2 सितंबर 2026
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DUSU चुनावों में 50% महिला आरक्षण की माँग: दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र, यूजीसी और डीयू को भेजा नोटिस

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DUSU चुनावों में 50% महिला आरक्षण की माँग: दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र, यूजीसी और डीयू को भेजा नोटिस

सारांश

दिल्ली विश्वविद्यालय में 53% छात्राएँ हैं, फिर भी DUSU में उनका प्रतिनिधित्व नाममात्र है। याचिकाकर्ता शबाना हुसैन की जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र, UGC और DU को नोटिस थमाया है — यह सवाल अब अदालत के दरवाज़े पर है कि क्या छात्र लोकतंत्र में आधी आबादी को आधी हिस्सेदारी मिलेगी।

मुख्य बातें

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को DUSU और कॉलेज छात्रसंघ चुनावों में 50% महिला आरक्षण की माँग वाली जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया।
नोटिस केंद्र सरकार, UGC, दिल्ली विश्वविद्यालय और DUSU के मुख्य चुनाव अधिकारी को भेजे गए हैं।
याचिकाकर्ता शबाना हुसैन ने रोटेशन के आधार पर 50% सीटें आरक्षित करने की माँग की है; DU में छात्राओं की संख्या करीब 53% है।
याचिका में नारी शक्ति वंदन अधिनियम और उत्तराखंड के 50% महिला आरक्षण मॉडल का हवाला दिया गया है।
सितंबर 2024 में हाई कोर्ट ने इसी विषय पर DU को तीन सप्ताह में निर्णय लेने का निर्देश दिया था।
मामले की अगली सुनवाई नवंबर 2026 में मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ करेगी।

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार, 2 सितंबर 2026 को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) और कॉलेज छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की माँग वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और DUSU चुनाव के मुख्य चुनाव अधिकारी को नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता शबाना हुसैन की इस याचिका पर अगली सुनवाई नवंबर 2026 में निर्धारित की गई है।

याचिका में क्या माँगा गया है

अधिवक्ता आशु बिधूड़ी के माध्यम से दायर इस याचिका में माँग की गई है कि DUSU और कॉलेज छात्रसंघ चुनावों में छात्राओं के लिए रोटेशन के आधार पर 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएँ। याचिका में तर्क दिया गया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्राओं की संख्या करीब 53 प्रतिशत होने के बावजूद निर्वाचित छात्र निकायों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।

याचिका में स्पष्ट किया गया है कि धनबल, बाहुबल, हिंसा और अनियमितताओं के कारण बड़ी संख्या में छात्राएँ चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से हिचकिचाती हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि केवल महिलाओं को चुनाव लड़ने की अनुमति देना पर्याप्त नहीं — वास्तविक समानता के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व भी आवश्यक है।

महिलाओं से जुड़े मुद्दे और छात्र राजनीति

याचिका में यह भी उजागर किया गया है कि छात्राओं से जुड़े महत्त्वपूर्ण मसले — जैसे यौन उत्पीड़न, सुरक्षा और छात्रावासों का कर्फ्यू समय — छात्र राजनीति में पर्याप्त रूप से नहीं उठाए जाते। याचिका में कहा गया है कि 'राजनीतिक भागीदारी केवल मतदान के अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्णय लेने और नीतियाँ बनाने की प्रक्रिया में सार्थक प्रतिनिधित्व भी इसका हिस्सा है।'

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज स्तर पर छात्राओं की अधिक भागीदारी भविष्य की महिला नेताओं को तैयार करने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए अनिवार्य है।

कानूनी और नीतिगत आधार

याचिका में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का हवाला दिया गया है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह सिद्धांत छात्र राजनीति में भी लागू होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, उत्तराखंड सरकार के उस निर्णय का भी उल्लेख किया गया है जिसमें राज्य के विश्वविद्यालयों के छात्रसंघ चुनावों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य किया गया है।

याचिका में लिंगदोह समिति की सिफारिशों का भी उल्लेख है। यह समिति छात्रसंघ चुनावों में धनबल और बाहुबल के प्रभाव को कम करने के लिए गठित की गई थी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इन मानकों का लगातार उल्लंघन होने से चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और समावेशिता प्रभावित हुई है।

मामले का पूर्व इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब यह मसला दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुँचा है। सितंबर 2024 में हाई कोर्ट ने इसी तरह की एक याचिका पर सीधे हस्तक्षेप से इनकार किया था, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय को शबाना हुसैन के आवेदन पर तीन सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया था। तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन की अध्यक्षता वाली पीठ ने विश्वविद्यालय प्रशासन को चुनाव प्रक्रिया के दौरान छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का मौखिक निर्देश भी दिया था।

शबाना हुसैन ने अक्टूबर 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन को और 2024 में केंद्र सरकार तथा अन्य विश्वविद्यालय अधिकारियों को ज्ञापन देकर यही माँग उठाई थी। वर्ष 2017 में दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज छात्रसंघ की उपाध्यक्ष रह चुकी हुसैन ने छात्र राजनीति में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय से दिशा-निर्देश देने की माँग की है।

वर्तमान जनहित याचिका दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा 13 अगस्त 2026 को DUSU चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद दायर की गई है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ इस मामले की अगली सुनवाई नवंबर में करेगी — और तब तक सभी नोटिसियों को अपना पक्ष रखना होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

नेतृत्व तक नहीं पहुँचता। यह याचिका इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तर्क को संसद से उतारकर परिसर की राजनीति तक लाने की कोशिश करती है — एक ऐसा विस्तार जिसे सरकार ने अब तक स्वेच्छा से नहीं किया। लिंगदोह समिति की सिफारिशें वर्षों से कागज़ पर हैं और धनबल-बाहुबल की शिकायतें हर चुनाव में दोहराई जाती हैं — फिर भी सुधार नहीं हुआ। अदालत का हस्तक्षेप ज़रूरी है, लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या DU और केंद्र इस बार महज़ जवाब देंगे या ठोस ढाँचा भी पेश करेंगे।
RashtraPress
2 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

DUSU चुनावों में 50% महिला आरक्षण की माँग क्या है?
याचिकाकर्ता शबाना हुसैन ने माँग की है कि दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ और कॉलेज छात्रसंघ चुनावों में रोटेशन के आधार पर 50 प्रतिशत सीटें छात्राओं के लिए आरक्षित की जाएँ। यह माँग इस तथ्य पर आधारित है कि DU में करीब 53% छात्राएँ होने के बावजूद निर्वाचित छात्र निकायों में उनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने किसे नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई कब है?
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने 2 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार, UGC, दिल्ली विश्वविद्यालय और DUSU के मुख्य चुनाव अधिकारी को नोटिस जारी किए। मामले की अगली सुनवाई नवंबर 2026 में होगी।
याचिका में किन कानूनों और उदाहरणों का हवाला दिया गया है?
याचिका में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का उल्लेख है, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का प्रावधान करता है। इसके अलावा उत्तराखंड सरकार के उस फैसले और लिंगदोह समिति की सिफारिशों का भी हवाला दिया गया है जो छात्रसंघ चुनावों में धनबल-बाहुबल रोकने के लिए बनाई गई थीं।
क्या इससे पहले भी यह मामला हाई कोर्ट में आया था?
हाँ, सितंबर 2024 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी विषय पर सीधे हस्तक्षेप से इनकार किया था, लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय को शबाना हुसैन के आवेदन पर तीन सप्ताह में निर्णय लेने का निर्देश दिया था। तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन की पीठ ने चुनाव के दौरान छात्राओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का मौखिक निर्देश भी दिया था।
याचिकाकर्ता शबाना हुसैन कौन हैं?
शबाना हुसैन वर्ष 2017 में दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज छात्रसंघ की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। उन्होंने अक्टूबर 2023 में DU प्रशासन और 2024 में केंद्र सरकार को ज्ञापन देकर यही माँग उठाई थी, और अब यह मामला जनहित याचिका के रूप में हाई कोर्ट में है।
राष्ट्र प्रेस
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