सीपीआई का बड़ा फैसला: तमिलनाडु में डीएमके गठबंधन से दूरी, बदले राजनीतिक समीकरण
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने 11 जून 2026 को स्पष्ट कर दिया कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में वह द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के नेतृत्व वाले चुनावी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगी। पार्टी के तमिलनाडु राज्य सचिव एम. वीरापांडियन ने दो दिवसीय राज्य कार्यकारिणी बैठक के बाद यह घोषणा की, यह कहते हुए कि हालिया विधानसभा चुनावों के बाद राज्य का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है।
मुख्य घटनाक्रम
वीरापांडियन ने चेन्नई में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और विदुथलाई चिरुथाइगल काची (वीसीके) — जो पहले डीएमके नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रमुख सहयोगी थे — अब तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) सरकार का हिस्सा बन चुके हैं। वामपंथी दल इस सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे हैं।
उन्होंने कहा, "कांग्रेस गठबंधन से अलग हो चुकी है, डीएमके ने भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं रहने की घोषणा कर दी है और कई अन्य दल टीवीके सरकार में शामिल हो चुके हैं। ऐसे में पहले वाला चुनावी गठबंधन अब एकजुट मोर्चे के रूप में जारी नहीं रह सकता।"
टीवीके को बाहरी समर्थन का आधार
टीवीके ने हालिया विधानसभा चुनावों में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल किया। वीरापांडियन ने कहा कि सीपीआई जनता के जनादेश का सम्मान करती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार बनाने का टीवीके को पूरा अधिकार है। यही कारण है कि पार्टी ने बाहरी समर्थन का रास्ता चुना।
भाजपा-आरएसएस अपवाद, बाकी दलों से सहयोग संभव
वीरापांडियन ने स्पष्ट किया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को छोड़कर सीपीआई तमिलनाडु के किसी भी बड़े राजनीतिक दल को अपना विरोधी नहीं मानती। पार्टी डीएमके, अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) और टीवीके को लोकतांत्रिक ताकतों के रूप में देखती है और जनकल्याण, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, किसानों तथा श्रमिकों से जुड़े मुद्दों पर इनके साथ सहयोग के लिए तैयार है।
स्टालिन के प्रभाव के आरोप खारिज
वीरापांडियन ने इस बात से भी इनकार किया कि पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सीपीआई के राजनीतिक फैसलों को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट पार्टियाँ सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और संगठनात्मक विचार-विमर्श के आधार पर काम करती हैं, न कि किसी बाहरी दबाव में।
भविष्य की रणनीति
सीपीआई ने संकेत दिया है कि आगामी उपचुनाव, स्थानीय निकाय चुनाव, विधानसभा और लोकसभा चुनावों को लेकर पार्टी उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार वामपंथी और लोकतांत्रिक दलों के साथ मिलकर निर्णय लेगी। गठबंधन का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं है — बस पुराने ढाँचे में वापसी संभव नहीं।