देवकीनंदन ठाकुर की माँग: मंदिरों के लिए 'सनातन बोर्ड' बने, रात के विवाह पर पुनर्विचार करे समाज
सारांश
मुख्य बातें
प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने 16 जून 2026 को भोपाल में रात्रिकालीन विवाह परंपरा, शादियों में बढ़ते मद्यपान, मंदिर प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप और राम मंदिर दान पात्र विवाद जैसे संवेदनशील सामाजिक-धार्मिक मुद्दों पर अपने विचार खुलकर रखे। उन्होंने हिंदू समाज से प्राचीन शास्त्रीय परंपराओं की ओर लौटने का आह्वान किया और मंदिरों के स्वायत्त संचालन के लिए एक स्वतंत्र 'सनातन बोर्ड' के गठन की माँग की।
रात्रिकालीन विवाह पर शास्त्रीय आपत्ति
देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि शास्त्रों में समय का विभाजन देवताओं, पितरों और दैत्यों के काल में किया गया है — और रात का समय दैत्यों का माना जाता है। उनके अनुसार, 'दैत्यों के समय में विवाह करके दैवीय और आदर्श जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।' उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय परंपरा में 'गोधूलि बेला' — यानी सूर्यास्त के ठीक पहले का समय — विवाह के लिए सर्वाधिक शुभ माना जाता था और सभी प्रमुख संस्कार तथा फेरे दिन के उजाले में ही संपन्न होते थे।
उन्होंने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि मुगल काल में बेटियों की सुरक्षा को लेकर उत्पन्न भय के कारण लोगों ने मजबूरीवश रात में छिपकर विवाह करना शुरू किया था। धीरे-धीरे यह आपातकालीन व्यवस्था एक स्थायी परंपरा बन गई। उनका तर्क है कि अब वैसी परिस्थितियाँ नहीं रहीं, इसलिए समाज को शोर-शराबे और दिखावे से दूर रहकर पुनः दिन में विवाह की पवित्र परंपरा अपनानी चाहिए।
विवाह में मद्यपान पर गहरी चिंता
ठाकुर ने शादियों में शराब परोसे जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि विवाह हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है और ऐसे पवित्र अवसर पर मद्यपान 'अत्यंत दूषित' कृत्य है। उनके अनुसार इसका नकारात्मक प्रभाव केवल तत्कालीन परिवार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और बच्चों के संस्कारों पर भी पड़ता है। उन्होंने कहा, 'विवाह को जितना अधिक पवित्र रखा जाएगा, समाज उतना ही स्वस्थ और संस्कारित बनेगा।'
राम मंदिर दान पात्र विवाद और न्यायिक विलंब
राम मंदिर दान पात्र विवाद पर टिप्पणी करते हुए देवकीनंदन ठाकुर ने शास्त्रों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में उल्लेख है कि मंदिर के धन का दुरुपयोग करने वाले को 60 हजार वर्षों तक कठोर दंड भोगना पड़ता है। उनका मानना है कि यदि लोगों को इस धार्मिक दंड-विधान की वास्तविक जानकारी हो, तो कोई भी मंदिर की संपत्ति से छेड़छाड़ करने का साहस नहीं करेगा।
न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति पर भी उन्होंने चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अदालतों में जाँच और सुनवाई इतनी लंबी खिंच जाती है कि फैसला आने से पहले ही वर्षों बीत जाते हैं। उन्होंने माँग की कि जिन लोगों ने श्रीराम की मर्यादा का उल्लंघन किया है, उनसे तत्काल धन वापस लिया जाए और दोषियों को बिना विलंब उनके पदों से हटाया जाए।
'सनातन बोर्ड' की माँग: सरकारी हस्तक्षेप का विरोध
मंदिर प्रबंधन के मुद्दे पर देवकीनंदन ठाकुर ने सरकारी नियंत्रण का स्पष्ट विरोध किया। उन्होंने कहा कि मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं का संचालन धर्म के मर्मज्ञ और धर्मनिष्ठ लोगों के हाथों में होना चाहिए, न कि सरकारी अधिकारियों के। इसके लिए उन्होंने एक स्वतंत्र 'सनातन बोर्ड' के गठन की माँग रखी, जिसका अध्यक्ष चारों शंकराचार्यों में से किसी एक को बनाया जाए। उनका तर्क है कि इससे सनातन धर्म की संस्थाओं का संचालन सही दिशा और आस्था के अनुरूप हो सकेगा।
आगे की दिशा
देवकीनंदन ठाकुर के ये विचार ऐसे समय में आए हैं जब मंदिर प्रबंधन और धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता का प्रश्न राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है। गौरतलब है कि कई राज्यों में हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण और उनके राजस्व के उपयोग को लेकर धार्मिक संगठन लंबे समय से आवाज़ उठाते रहे हैं। 'सनातन बोर्ड' की माँग इस व्यापक बहस में एक नया और ठोस प्रस्ताव जोड़ती है, जिस पर धार्मिक और राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रिया आना स्वाभाविक है।