योगी सरकार की बड़ी पहल: गोशालाएँ बनेंगी आत्मनिर्भर, गोबर से बनेगी बायोगैस और जैविक खाद
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश सरकार ने 3 सितंबर 2026 को गो-संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग और संस्था 'पार्टनर्स इन प्रॉसपेरिटी' (PNP) के बीच एक तकनीकी सहयोग समझौता (एमओयू) हुआ है, जिसका उद्देश्य प्रदेश की गोशालाओं में उपलब्ध गोबर को स्वच्छ ऊर्जा, जैविक खाद और ग्रामीण आय के स्रोत में बदलना है। यह पहल गोशालाओं को महज आश्रय-स्थल से आगे ले जाकर उन्हें सर्कुलर इकोनॉमी के केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश है।
समझौते में क्या है खास
इस एमओयू के तहत प्रदेश में पहले से स्थापित दीनबंधु मॉडल बायोगैस संयंत्रों को तकनीकी सहयोग दिया जाएगा और भविष्य में लगने वाले नए संयंत्रों के लिए भी एक मज़बूत तकनीकी ढाँचा तैयार किया जाएगा। PNP संस्था बायोगैस परियोजना के विकास से लेकर तकनीकी डिज़ाइन, फीडस्टॉक व गोबर आकलन, संयंत्र निर्माण, संचालन एवं रखरखाव, लाभार्थियों के प्रशिक्षण और फील्ड मॉनिटरिंग तक पूरी श्रृंखला में सहयोग करेगी। उल्लेखनीय है कि यह संस्था अब तक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 3,900 से अधिक दीनबंधु बायोगैस इकाइयाँ स्थापित कर चुकी है।
1,000 तकनीकी विशेषज्ञों का नेटवर्क
समझौते की सबसे अहम विशेषता जमीनी स्तर पर तकनीकी तंत्र खड़ा करना है। चरणबद्ध तरीके से करीब 1,000 तकनीकी कर्मियों का नेटवर्क विकसित किया जाएगा। यह नेटवर्क बायोगैस संयंत्रों की स्थापना के बाद उनके नियमित संचालन, रखरखाव और फील्ड मॉनिटरिंग के लिए स्थानीय स्तर पर तकनीकी सहायता सुनिश्चित करेगा। इससे न केवल रोज़गार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि संयंत्रों की दीर्घकालिक कार्यक्षमता भी बनी रहेगी।
गोबर से सर्कुलर इकोनॉमी का मॉडल
यह पहल केवल बायोगैस उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसके तहत बायोगैस, जैव-स्लरी, जैविक खाद, प्राकृतिक एवं पुनर्योजी कृषि और कार्बन लाभ की पूरी मूल्य-श्रृंखला विकसित करने की योजना है। गोशाला का गोबर पहले ऊर्जा का स्रोत बनेगा; बायोगैस संयंत्र से निकलने वाली जैव-स्लरी को जैविक खाद और बायो-इनपुट के रूप में खेती में लगाया जाएगा। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलेगा। भविष्य में इस मॉडल को कार्बन क्रेडिट परियोजनाओं से भी जोड़ने की संभावनाओं पर काम किया जाएगा।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
उत्तर प्रदेश गोसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने कहा, 'गोबर को केवल अपशिष्ट मानने के बजाय ऊर्जा, जैविक कृषि और ग्रामीण आय के महत्वपूर्ण संसाधन के रूप में देखने की आवश्यकता है।' उन्होंने जोड़ा कि दीनबंधु बायोगैस मॉडल को तकनीकी रूप से सुदृढ़ कर बड़े स्तर पर लागू करने से गोशालाओं, किसानों और ग्रामीण परिवारों को बहुआयामी लाभ मिल सकता है।
आगे क्या होगा
प्रदेश के किसानों और ग्रामीण समुदायों के साथ मिलकर इस कार्यक्रम का जमीनी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाएगा। यह पहल 'गोबर से ऊर्जा, ऊर्जा से जैविक कृषि और जैविक कृषि से समृद्ध ग्रामीण अर्थव्यवस्था' की अवधारणा को व्यावहारिक रूप देने की दिशा में एक ठोस कदम मानी जा रही है। तकनीकी नेटवर्क और स्थानीय अनुभव के संयोजन से गोशालाओं में बायोगैस मॉडल को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाने की उम्मीद है।