दिल्ली हाईकोर्ट ने पाक उच्चायोग जासूसी आरोपी हबीब उर रहमान की जमानत याचिका खारिज की
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी के लिए कथित तौर पर जासूसी करने के आरोपी हबीब उर रहमान की नियमित जमानत याचिका अस्वीकार कर दी। अदालत ने जासूसी के आरोपों की संवेदनशीलता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े स्वरूप को दृष्टिगत रखते हुए यह निर्णय सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
हबीब उर रहमान को 2021 में गिरफ्तार किया गया था। उस पर आरोप है कि उसने पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी तक सैन्य प्रशिक्षण से जुड़ी संवेदनशील जानकारियाँ पहुँचाने के लिए बिचौलिए की भूमिका निभाई। कथित तौर पर उसके पास से सैन्य प्रशिक्षण संबंधी संवेदनशील दस्तावेज और 'गोपनीय' सामग्री बरामद की गई थी। उसके विरुद्ध आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।
जमानत याचिका और बचाव पक्ष के तर्क
रहमान कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं, जिसके कारण उन्हें पहले मेडिकल आधार पर जमानत मिली थी। बाद में उन्होंने नियमित जमानत के लिए न्यायालय में आवेदन किया। बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर जमानत नकारना न्यायसंगत नहीं है और यह भी कहा कि गोपनीय दस्तावेज पहले से ही अदालत की अभिरक्षा में हैं, अतः साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना नगण्य है।
अदालत ने स्वीकार किया कि रहमान तीन वर्षों से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं और यह भी माना कि किसी व्यक्ति को आरोप की गंभीरता के नाम पर अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता — विशेष रूप से जब मुकदमे के उचित समय में पूरा होने की संभावना न हो।
हाईकोर्ट का फैसला
इन तर्कों के बावजूद दिल्ली हाईकोर्ट ने नियमित जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने रेखांकित किया कि इस प्रकरण की परिस्थितियाँ सामान्य मामलों से भिन्न हैं — ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जा चुके हैं और अभियोजन पक्ष ने अपने साक्ष्य प्रस्तुत करने प्रारंभ कर दिए हैं। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं है जिससे मुकदमे की प्रगति को देखते हुए जमानत दी जा सके।
चिकित्सा सुविधाओं पर निर्देश
हाईकोर्ट ने रहमान की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखते हुए जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि उन्हें आवश्यक चिकित्सा जाँच, विशेषज्ञ चिकित्सकों की परामर्श सेवाएँ, फिजियोथेरेपी और उपयुक्त उपचार उपलब्ध कराया जाए। अदालत ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया और यह पाया कि रहमान को जेल परिसर में आवश्यक चिकित्सा सुविधाएँ दी जा सकती हैं।
आगे क्या होगा
यह मामला आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 के अंतर्गत चल रहे उन चुनिंदा मामलों में से एक है जो भारत-पाकिस्तान राजनयिक संबंधों की पृष्ठभूमि में विशेष महत्त्व रखते हैं। ट्रायल कोर्ट में सुनवाई जारी रहने की संभावना है, और अभियोजन पक्ष के साक्ष्य प्रस्तुत होने के बाद आगे की कार्यवाही तय होगी।