ईडी की बड़ी कार्रवाई: नकली आईटीसी मामले में 14.85 करोड़ की संपत्तियां जब्त
सारांश
Key Takeaways
- ईडी ने 14.85 करोड़ रुपए की संपत्तियां जब्त की।
- यह कार्रवाई पीएमएलए, 2002 के तहत की गई।
- घोटाले में 15 आरोपी शामिल हैं।
- फर्जी आईटीसी से जुड़े कई कंपनियों का नाम सामने आया।
- जांच अभी भी जारी है।
नई दिल्ली, 31 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नकली इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) घोटाले में कार्रवाई करते हुए 14.85 करोड़ रुपए की संपत्तियों को जब्त किया है। ईडी के ईटानगर उप-क्षेत्र कार्यालय ने 30 मार्च को धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के तहत अस्थायी कुर्की आदेश जारी किया। इस कार्रवाई में चल और अचल दोनों प्रकार की संपत्तियां शामिल हैं।
जांच एजेंसी ने मंगलवार को जारी प्रेस नोट में बताया कि कुर्क की गई संपत्तियों में मेसर्स गणेश इंटरनेशनल के एक भागीदार की सूचीबद्ध कंपनी में 11.88 करोड़ रुपए की शेयरहोल्डिंग शामिल है। इसके अतिरिक्त, हावड़ा और हुगली (पश्चिम बंगाल) तथा गुवाहाटी में स्थित तीन अन्य व्यक्तियों की अचल संपत्तियां भी जब्त की गई हैं। ईडी ने इस मामले में 15 आरोपियों के खिलाफ 30 मार्च को अभियोजन शिकायत भी दर्ज की है।
ईडी ने यह जांच भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की थी। इस मामले में 20 जनवरी 2026 को अरुणाचल प्रदेश, कोलकाता, झारखंड और मणिपुर में कुल 10 ठिकानों पर छापेमारी की गई, जहां से कई आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद किए गए और संबंधित व्यक्तियों के बयान दर्ज किए गए।
जांच में यह खुलासा हुआ कि मेसर्स सिद्धि विनायक ट्रेड मर्चेंट नामक फर्म एक नकली (शेल) कंपनी है, जिसने बिना किसी वास्तविक माल आपूर्ति के फर्जी बिल जारी कर 99.31 करोड़ रुपए का आईटीसी तैयार किया। इसके बाद इस नकली आईटीसी को कई शेल कंपनियों के माध्यम से वैध दिखाने की कोशिश की गई। इनमें मेसर्स एसी एंटरप्राइज, मेसर्स रिया रिशिता एंटरप्राइज, मेसर्स प्रिंस एंटरप्राइज, मेसर्स पी एंटरप्राइज, मेसर्स रंगोली एंटरप्राइज जैसी कंपनियां शामिल हैं। ईडी की जांच में यह भी सामने आया कि ये सभी कंपनियां अपने बताए गए पते पर मौजूद नहीं थीं और उन्हें भेजे गए समन भी तामील नहीं हो सके।
जांच के दौरान यह भी पता चला कि इन नकली कंपनियों के माध्यम से सीमेंट, लेदर उत्पाद, इलेक्ट्रिकल सामान, आयरन-स्टील जैसी कई वस्तुओं के नाम पर फर्जी बिल जारी किए गए, जबकि वास्तविकता में कोई खरीद-फरोख्त नहीं हुई थी। कुछ संबंधित व्यक्तियों ने पूछताछ में यह स्वीकार भी किया कि कोई वास्तविक व्यापार नहीं हुआ। मामले की गहराई से जांच करने पर सामने आया कि मेसर्स रिया रिशिता एंटरप्राइज एक अहम कड़ी के रूप में कार्य कर रही थी, जो नकली आईटीसी को आगे ट्रांसफर करने का माध्यम बनी। इसके जरिए नकली क्रेडिट को कई अन्य कंपनियों तक पहुंचाया गया।
ईडी ने पाया कि मेसर्स गणेश इंटरनेशनल (अब गणेश इन्फ्रावर्ल्ड लिमिटेड), मेसर्स फीनिक्स हाइड्रोलिक्स, मेसर्स फामा मार्केटिंग और मेसर्स अंजनी इम्पेक्स जैसी कंपनियों ने इन नकली संस्थाओं से 14.85 करोड़ रुपए का आईटीसी प्राप्त कर उसका उपयोग किया। इन कंपनियों के नियंत्रक क्रमशः विभोर अग्रवाल, दिलीप कुमार अग्रवाल, मृग मृणाल धवन और धनेश्वर प्रसाद यादव बताए गए हैं। जांच में यह भी सामने आया कि इस नकली आईटीसी का इस्तेमाल जीएसटी देनदारियों को चुकाने के लिए किया गया, जिसमें फर्जी इनवॉइस और ई-वे बिल का सहारा लिया गया। लाभार्थी कंपनियों ने बिना किसी वास्तविक व्यापारिक गतिविधि के असामान्य रूप से अधिक टर्नओवर दिखाया, जो इस पूरे फर्जीवाड़े और मनी लॉन्ड्रिंग की सुनियोजित साजिश की ओर इशारा करता है।
ईडी के अनुसार, यह पूरा मामला अपराध से अर्जित धन को परत दर परत घुमाकर वैध बनाने का एक संगठित प्रयास है। फिलहाल इस मामले में आगे की जांच जारी है।