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26 साल बाद पकड़ा गया उम्रकैद का भगोड़ा: दिल्ली पुलिस ने देहरादून से अमित यादव को किया गिरफ्तार

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26 साल बाद पकड़ा गया उम्रकैद का भगोड़ा: दिल्ली पुलिस ने देहरादून से अमित यादव को किया गिरफ्तार

सारांश

26 साल की फरारी, बदली पहचान और देहरादून में बिल्डर बनकर छिपे एक उम्रकैद के दोषी को दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने आखिरकार दबोच लिया। 1995 के ₹1 करोड़ फिरौती अपहरण मामले में सजायाफ्ता अमित यादव जमानत मिलते ही फरार हो गया था।

मुख्य बातें

दिल्ली पुलिस की एसएआरएससी टीम ने 17 अगस्त 2026 को देहरादून से अमित यादव (57) को गिरफ्तार किया।
यादव 1995 के ₹1 करोड़ फिरौती अपहरण मामले में उम्रकैद की सजा पाया हुआ दोषी है।
15 जनवरी 2000 को अंतरिम जमानत मिलने के बाद वह सरेंडर नहीं किया और 26 वर्षों तक फरार रहा।
साल 2000 में उसकी गिरफ्तारी पर ₹5,000 का इनाम घोषित किया गया था और उसे 'घोषित अपराधी' करार दिया गया था।
फरारी के दौरान यादव ने पहचान बदलकर देहरादून में बिल्डर के रूप में नई जिंदगी शुरू की थी।
पीड़ित ऋषि सेठी को गाजियाबाद के एक स्टोररूम में जंजीरों से बँधे पाया गया था और उन्हें सुरक्षित बचाया गया था।

दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एसएआरएससी टीम ने 17 अगस्त 2026 को देहरादून, उत्तराखंड से 57 वर्षीय अमित यादव को गिरफ्तार किया — एक ऐसा भगोड़ा अपराधी जो 26 वर्षों से कानून की पकड़ से बाहर था। यादव को 1995 के एक हाई-प्रोफाइल अपहरण मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, जिसमें पीड़ित से ₹1 करोड़ की फिरौती माँगी गई थी। साल 2000 में जमानत पर छूटने के बाद वह सरेंडर नहीं किया और फरार हो गया था, जिसके बाद उसकी गिरफ्तारी पर ₹5,000 का इनाम घोषित किया गया था।

मुख्य घटनाक्रम: 1995 का अपहरण

12 सितंबर 1995 को शाम करीब 7 बजे पीड़ित ऋषि सेठी एम्स के डायरेक्टर के आवास के निकट अपनी कार में बैठे थे, तभी 3-4 लोगों ने उन्हें जबरदस्ती अपने कब्जे में ले लिया। आरोपियों ने उनके साथ मारपीट की, आँखों पर पट्टी बाँधी और उन्हीं की कार से अपहरण कर लिया। इसके बाद उन्हें एक अज्ञात स्थान पर बंधक बनाकर रखा गया।

अपहरणकर्ताओं ने पीड़ित के परिवार से ₹1 करोड़ की फिरौती की माँग रखी। आरोपियों के निर्देश पर मेरठ के होटल मयूर के कमरा नंबर 221 में ₹10 लाख की फिरौती रकम रखी गई। 16 सितंबर 1995 को फिरौती लेने के दौरान मेरठ पुलिस ने अमित यादव को रंगे हाथों पकड़ा और उसके पास से पूरी ₹10 लाख की रकम बरामद की।

पीड़ित की बरामदगी और सजा

अमित यादव की गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसके गाजियाबाद स्थित किराए के मकान पर पहुँची, जहाँ पीड़ित ऋषि सेठी एक स्टोररूम में जंजीरों से बँधे मिले। उन्हें सुरक्षित बचा लिया गया। यादव के खिलाफ पटेल नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई।

25 अगस्त 1999 को अदालत ने अमित यादव को दोषी करार दिया और ₹2.50 लाख के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई। यादव ने दिल्ली उच्च न्यायालय में अपील दायर की और 15 जनवरी 2000 को उसे एक माह की अंतरिम जमानत मिली। हालाँकि, जमानत अवधि समाप्त होने के बाद उसने सरेंडर करने की बजाय फरार होना चुना।

26 साल की फरारी: कैसे बदलता रहा ठिकाना

पूछताछ के दौरान यादव ने बताया कि फरार होने के बाद उसने गाजियाबाद का किराए का मकान छोड़ दिया और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज सभी संपर्क तोड़ दिए। उसने उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के सैदपुर गाँव में अपनी पुश्तैनी संपत्ति भी बेच दी।

इसके बाद वह पहले ऋषिकेश पहुँचा, जहाँ वह लगातार अपना ठिकाना बदलता रहा। 2001 में वह देहरादून आ गया, जहाँ उसने अपनी पहचान बदली, नई जिंदगी शुरू की और कंस्ट्रक्शन व्यवसाय में कदम रखा। धीरे-धीरे वह देहरादून में एक बिल्डर के रूप में स्थापित हो गया। गौरतलब है कि इस दौरान उसे 'घोषित अपराधी' करार दिया जा चुका था।

एजेंसियों की कोशिश और अंततः गिरफ्तारी

साल 2000 में यादव की गिरफ्तारी पर ₹5,000 का इनाम घोषित किया गया था। विभिन्न एजेंसियों की लगातार कोशिशों के बावजूद वह करीब 26 वर्षों तक गिरफ्तारी से बचता रहा। अंततः दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एसएआरएससी टीम ने उसे देहरादून से दबोचा। यह गिरफ्तारी दर्शाती है कि लंबे समय से फरार अपराधियों के खिलाफ पुलिस की निगरानी निरंतर जारी रहती है।

आगे क्या होगा

अमित यादव को अब न्यायिक हिरासत में भेजा जाएगा और उसे उम्रकैद की सजा काटनी होगी। दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित अपील की स्थिति और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर अधिकारियों की नज़र रहेगी। यह मामला भगोड़े दोषियों के खिलाफ चल रहे अभियान की एक महत्वपूर्ण सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि एक 'घोषित अपराधी' ढाई दशक से अधिक समय तक न केवल फरार रहा, बल्कि उत्तराखंड में बिल्डर बनकर खुलेआम कारोबार भी करता रहा। ₹5,000 के इनाम की राशि — जो 2000 में ही नाकाफी थी — यह भी दर्शाती है कि भगोड़े दोषियों के खिलाफ प्रोत्साहन तंत्र कितना कमज़ोर है। यह मामला उन सैकड़ों 'घोषित अपराधियों' की याद दिलाता है जो पहचान बदलकर सामान्य जीवन जी रहे हैं — और जिनकी तलाश के लिए संसाधन व इच्छाशक्ति दोनों पर पुनर्विचार ज़रूरी है।
RashtraPress
17 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमित यादव को किस मामले में उम्रकैद की सजा हुई थी?
अमित यादव को 1995 में ऋषि सेठी के अपहरण और ₹1 करोड़ की फिरौती माँगने के मामले में 25 अगस्त 1999 को दोषी ठहराया गया था और ₹2.50 लाख के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। यह मामला पटेल नगर थाने में दर्ज था।
अमित यादव 26 साल तक कैसे फरार रहा?
जनवरी 2000 में अंतरिम जमानत मिलने के बाद यादव ने सरेंडर नहीं किया। उसने गाजियाबाद का घर छोड़ा, पुश्तैनी संपत्ति बेची, पहले ऋषिकेश और फिर 2001 में देहरादून में नई पहचान के साथ बस गया। वहाँ उसने कंस्ट्रक्शन व्यवसाय शुरू किया और बिल्डर बन गया।
पीड़ित ऋषि सेठी को कैसे बचाया गया था?
16 सितंबर 1995 को मेरठ में फिरौती लेते वक्त अमित यादव की गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसके गाजियाबाद के किराए के मकान पर पहुँची, जहाँ ऋषि सेठी एक स्टोररूम में जंजीरों से बँधे मिले। उन्हें सुरक्षित बचा लिया गया।
दिल्ली पुलिस की एसएआरएससी टीम क्या है?
एसएआरएससी (SARSC) दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की एक विशेष इकाई है जो भगोड़े और घोषित अपराधियों की तलाश और गिरफ्तारी के लिए काम करती है। इसी टीम ने 26 साल से फरार अमित यादव को देहरादून से पकड़ा।
अमित यादव की गिरफ्तारी पर इनाम कब और कितना घोषित हुआ था?
साल 2000 में यादव के फरार होने के बाद उसकी गिरफ्तारी पर ₹5,000 का इनाम घोषित किया गया था और उसे 'घोषित अपराधी' भी करार दिया गया था। इसके बावजूद वह करीब 26 वर्षों तक पकड़ से बाहर रहा।
राष्ट्र प्रेस
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