डूसू चुनाव 2026 से पहले एआईएसआई का 'बदलो डीयू, बदलो डूसू' मार्च, नेहा बोरा भी शामिल
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव से ठीक पहले ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसआई) ने दिल्ली विश्वविद्यालय परिसर में 'बदलो डीयू, बदलो डूसू' मार्च की घोषणा की। इस कार्यक्रम में एआईएसआई की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा भी शामिल हुईं। एआईएसआई के उम्मीदवार अनन्या और अक्षत ने इस मार्च का नेतृत्व करते हुए छात्रों के दीर्घकालिक मुद्दों को केंद्र में रखा।
मार्च का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
एआईएसआई उम्मीदवार अनन्या ने कहा कि जंतर-मंतर पर हुए ऐतिहासिक आंदोलन की वजह से आज की पीढ़ी इस लड़ाई में सक्रिय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल एक नेता को हटा देने से कुछ नहीं बदलेगा — उनके अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय में हजारों ऐसे लोग हैं जो छात्रों के भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं। उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) पर भी निशाना साधा।
छात्रों के प्रमुख मुद्दे
अनन्या ने यूजीसी की गाइडलाइन का हवाला देते हुए कहा कि नियमों के अनुसार कम से कम 60 प्रतिशत छात्रों को हॉस्टल मिलना चाहिए, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है। हॉस्टल न मिलने के कारण छात्रों को महंगे पीजी में रहना पड़ रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि डूसू चुनाव के दौरान थार और डिफेंडर जैसी लग्ज़री गाड़ियों के काफिले परिसर में नज़र आते हैं, जबकि आम छात्र मुश्किल हालात में वोट डालने आते हैं। उनके अनुसार, कैंपस की राजनीति को गुंडागर्दी और ऐशो-आराम तक सीमित कर दिया गया है।
फीस वृद्धि और शैक्षणिक चिंताएँ
एआईएसआई उम्मीदवार अक्षत ने बताया कि कई संस्थानों में एक ही वर्ष में 45 प्रतिशत तक फीस बढ़ाई गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकारी संस्थानों में ही इतनी भारी फीस वृद्धि होगी, तो छात्र उच्च शिक्षा कैसे हासिल कर पाएंगे। इसके साथ ही उन्होंने 'योग फिट इंडिया' जैसे पाठ्यक्रमों को मुख्य डिग्री में शामिल किए जाने का विरोध किया, जिससे कथित तौर पर मूल शिक्षा कमज़ोर हो रही है।
मेट्रो पास और कानूनी लड़ाई
अक्षत ने बताया कि एआईएसआई एकमात्र ऐसी संस्था है जिसने 2018 में मेट्रो कन्वेंशनल पास के लिए संघर्ष किया, जिसके परिणामस्वरूप आज डीटीसी कन्वेंशनल पास मान्य है। उन्होंने अन्य छात्र संगठनों पर आरोप लगाया कि वे चुनाव से पहले वादे करते हैं, लेकिन बाद में कोई कार्रवाई नहीं करते।
इसके अलावा, अक्षत ने बताया कि उन्होंने बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की, जिसमें चुनाव लड़ने के लिए माता-पिता की अनिवार्य सहमति की शर्त को हटाने की माँग की गई है। यह कदम छात्रों की स्वायत्तता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रयास माना जा रहा है।
डूसू चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, छात्र संगठनों की सक्रियता बढ़ रही है — और इस बार मुद्दे महज़ नारों तक सीमित नहीं, बल्कि अदालती दरवाज़े तक पहुँच चुके हैं।