22 सितंबर 2026
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दिल्ली SIR: 47 लाख नाम हटाने के दावे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग को 2 सप्ताह में जवाब देने का आदेश

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दिल्ली SIR: 47 लाख नाम हटाने के दावे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग को 2 सप्ताह में जवाब देने का आदेश

सारांश

दिल्ली की मतदाता सूची से 47 लाख नाम हटाए जाने का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। अदालत ने चुनाव आयोग को दो सप्ताह में जवाब देने को कहा। जस्टिस बागची ने नोटिस प्रक्रिया को 'कंप्यूटर-जनित' बताते हुए जाँच का निर्देश दिया — यह मामला मतदाता अधिकारों की रक्षा की कसौटी बन सकता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में जवाब माँगा।
वकील प्रशांत भूषण ने दावा किया कि दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 47 लाख से अधिक नाम हटाए गए।
33 लाख लोगों को नोटिस भेजे गए; कारण 'रिकॉर्ड में कमी' बताई गई।
आयोग ने बताया कि 14,000 BLO और 1,200 ERO तैनात हैं और 29 अक्टूबर 2026 समयसीमा निर्धारित है।
जस्टिस बागची ने नोटिसों को 'कंप्यूटर-जनित' बताते हुए जाँच का निर्देश दिया।
आयोग ने आश्वासन दिया कि एक भी मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटाया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय ने 22 सितंबर 2026 को दिल्ली में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची से 47 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के दावों पर चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर लिखित जवाब माँगा है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में पेश वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं।

मुख्य घटनाक्रम

याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 47 लाख से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 33 लाख लोगों को नोटिस भेजे गए हैं, जिनमें कारण के रूप में 'रिकॉर्ड में कमी' दर्ज है।

भूषण ने कहा, 'दिल्ली में पहले 47 लाख नाम डिलीट किए। बंगाल में अपील निपटाने में 12 साल लगेंगे। ड्राफ्ट रोल में 47 लाख डिलीट कर दिए। ज्यादातर को आयोग कहता है कि शिफ्ट कर दिए गए हैं।'

चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया

आयोग की ओर से वकील डी. एस. नायडू ने कहा कि उन्हें याचिका की प्रति प्राप्त नहीं हुई थी। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने एक सप्ताह पहले एक अभ्यावेदन दिया था और आयोग के जवाब देने से पहले ही वे सीधे अदालत पहुँच गए।

आयोग ने अदालत को आश्वस्त किया कि उसने प्रेस नोट जारी किया है, हर नोटिस में कारण स्पष्ट लिखे गए हैं और पेंडेंसी प्रबंधन के लिए मैनपावर बढ़ाई गई है। आयोग ने यह भी कहा कि 14,000 बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और 1,200 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) तैनात किए गए हैं।

न्यायपीठ की टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव आयोग को इन शिकायतों की जाँच करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि नोटिस ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे वे कंप्यूटर-जनित हों। जस्टिस बागची ने कहा, 'कृपया इसकी जाँच करें। वे कह रहे हैं कि नोटिस किसी खास श्रेणी में जा रहा है। संबंधित व्यक्ति को पता होता है कि LD की श्रेणी क्या है।'

मुख्य न्यायाधीश ने भी टिप्पणी की कि आयोग को प्रक्रिया में 'तार्किक अंतर' को स्पष्ट करने की आवश्यकता है। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता को लेकर बहस तेज हो रही है।

आम मतदाताओं पर असर

गौरतलब है कि दिल्ली एक चुनावी राज्य नहीं है इस समय, फिर भी 47 लाख से अधिक नाम हटाए जाने का दावा राजधानी के लाखों निवासियों के मताधिकार को प्रभावित कर सकता है। आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने की यह प्रक्रिया समाज के कमज़ोर वर्गों को अनुपातहीन रूप से प्रभावित करती है।

चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि 29 अक्टूबर 2026 की समयसीमा निर्धारित है और यदि कार्य पूर्ण न हो सका तो वह विस्तार के लिए तैयार है। आयोग ने स्पष्ट किया कि 'एक भी मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटाया जाएगा।'

आगे क्या होगा

सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को दो सप्ताह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई में अदालत यह भी देख सकती है कि SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई अंतरिम आदेश आवश्यक है या नहीं। यह मामला मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया की स्वायत्तता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

और जस्टिस बागची की 'कंप्यूटर-जनित नोटिस' वाली टिप्पणी इस प्रक्रिया की खोखली पारदर्शिता को उजागर करती है। असली चिंता यह है कि बंगाल में अपील निपटाने में 12 साल लगने का उदाहरण देते हुए प्रशांत भूषण ने जो पैटर्न रेखांकित किया, वह बताता है कि संस्थागत उदासीनता एकमुश्त कटौती से ज्यादा खतरनाक है। सर्वोच्च न्यायालय की यह सुनवाई ECI को जवाबदेह ठहराने का एक दुर्लभ अवसर है — लेकिन केवल नोटिस से बदलाव नहीं होगा, बाध्यकारी पारदर्शिता मानक चाहिए।
RashtraPress
22 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दिल्ली SIR क्या है और इसमें विवाद क्यों है?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मतदाता सूची को अद्यतन करने की एक प्रक्रिया है। विवाद इसलिए है क्योंकि दावा किया जा रहा है कि दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 47 लाख से अधिक नाम हटाए गए हैं और 33 लाख लोगों को अस्पष्ट कारणों वाले नोटिस भेजे गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या निर्देश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने 22 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। जस्टिस बागची ने आयोग को नोटिस प्रक्रिया की जाँच करने को भी कहा।
क्या हटाए गए नाम वापस जोड़े जा सकते हैं?
चुनाव आयोग ने कहा है कि अधिकांश नाम 'शिफ्ट किए गए' हैं, हटाए नहीं गए। आयोग ने आश्वासन दिया है कि 29 अक्टूबर 2026 की समयसीमा तक प्रक्रिया पूरी होगी और एक भी मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटाया जाएगा।
दिल्ली में SIR के लिए कितने अधिकारी तैनात हैं?
चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि 14,000 बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और 1,200 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) तैनात किए गए हैं।
इस मामले में अगली सुनवाई कब होगी?
सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। उसके बाद अदालत यह तय करेगी कि SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए कोई अंतरिम आदेश आवश्यक है या नहीं।
राष्ट्र प्रेस
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