मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखें दुरुस्त: सरकार की सलाह — पहेलियाँ और दिमागी खेल अपनाएँ
सारांश
मुख्य बातें
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार ने 28 अगस्त को एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर नागरिकों को — विशेष रूप से वरिष्ठ आयु वर्ग को — सलाह दी कि मस्तिष्क को सक्रिय रखना संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना शरीर के लिए नियमित व्यायाम। मंत्रालय ने लिखा: 'अपने मस्तिष्क को व्यस्त रखें। मानसिक प्रेरणा (उद्दीपन) से स्मृति और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य बेहतर होता है। पहेलियाँ हल करें, दिमागी खेल खेलें और जिज्ञासु बने रहें।'
मंत्रालय की मुख्य अनुशंसाएँ
मंत्रालय के अनुसार, मस्तिष्क को निष्क्रिय छोड़ना संज्ञानात्मक क्षमता के ह्रास को तेज़ कर सकता है। सरकार ने तीन मुख्य उपाय सुझाए हैं — पहेलियाँ हल करना, दिमागी खेल खेलना और जिज्ञासु बने रहना। ये तीनों गतिविधियाँ मिलकर मस्तिष्क की तंत्रिकाओं को सक्रिय रखती हैं और स्मृति को मज़बूत बनाती हैं।
पहेलियाँ और दिमागी खेल का महत्त्व
सुबह के अखबार में छपने वाला सुडोकू या क्रॉसवर्ड महज़ समय बिताने का साधन नहीं है — यह मस्तिष्क के लिए एक प्रकार का 'जिम' है। जब कोई व्यक्ति पहेली सुलझाता है, तो मस्तिष्क की तंत्रिकाएँ तेज़ी से सक्रिय होती हैं, जिससे याददाश्त और तार्किक सोच दोनों में सुधार होता है।
इसी तरह शतरंज, कैरम और लूडो जैसे पारंपरिक दिमागी खेल रणनीतिक सोच और एकाग्रता को बढ़ावा देते हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देश में बुज़ुर्ग आबादी तेज़ी से बढ़ रही है और डिमेंशिया जैसी स्थितियों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता भी गहरी हो रही है। गौरतलब है कि परिवार में दादा-दादी और नाना-नानी के साथ बच्चे यदि ये खेल खेलें, तो दोनों पीढ़ियों को समान रूप से लाभ होता है।
उम्र के साथ संज्ञानात्मक क्षमता पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, उम्र बढ़ने के साथ भूलने की समस्या — जैसे रखी हुई वस्तु याद न रहना या किसी का नाम याद करने में देर लगना — संज्ञानात्मक स्वास्थ्य के कमज़ोर होने के प्रारंभिक संकेत हो सकते हैं। मंत्रालय का सुझाव है कि यदि इन गतिविधियों को जीवनशैली का हिस्सा बना लिया जाए, तो इस गिरावट को काफी हद तक धीमा किया जा सकता है।
जिज्ञासा और निरंतर सीखना
मंत्रालय ने यह भी रेखांकित किया कि सीखने की प्रक्रिया कभी नहीं रुकनी चाहिए। नई किताबें पढ़ना, अपरिचित विषयों पर जानकारी जुटाना, लोगों से संवाद करना और नई गतिविधियाँ आज़माना — ये सभी मस्तिष्क को नई सूचनाएँ ग्रहण करने के लिए तैयार रखते हैं। जिज्ञासु मन उम्र के साथ भी संज्ञानात्मक रूप से सतर्क बना रहता है।
सरकार की यह पहल बुज़ुर्ग नागरिकों की मानसिक सेहत को लेकर नीतिगत जागरूकता का संकेत देती है। आने वाले समय में इस दिशा में और अभियानों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।