धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा 15-20 दिन पहले होता तो तनाव नहीं बढ़ता: छगन भुजबल
सारांश
मुख्य बातें
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री छगन भुजबल ने 26 जुलाई को मुंबई में मीडिया से बात करते हुए कहा कि यदि केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा 15 से 20 दिन पहले आ गया होता, तो देशभर में जो तनावपूर्ण माहौल बना, वह टाला जा सकता था। भुजबल ने यह भी स्पष्ट किया कि जनता की नाराज़गी दूर करने का एकमात्र रास्ता खुला संवाद और लोगों की बात सुनना है।
भुजबल का सीधा बयान
भुजबल ने कहा, 'अगर यह इस्तीफा पहले हो जाता, तो जो तनावपूर्ण स्थिति बनी, वह नहीं बनती। जो इस्तीफा उन्होंने शनिवार को दिया, अगर वही 15-20 दिन पहले दे देते तो हालात अलग होते।' उन्होंने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें 26 दिनों तक अनशन करना पड़ा और इन सभी घटनाओं का गुस्सा लोगों में साफ दिखाई दिया।
आंदोलन का व्यापक असर
भुजबल ने ज़ोर देकर कहा कि यह मामला केवल दिल्ली के जंतर-मंतर तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, यह उदाहरण नासिक, महाराष्ट्र और पूरे देश के लिए प्रासंगिक है। सरकार को चाहिए कि वह लोगों की बात सुने और उनके साथ लगातार संवाद बनाए रखे।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की पृष्ठभूमि
धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को केंद्रीय शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दिया। इससे पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में छात्रों के नेतृत्व में कई सप्ताहों तक बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारी नीट-यूजी पेपर लीक विवाद सहित परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों को लेकर जवाबदेही और प्रधान के इस्तीफे की माँग कर रहे थे।
यह इस्तीफा उस समय आया जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के विरुद्ध पुलिस कार्रवाई को लेकर देशभर में आलोचना तेज़ हो गई थी।
सोनम वांगचुक और आंदोलन को मिली गति
18 जुलाई की सुबह जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर से हटाकर अस्पताल पहुँचाया। पुलिस ने स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं, चिकित्सकीय सलाह और दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश का हवाला दिया। वांगचुक भी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर अनशन पर बैठे थे, जिससे इस आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन मिला।
आगे क्या
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब यह देखना होगा कि केंद्र सरकार नीट-यूजी विवाद और परीक्षा प्रणाली में सुधार के सवालों पर क्या ठोस कदम उठाती है। भुजबल के बयान ने यह संकेत भी दिया है कि सत्तारूढ़ महागठबंधन के भीतर भी इस देरी को लेकर असंतोष था।