26 साल बाद पकड़ा गया उम्रकैद का भगोड़ा: दिल्ली पुलिस ने देहरादून से अमित यादव को किया गिरफ्तार
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एसएआरएससी टीम ने 17 अगस्त 2026 को देहरादून, उत्तराखंड से 57 वर्षीय अमित यादव को गिरफ्तार किया — एक ऐसा भगोड़ा अपराधी जो 26 वर्षों से कानून की पकड़ से बाहर था। यादव को 1995 के एक हाई-प्रोफाइल अपहरण मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जिसमें पीड़ित से ₹1 करोड़ की फिरौती माँगी गई थी। साल 2000 में जमानत पर छूटने के बाद वह सरेंडर नहीं किया और फरार हो गया था, जिसके बाद उसकी गिरफ्तारी पर ₹5,000 का इनाम घोषित किया गया था।
मुख्य घटनाक्रम: 1995 का अपहरण
12 सितंबर 1995 को शाम करीब 7 बजे पीड़ित ऋषि सेठी एम्स के डायरेक्टर के आवास के निकट अपनी कार में बैठे थे, तभी 3-4 लोगों ने उन्हें जबरदस्ती अपने कब्जे में ले लिया। आरोपियों ने उनके साथ मारपीट की, आँखों पर पट्टी बाँधी और उन्हीं की कार से अपहरण कर लिया। इसके बाद उन्हें एक अज्ञात स्थान पर बंधक बनाकर रखा गया।
अपहरणकर्ताओं ने पीड़ित के परिवार से ₹1 करोड़ की फिरौती की माँग रखी। आरोपियों के निर्देश पर मेरठ के होटल मयूर के कमरा नंबर 221 में ₹10 लाख की फिरौती रकम रखी गई। 16 सितंबर 1995 को फिरौती लेने के दौरान मेरठ पुलिस ने अमित यादव को रंगे हाथों पकड़ा और उसके पास से पूरी ₹10 लाख की रकम बरामद की।
पीड़ित की बरामदगी और सजा
अमित यादव की गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसके गाजियाबाद स्थित किराए के मकान पर पहुँची, जहाँ पीड़ित ऋषि सेठी एक स्टोररूम में जंजीरों से बँधे मिले। उन्हें सुरक्षित बचा लिया गया। यादव के खिलाफ पटेल नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई।
25 अगस्त 1999 को अदालत ने अमित यादव को दोषी करार दिया और ₹2.50 लाख के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई। यादव ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर की और 15 जनवरी 2000 को उसे एक माह की अंतरिम जमानत मिली। हालाँकि, जमानत अवधि समाप्त होने के बाद उसने सरेंडर करने की बजाय फरार होना चुना।
26 साल की फरारी: कैसे बदलता रहा ठिकाना
पूछताछ के दौरान यादव ने बताया कि फरार होने के बाद उसने गाजियाबाद का किराए का मकान छोड़ दिया और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज सभी संपर्क तोड़ दिए। उसने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सैदपुर गाँव में अपनी पुश्तैनी संपत्ति भी बेच दी।
इसके बाद वह पहले ऋषिकेश पहुँचा, जहाँ वह लगातार अपना ठिकाना बदलता रहा। 2001 में वह देहरादून आ गया, जहाँ उसने अपनी पहचान बदली, नई जिंदगी शुरू की और कंस्ट्रक्शन व्यवसाय में कदम रखा। धीरे-धीरे वह देहरादून में एक बिल्डर के रूप में स्थापित हो गया। गौरतलब है कि इस दौरान उसे 'घोषित अपराधी' करार दिया जा चुका था।
एजेंसियों की कोशिश और अंततः गिरफ्तारी
साल 2000 में यादव की गिरफ्तारी पर ₹5,000 का इनाम घोषित किया गया था। विभिन्न एजेंसियों की लगातार कोशिशों के बावजूद वह करीब 26 वर्षों तक गिरफ्तारी से बचता रहा। अंततः दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एसएआरएससी टीम ने उसे देहरादून से दबोचा। यह गिरफ्तारी दर्शाती है कि लंबे समय से फरार अपराधियों के खिलाफ पुलिस की निगरानी निरंतर जारी रहती है।
आगे क्या होगा
अमित यादव को अब न्यायिक हिरासत में भेजा जाएगा और उसे उम्रकैद की सजा काटनी होगी। दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित अपील की स्थिति और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर अधिकारियों की नज़र रहेगी। यह मामला भगोड़े दोषियों के खिलाफ चल रहे अभियान की एक महत्वपूर्ण सफलता के रूप में देखा जा रहा है।