दिल्ली SIR: 47 लाख नाम हटाने के दावे पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग को 2 सप्ताह में जवाब देने का आदेश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 22 सितंबर 2026 को दिल्ली में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूची से 47 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के दावों पर चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी करते हुए दो सप्ताह के भीतर लिखित जवाब माँगा है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में पेश वकील प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं।
मुख्य घटनाक्रम
याचिकाकर्ता की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 47 लाख से ज्यादा नाम हटा दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 33 लाख लोगों को नोटिस भेजे गए हैं, जिनमें कारण के रूप में 'रिकॉर्ड में कमी' दर्ज है।
भूषण ने कहा, 'दिल्ली में पहले 47 लाख नाम डिलीट किए। बंगाल में अपील निपटाने में 12 साल लगेंगे। ड्राफ्ट रोल में 47 लाख डिलीट कर दिए। ज्यादातर को आयोग कहता है कि शिफ्ट कर दिए गए हैं।'
चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया
आयोग की ओर से वकील डी. एस. नायडू ने कहा कि उन्हें याचिका की प्रति प्राप्त नहीं हुई थी। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने एक सप्ताह पहले एक अभ्यावेदन दिया था और आयोग के जवाब देने से पहले ही वे सीधे अदालत पहुँच गए।
आयोग ने अदालत को आश्वस्त किया कि उसने प्रेस नोट जारी किया है, हर नोटिस में कारण स्पष्ट लिखे गए हैं और पेंडेंसी प्रबंधन के लिए मैनपावर बढ़ाई गई है। आयोग ने यह भी कहा कि 14,000 बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और 1,200 इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) तैनात किए गए हैं।
न्यायपीठ की टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि चुनाव आयोग को इन शिकायतों की जाँच करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि नोटिस ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे वे कंप्यूटर-जनित हों। जस्टिस बागची ने कहा, 'कृपया इसकी जाँच करें। वे कह रहे हैं कि नोटिस किसी खास श्रेणी में जा रहा है। संबंधित व्यक्ति को पता होता है कि LD की श्रेणी क्या है।'
मुख्य न्यायाधीश ने भी टिप्पणी की कि आयोग को प्रक्रिया में 'तार्किक अंतर' को स्पष्ट करने की आवश्यकता है। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में मतदाता सूची संशोधन प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता को लेकर बहस तेज हो रही है।
आम मतदाताओं पर असर
गौरतलब है कि दिल्ली एक चुनावी राज्य नहीं है इस समय, फिर भी 47 लाख से अधिक नाम हटाए जाने का दावा राजधानी के लाखों निवासियों के मताधिकार को प्रभावित कर सकता है। आलोचकों का कहना है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने की यह प्रक्रिया समाज के कमज़ोर वर्गों को अनुपातहीन रूप से प्रभावित करती है।
चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि 29 अक्टूबर 2026 की समयसीमा निर्धारित है और यदि कार्य पूर्ण न हो सका तो वह विस्तार के लिए तैयार है। आयोग ने स्पष्ट किया कि 'एक भी मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटाया जाएगा।'
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को दो सप्ताह के भीतर लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई में अदालत यह भी देख सकती है कि SIR प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोई अंतरिम आदेश आवश्यक है या नहीं। यह मामला मतदाता सूची की विश्वसनीयता और चुनावी प्रक्रिया की स्वायत्तता के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।