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इरोड के 10 गांवों की 21 साल पुरानी परंपरा: वेलोड पक्षी अभयारण्य के लिए पटाखा-मुक्त दीपावली

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इरोड के 10 गांवों की 21 साल पुरानी परंपरा: वेलोड पक्षी अभयारण्य के लिए पटाखा-मुक्त दीपावली

सारांश

इरोड के 10 से अधिक गांवों ने लगातार 21वें साल बिना पटाखों के दीपावली मनाई — कोई सरकारी आदेश नहीं, कोई कानूनी दबाव नहीं, बस वेलोड पक्षी अभयारण्य के हजारों पंछियों के लिए एक सामूहिक संकल्प। यह पहल साबित करती है कि त्योहार और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

मुख्य बातें

तमिलनाडु के इरोड जिले में वेलोड पक्षी अभयारण्य के निकट 10 से अधिक गांवों ने 8 नवंबर 2026 को लगातार 21वें साल पटाखा-मुक्त दीपावली मनाई।
यह परंपरा स्वैच्छिक है — किसी सरकारी आदेश या न्यायालय के निर्देश के बिना समुदाय ने स्वयं यह निर्णय लिया।
वेलोड पक्षी अभयारण्य लगभग 240 एकड़ में फैला है और 1996 में केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा स्थापित किया गया था।
अभयारण्य की पेरियाकुलम झील भारत और विदेश से आने वाले प्रवासी पक्षियों को घोंसला बनाने व प्रजनन की सुविधा देती है।
यहाँ बार-हेडेड गूज, यूरेशियन स्पूनबिल, स्पॉट-बिल्ड पेलिकन सहित दुर्लभ प्रवासी प्रजातियाँ देखी जाती हैं।
नई पीढ़ी भी इस पहल में सक्रिय भागीदार है — बच्चों ने शोर वाले पटाखों की जगह केवल फुलझड़ियों तक अपना उत्सव सीमित रखा।

तमिलनाडु के इरोड जिले में वेलोड पक्षी अभयारण्य के आसपास बसे 10 से अधिक गांवों के निवासियों ने 8 नवंबर 2026 को बिना पटाखे जलाए दीपावली मनाकर वन्यजीव संरक्षण की एक अनूठी मिसाल पेश की। यह लगातार 21वाँ वर्ष था जब इन गांवों ने स्वेच्छा से यह पर्यावरण-हितैषी परंपरा निभाई, ताकि अभयारण्य में रहने वाले और बाहर से आने वाले हजारों पक्षियों को पटाखों के तेज़ शोर और वायु प्रदूषण से बचाया जा सके।

सामुदायिक संकल्प की कहानी

ग्रामीणों ने स्वेच्छा से यह निर्णय लिया है और पिछले दो दशकों से इसे अटूट रूप से निभाते आ रहे हैं। इस सामूहिक संकल्प ने दीपावली को महज एक त्योहार से आगे बढ़ाकर पर्यावरण के प्रति जवाबदेही के एक वार्षिक अनुष्ठान में बदल दिया है। लोगों ने नए कपड़े पहने, एक-दूसरे को बधाई दी और पारंपरिक उत्सवों में हिस्सा लिया — उत्साह में कोई कमी नहीं आई, बस पटाखों की जगह फुलझड़ियों तक जश्न सीमित रहा।

गौरतलब है कि इस पहल को बनाए रखने में बच्चों की भूमिका उल्लेखनीय रही है। उन्होंने खुशी-खुशी शोर करने वाले पटाखे छोड़ दिए। कुछ परिवार, जो पटाखे जलाना चाहते थे, वे अभयारण्य क्षेत्र से बाहर अपने रिश्तेदारों के घर जाकर यह शौक पूरा करते हैं — इस तरह सामुदायिक प्रतिबद्धता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच एक व्यावहारिक संतुलन बना हुआ है।

वेलोड पक्षी अभयारण्य: पारिस्थितिक महत्व

इरोड शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित वेलोड पक्षी अभयारण्य लगभग 240 एकड़ में फैला है। केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा 1996 में स्थापित यह अभयारण्य तमिलनाडु के संरक्षित क्षेत्रों की सूची में शामिल 16 पक्षी अभयारण्यों में से एक है।

राज्य के अन्य पक्षी अभयारण्यों के विपरीत यहाँ घना जंगल नहीं है। इसका पारिस्थितिक महत्व 'पेरियाकुलम झील' पर टिका है, जो भारत के विभिन्न भागों और विदेशों से आने वाले पक्षियों को भोजन, घोंसला बनाने और प्रजनन की सुविधा देती है। अभयारण्य में आमतौर पर मार्च से अक्टूबर के बीच पक्षियों का आना-जाना अधिक रहता है।

यहाँ दिखती हैं दुर्लभ प्रजातियाँ

पिछले कुछ वर्षों में इस अभयारण्य ने हजारों पक्षियों को आकर्षित किया है, जिनमें कई प्रवासी प्रजातियाँ शामिल हैं। यहाँ देखी गई प्रजातियों में बार-हेडेड गूज (पहाड़ी हंस), ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, यूरेशियन स्पूनबिल, स्पॉट-बिल्ड पेलिकन, वेस्टर्न मार्श हैरियर और ब्लू-टेल्ड बी-ईटर प्रमुख हैं। हालाँकि ग्रामीणों के अनुसार इस समय अभयारण्य में पक्षियों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है और केवल कुछ स्थानीय एवं प्रवासी प्रजातियाँ ही नज़र आ रही हैं।

नई पीढ़ी की भागीदारी

स्थानीय निवासियों का कहना है कि पटाखों का इस्तेमाल न करने का फैसला अब एक स्थापित सामुदायिक परंपरा बन चुका है, जिसे नई पीढ़ी पूरे मन से आगे बढ़ा रही है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश भर में त्योहारी प्रदूषण को लेकर बहस जारी है और अदालतें तथा प्रशासन पटाखों पर पाबंदी लगाने की कोशिश कर रहे हैं।

इरोड के इन गांवों ने बिना किसी सरकारी आदेश या कानूनी दबाव के यह रास्ता स्वयं चुना — यही इस पहल को अनूठा बनाता है। आने वाले वर्षों में यह मॉडल देश के अन्य संरक्षित क्षेत्रों के निकट बसे समुदायों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि नीचे से उगा हुआ संकल्प है — और यही इसे राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखता है। जब देश भर में पटाखों पर पाबंदी को लेकर अदालतें और सरकारें जूझ रही हैं, तब यह मॉडल दिखाता है कि सामुदायिक स्वामित्व किसी भी नियामक आदेश से अधिक टिकाऊ हो सकता है। सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार और वन विभाग इस स्वैच्छिक ढाँचे को दस्तावेज़ीकृत करके देश के अन्य संरक्षित क्षेत्रों के लिए एक दोहराने योग्य खाका तैयार करेंगे, या यह अनुभव एक स्थानीय अपवाद बनकर रह जाएगा।
RashtraPress
9 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इरोड के गांवों ने पटाखा-मुक्त दीपावली की परंपरा कब से शुरू की?
इरोड के वेलोड पक्षी अभयारण्य के निकट के गांवों ने यह परंपरा लगभग 21 वर्ष पहले स्वेच्छा से शुरू की थी। 2026 में मनाई गई दीपावली इस परंपरा का लगातार 21वाँ वर्ष था।
वेलोड पक्षी अभयारण्य क्या है और यह कहाँ स्थित है?
वेलोड पक्षी अभयारण्य तमिलनाडु के इरोड शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित लगभग 240 एकड़ का संरक्षित क्षेत्र है, जिसे केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 1996 में स्थापित किया था। यह तमिलनाडु के 16 आधिकारिक पक्षी अभयारण्यों में से एक है और अपनी पेरियाकुलम झील के कारण प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास है।
ग्रामीणों ने पटाखे न जलाने का फैसला क्यों किया?
ग्रामीणों ने यह फैसला अभयारण्य में रहने वाले और बाहर से आने वाले हजारों पक्षियों को पटाखों के तेज़ शोर और वायु प्रदूषण से बचाने के लिए लिया। यह निर्णय पूरी तरह स्वैच्छिक है — किसी सरकारी आदेश या कानूनी दबाव के बिना।
इस अभयारण्य में कौन-कौन सी पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं?
वेलोड पक्षी अभयारण्य में बार-हेडेड गूज (पहाड़ी हंस), ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, यूरेशियन स्पूनबिल, स्पॉट-बिल्ड पेलिकन, वेस्टर्न मार्श हैरियर और ब्लू-टेल्ड बी-ईटर जैसी दुर्लभ प्रवासी प्रजातियाँ देखी जाती हैं। पक्षियों का मुख्य आगमन मार्च से अक्टूबर के बीच होता है।
क्या यह पहल अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय हो सकती है?
स्थानीय निवासियों और संरक्षण विशेषज्ञों के अनुसार, इरोड का यह मॉडल दिखाता है कि सामुदायिक सहभागिता से पारंपरिक उत्सव और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। यह पहल उन सभी क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बन सकती है जहाँ संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों के निकट आबादी रहती है।
राष्ट्र प्रेस
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