर साँस लेने में मुश्किल हो रही है। हमने कई बार सरकारी अधिकारियों को शिकायतें दी हैं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं मिला है।"

रामकृष्णन ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ भूमि दलाल किसानों पर अपनी कृषि भूमि बेचने का दबाव बना रहे हैं, जिससे खेती पर निर्भर परिवारों की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।

एक अन्य किसान सुंदरा पांडियन, जो औद्योगिक इकाई से लगभग 200 मीटर की दूरी पर तीन एकड़ भूमि पर टमाटर और मिर्च की खेती करते हैं, उन्होंने दावा किया कि पिछले एक दशक में जब-जब भारी मात्रा में प्रदूषण फैला, उनकी फसलें बार-बार खराब हुईं। किसानों के अनुसार, प्रति एकड़ लगभग ₹50,000 की लागत के बावजूद बार-बार फसल बर्बाद होने से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।

स्वास्थ्य पर असर

ग्रामीणों के अनुसार, लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से बच्चों और वयस्कों में कई स्वास्थ्य समस्याएँ सामने आई हैं। कथित तौर पर लोगों को आँखों, नाक और गले में जलन, लगातार खाँसी और गले में दर्द जैसी शारीरिक तकलीफें झेलनी पड़ रही हैं। इसके अलावा किसानों का कहना है कि कृषि भूमि पर मौजूद पेड़-पौधे भी प्रभावित हुए हैं, जिससे ज़मीन का मूल्य घट गया है।

सरकारी प्रतिक्रिया और माँगें

किसान सुंदरा पांडियन ने बताया, "जब भी हम शिकायत करते हैं तो प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राजस्व विभाग के अधिकारी क्षेत्र का दौरा करते हैं, लेकिन समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता।" यह ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु में औद्योगिक प्रदूषण से जुड़ी शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं।

गौरतलब है कि वर्षों से विभिन्न सरकारी विभागों को शिकायतें देने के बावजूद किसानों को कोई ठोस राहत नहीं मिली है। अब प्रभावित किसानों ने जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों से मामले की विस्तृत जाँच कराने, प्रदूषण पर तत्काल नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम उठाने और भूजल को और अधिक दूषित होने से बचाने की माँग की है।

किसानों की यह माँग अब जिला प्रशासन के सामने है — देखना होगा कि अधिकारी इस बार कोई ठोस कार्रवाई करते हैं या यह भी पिछली शिकायतों की तरह फाइलों में दब जाती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या प्रवर्तन की इच्छाशक्ति का अभाव? रात और छुट्टियों में प्रदूषण बढ़ने का आरोप यह संकेत देता है कि इकाई निरीक्षण से बचकर उत्सर्जन करती है — यह पैटर्न राष्ट्रीय स्तर पर कई 'ग्रीन ज़ोन उल्लंघन' मामलों में देखा गया है। भूमि दलालों द्वारा दबाव का आरोप भी चिंताजनक है — यह संभावित भूमि अधिग्रहण की ओर इशारा करता है जो किसानों की मुश्किलों को और गहरा कर सकता है।
RashtraPress
9 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोयंबटूर के किसानों ने कास्ट आयरन यूनिट पर क्या आरोप लगाए हैं?
किसानों का आरोप है कि सुलूर तालुक की कास्ट आयरन कास्टिंग यूनिट से निकलने वाले धुएँ और ज़हरीली गैसों ने उनकी फसलें नष्ट कर दी हैं, भूजल दूषित कर दिया है और स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाया है। पशुओं की मौत और भूमि मूल्य में गिरावट के आरोप भी लगाए गए हैं।
प्रदूषण की समस्या किन गाँवों को प्रभावित कर रही है?
तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के सुलूर तालुक स्थित अप्पानायक्कनपट्टी और करादिवावी गाँव इस कथित प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित बताए गए हैं। किसान सुंदरा पांडियन की खेती की ज़मीन औद्योगिक इकाई से मात्र 200 मीटर दूर है।
किसानों को कितना आर्थिक नुकसान हुआ है?
किसानों के अनुसार, वे प्रति एकड़ लगभग ₹50,000 खेती पर खर्च करते हैं, लेकिन पिछले एक दशक में बार-बार फसल बर्बाद होने से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। कृषि भूमि पर मौजूद पेड़-पौधे प्रभावित होने से ज़मीन का मूल्य भी घटा है।
किसानों ने सरकार से क्या माँगें रखी हैं?
प्रभावित किसानों ने जिला प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों से मामले की विस्तृत जाँच, प्रदूषण पर तत्काल नियंत्रण और भूजल को और दूषित होने से बचाने की माँग की है। साथ ही दोनों गाँवों के निवासियों के स्वास्थ्य, कृषि भूमि और आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
अब तक सरकारी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
किसान सुंदरा पांडियन के अनुसार, शिकायत मिलने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राजस्व विभाग के अधिकारी दौरा तो करते हैं, लेकिन समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकलता। वर्षों से शिकायतें दर्ज कराने के बावजूद किसानों को कोई ठोस राहत नहीं मिली है।
राष्ट्र प्रेस
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