दिल्ली विधानसभा स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने स्थायी समितियों की कार्यशाला का उद्घाटन किया, सुशासन और जवाबदेही पर दिया बल
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली विधानसभा के स्पीकर विजेंद्र गुप्ता ने मंगलवार, 14 जुलाई को वित्तीय समितियों और विभाग-संबंधी स्थायी समितियों (डीआरएससी) के अध्यक्षों के लिए एक विशेष कार्यशाला का उद्घाटन किया। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य नवनियुक्त समिति अध्यक्षों को संवैधानिक, प्रक्रियात्मक और कार्यात्मक पहलुओं से परिचित कराना और विधायी निगरानी को सुदृढ़ करना था।
स्पीकर का संबोधन: समिति प्रणाली की भूमिका
समिति प्रमुखों को संबोधित करते हुए विजेंद्र गुप्ता ने कहा, 'विधानमंडल का ज़्यादातर विस्तृत और महत्वपूर्ण काम उसकी समिति प्रणाली के ज़रिए होता है, जहाँ सदस्य नीतियों की जाँच करते हैं, सार्वजनिक खर्च की बारीकी से समीक्षा करते हैं, विभागों के कामकाज का जायज़ा लेते हैं और जानकारीपूर्ण व रचनात्मक चर्चा के ज़रिए सरकारी कार्यक्रमों के लागू होने का आकलन करते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि समिति प्रणाली विधायी कामकाज की सबसे बेहतरीन परंपराओं में से एक है।
जवाबदेही और पारदर्शिता पर ज़ोर
स्पीकर ने नवनियुक्त अध्यक्षों को बधाई देते हुए स्पष्ट किया कि उनकी नियुक्ति महज एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि जवाबदेही, पारदर्शिता और सुशासन सुनिश्चित करने वाली विधानमंडल की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं को मज़बूत करने का एक अवसर है। गुप्ता ने कहा कि धैर्यपूर्वक चर्चा, बारीकी से जाँच और साक्ष्य-आधारित सिफारिशों के ज़रिए समितियाँ न केवल कार्यपालिका की जवाबदेही को सुदृढ़ करती हैं, बल्कि समग्र शासन की गुणवत्ता को भी बेहतर बनाती हैं।
स्थायी समितियों का बढ़ता दायरा
स्पीकर ने रेखांकित किया कि जैसे-जैसे शासन का दायरा और जटिलता बढ़ी है, स्थायी समितियाँ विधायी लोकतंत्र के मुख्य स्तंभों के रूप में विकसित हुई हैं। ये समितियाँ एक ऐसा संस्थागत मंच प्रदान करती हैं जहाँ सदस्य राजनीतिक बहस की तात्कालिकता से ऊपर उठकर मुद्दों की उनके गुण-दोष के आधार पर सामूहिक जाँच करते हैं। सार्वजनिक वित्त, शहरी विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, प्रौद्योगिकी और पर्यावरणीय स्थिरता जैसे आपस में जुड़े क्षेत्रों की साक्ष्य-आधारित जाँच इन समितियों के कार्यक्षेत्र में आती है।
नागरिकों की बदलती अपेक्षाएँ
गुप्ता ने इस बात पर ज़ोर दिया कि आज के नागरिक केवल प्रतिनिधित्व की उम्मीद नहीं करते, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही, तत्परता और सार्वजनिक सेवा वितरण में ठोस सुधार की भी अपेक्षा रखते हैं। उन्होंने कहा कि नई बनी स्थायी समितियाँ दिल्ली विधानसभा को दिल्ली के निवासियों की रोज़मर्रा की चिंताओं के साथ अपने जुड़ाव को गहरा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर देती हैं।
प्रभावशीलता की कसौटी
स्पीकर ने अंत में स्पष्ट किया कि समितियों की प्रभावशीलता को बैठकों की संख्या से नहीं, बल्कि चर्चाओं की गुणवत्ता, सिफारिशों की प्रासंगिकता और शासन में लाए गए सकारात्मक बदलावों से मापा जाएगा। गौरतलब है कि यह कार्यशाला ऐसे समय में आयोजित हुई है जब दिल्ली विधानसभा में नई समितियों का गठन हाल ही में हुआ है और विधायी निगरानी को लेकर राजनीतिक चर्चाएँ तेज़ हैं। आने वाले सत्रों में इन समितियों के कार्य की दिशा यह तय करेगी कि सुशासन का यह संकल्प ज़मीन पर कितना उतरता है।