राघव चड्ढा मानहानि केस: दिल्ली हाई कोर्ट ने अश्लील पोस्ट हटाने का आदेश दिया, AI डीपफेक पर भी सख्त रुख
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1 जुलाई 2026 को कई ऑनलाइन मध्यस्थ प्लेटफॉर्मों को राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के विरुद्ध प्रकाशित कुछ मानहानिकारक और अश्लील सोशल मीडिया पोस्ट दो सप्ताह के भीतर हटाने का अंतरिम निर्देश दिया। न्यायालय ने साथ ही स्पष्ट किया कि राजनीतिक व्यंग्य और आलोचना लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है, परंतु 'अपमानजनक और भद्दी' सामग्री को हास्य की आड़ में संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति सुब्रमणियम प्रसाद की एकल-न्यायाधीश पीठ ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए प्रतिवादी संख्या 2 और 4 — अर्थात मध्यस्थ प्लेटफॉर्मों — को दो सप्ताह के भीतर निर्दिष्ट यूआरएल हटाने का निर्देश दिया। इसके अतिरिक्त, इन प्लेटफॉर्मों को उक्त पोस्ट से जुड़े खातों की बेसिक सब्सक्राइबर इनफॉर्मेशन (BSI) और आईपी लॉग भी चड्ढा को उपलब्ध कराने को कहा गया।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि दस्तावेज संख्या 2, 8, 9, 11, 25 और 40 में ऐसी सामग्री है जो अश्लील और भद्दी प्रकृति की है तथा हानिरहित व्यंग्यपूर्ण हास्य की परिभाषा से बाहर है। इसीलिए प्रतिवादी संख्या 1 को ऐसी सामग्री प्रकाशित करने से रोका जाना उचित ठहराया गया।
किन पोस्ट को संरक्षण मिला
न्यायमूर्ति प्रसाद की पीठ ने चुनौती दी गई शेष सामग्री को हटाने का निर्देश देने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने पाया कि प्रस्तुत 52 दस्तावेजों में से अधिकांश आम आदमी पार्टी (AAP) से भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के बाद चड्ढा के राजनीतिक निर्णयों की आलोचना से संबंधित थे।
न्यायालय ने कहा कि राजनीतिक दलों के गठबंधन, शासन और नीतियों में बदलाव पर व्यंग्य राजनीति का अभिन्न अंग है। सार्वजनिक जीवन में ऐसे पदों पर आसीन व्यक्तियों को व्यंग्यात्मक हास्य को अपने पेशे का एक अनिवार्य पहलू मानना चाहिए — भले ही वह अप्रिय लगे।
AI डीपफेक पर न्यायालय का रुख
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दुरुपयोग पर भी सख्त टिप्पणी की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह किसी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से डीपफेक वीडियो या मॉर्फ्ड तस्वीरें बनाने के लिए AI के उपयोग का किसी भी रूप में समर्थन नहीं करता।
न्यायालय ने यह भी कहा कि अदालतों को किसी व्यक्ति के गरिमा के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी के बीच उचित संतुलन बनाए रखना चाहिए। यह टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब AI-जनित फर्जी सामग्री के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
याचिका की पृष्ठभूमि
चड्ढा ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर ऑनलाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर अपने नाम, छवि, रूप और पहचान के कथित अनधिकृत उपयोग के विरुद्ध अपने व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों की सुरक्षा की माँग की थी। इसमें AI-निर्मित, डीपफेक और मॉर्फ्ड सामग्री भी शामिल थी।
अधिवक्ताओं की प्रतिक्रिया
इस फैसले का स्वागत करते हुए चड्ढा का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता सत्य आनंद और निखिल आराधे ने कहा कि यह आदेश संगठित ऑनलाइन मानहानि से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बयान में कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा पारित यह आदेश एक स्वागत योग्य पहल है।
यह फैसला भारत में सार्वजनिक हस्तियों के डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन अभिव्यक्ति की सीमाओं को लेकर चल रही व्यापक बहस में एक नई कानूनी मिसाल स्थापित कर सकता है।