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गुवाहाटी 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर ठगी: ED ने 6 बैंकों के 43 खातों से ₹2.12 करोड़ जब्त किए

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गुवाहाटी 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर ठगी: ED ने 6 बैंकों के 43 खातों से ₹2.12 करोड़ जब्त किए

सारांश

गुवाहाटी के एक वरिष्ठ नागरिक को TRAI, CBI अधिकारी बनकर 'डिजिटल अरेस्ट' में रखा, जीवनभर की FD, म्यूचुअल फंड और पेंशन बेचवाकर ₹2.13 करोड़ ठगे। ED ने अब 6 बैंकों के 43 खातों में जमा ₹2.12 करोड़ PMLA के तहत जब्त किए — एक संगठित म्यूल नेटवर्क का पर्दाफाश।

मुख्य बातें

ED के गुवाहाटी जोनल ऑफिस-I ने PMLA, 2002 की धारा 5(1) के तहत ₹2.12 करोड़ का प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी किया।
6 बैंकों — Axis Bank, Bank of India, Federal Bank, IndusInd Bank, PNB और SBI — के 43 खातों में जमा राशि अस्थायी रूप से जब्त की गई।
ठगों ने सितंबर–दिसंबर 2025 के बीच TRAI, मुंबई क्राइम ब्रांच और CBI के अधिकारी बनकर गुवाहाटी के एक वरिष्ठ नागरिक को निशाना बनाया।
फर्जी 'डिजिटल अरेस्ट वारंट' और नकली अदालती कार्यवाही दिखाकर 19 ट्रांजैक्शन के जरिए ₹2.13 करोड़ ट्रांसफर करवाए गए।
पीड़ित ने FD, म्यूचुअल फंड, शेयर बेचे और पेंशन व इंश्योरेंस पर ऋण लेकर रकम जुटाई।
जांच में संगठित म्यूल खाता नेटवर्क का खुलासा; ED की आगे की जांच जारी।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) के गुवाहाटी जोनल ऑफिस-I ने 7 अक्टूबर 2026 को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA), 2002 की धारा 5(1) के तहत एक प्रोविजनल अटैचमेंट ऑर्डर जारी कर 6 बैंकों के 43 खातों में जमा कुल ₹2.12 करोड़ की राशि को अस्थायी रूप से जब्त किया है। यह कार्रवाई गुवाहाटी के एक वरिष्ठ नागरिक के साथ 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिए किए गए सुनियोजित साइबर धोखाधड़ी मामले से जुड़ी है, जिसमें ठगों ने सरकारी एजेंसियों के अधिकारी बनकर पीड़ित से ₹2.13 करोड़ हड़प लिए।

मामले की पृष्ठभूमि और ठगी का तरीका

जांच से पता चला है कि सितंबर से दिसंबर 2025 के बीच अज्ञात साइबर अपराधियों ने TRAI, मुंबई क्राइम ब्रांच और CBI के अधिकारी बनकर पीड़ित से संपर्क किया। उन्होंने पीड़ित को झूठा विश्वास दिलाया कि उनके आधार कार्ड से खुला एक बैंक खाता मनी लॉन्ड्रिंग में संलिप्त है।

इसके बाद ठगों ने व्हाट्सएप वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ित को 'डिजिटल अरेस्ट' में रखा। उन्हें नकली अदालती कार्यवाही और फर्जी 'डिजिटल अरेस्ट वारंट' दिखाए गए तथा हर दो घंटे में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए बाध्य किया गया। यह भी धमकी दी गई कि किसी को इस बारे में बताने पर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में ले लिया जाएगा।

पीड़ित ने किस तरह गँवाई जीवनभर की बचत

ठगों ने पहले 'RBI जांच' और फिर एक फर्जी 'बेल बॉन्ड' का बहाना बनाकर पीड़ित से कुल 19 ट्रांजैक्शन के ज़रिए ₹2.13 करोड़ अपने बताए बैंक खातों में ट्रांसफर करवाए। इसके लिए पीड़ित को अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट, म्यूचुअल फंड और शेयर बेचने पड़े और अपने पेंशन अकाउंट तथा इंश्योरेंस पॉलिसी के बदले ऋण भी लेना पड़ा।

गौरतलब है कि यह मामला देशभर में बढ़ रहे 'डिजिटल अरेस्ट' घोटालों की उस श्रृंखला का हिस्सा है, जिसमें अपराधी वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाकर उनकी जीवनभर की बचत को ठगते हैं।

मनी लॉन्ड्रिंग का जटिल नेटवर्क

ED की जांच के अनुसार, ठगी की रकम को सबसे पहले 'पहले-स्तर के म्यूल खातों' में जमा किया गया। वहाँ से इसे देशभर के व्यक्तियों, फर्मों और कंपनियों के अनेक बैंक खातों के माध्यम से विभिन्न हिस्सों में बाँटकर घुमाया गया।

रकम का पता मिटाने के लिए अपराधियों ने इसे नकद में निकाला, डिजिटल करेंसी में बदला, पेमेंट गेटवे में ट्रांसफर किया और अन्य खातों में भेजा। जांच में यह भी सामने आया कि इन खातों में हुए लेन-देन उनके खाताधारकों की घोषित वित्तीय प्रोफाइल से बिल्कुल भिन्न थे, जो साइबर अपराधियों द्वारा संचालित एक संगठित म्यूल खाता नेटवर्क की ओर इशारा करता है।

ED की जांच और कानूनी आधार

ED ने यह जांच साइबर पुलिस स्टेशन, CID, असम और गुवाहाटी द्वारा अज्ञात साइबर अपराधियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत दर्ज FIR के आधार पर शुरू की थी।

जब्त किए गए ₹2.12 करोड़ उन 43 बैंक खातों में थे — जो Axis Bank, Bank of India, Federal Bank, IndusInd Bank, Punjab National Bank (PNB) और State Bank of India (SBI) में संचालित थे — जिनके माध्यम से अपराध की रकम का लेन-देन होना पाया गया और जिनमें अभी भी बैलेंस मौजूद था।

आगे क्या होगा

ED के अनुसार, इस मामले में आगे की जांच अभी जारी है और अधिक खातों व संदिग्धों की पहचान की जा सकती है। यह कार्रवाई 'डिजिटल अरेस्ट' के बढ़ते खतरे के विरुद्ध केंद्रीय जांच एजेंसियों की बढ़ती सक्रियता को दर्शाती है, और आने वाले समय में इस नेटवर्क से जुड़े और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ म्यूल खातों का संगठित नेटवर्क ठगी को लगभग अदृश्य बना देता है। ED की यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन असली सवाल यह है कि जब्ती के बाद भी अपराधियों तक पहुँचना कितना मुश्किल रहेगा, जो अक्सर देश की सीमाओं के बाहर से काम करते हैं। 'डिजिटल अरेस्ट' घोटाले तेजी से वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बना रहे हैं — जिनकी FD, पेंशन और बीमा पॉलिसियाँ आसान शिकार हैं — और जागरूकता अभियानों की गति इस खतरे की तुलना में अभी भी बहुत धीमी है।
RashtraPress
7 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'डिजिटल अरेस्ट' साइबर ठगी क्या होती है?
'डिजिटल अरेस्ट' एक साइबर धोखाधड़ी है जिसमें ठग सरकारी एजेंसियों (जैसे CBI, TRAI, पुलिस) के अधिकारी बनकर वीडियो कॉल पर पीड़ित को 'गिरफ्तार' दिखाते हैं और रकम ट्रांसफर के लिए दबाव बनाते हैं। गुवाहाटी के इस मामले में पीड़ित को महीनों तक इसी तरह प्रताड़ित कर ₹2.13 करोड़ ठगे गए।
ED ने इस मामले में क्या कार्रवाई की है?
ED के गुवाहाटी जोनल ऑफिस-I ने PMLA, 2002 की धारा 5(1) के तहत 6 बैंकों के 43 खातों में जमा ₹2.12 करोड़ को अस्थायी रूप से जब्त किया है। जांच CID असम की दर्ज FIR के आधार पर शुरू हुई थी और आगे की जांच अभी जारी है।
ठगों ने पीड़ित से पैसे कैसे ट्रांसफर करवाए?
ठगों ने पहले 'RBI जांच' और फिर फर्जी 'बेल बॉन्ड' का बहाना बनाकर 19 ट्रांजैक्शन के जरिए ₹2.13 करोड़ ट्रांसफर करवाए। पीड़ित ने इसके लिए FD, म्यूचुअल फंड और शेयर बेचे तथा पेंशन और इंश्योरेंस पर ऋण भी लिया।
इस मामले में म्यूल खाते क्या भूमिका निभाते हैं?
ठगी की रकम को पहले-स्तर के म्यूल खातों में जमा कर देशभर के अनेक व्यक्तियों, फर्मों और कंपनियों के खातों में बाँटा गया। फिर इसे नकद में निकाला, डिजिटल करेंसी में बदला या पेमेंट गेटवे से ट्रांसफर किया गया ताकि रकम का रास्ता छुपाया जा सके।
वरिष्ठ नागरिक 'डिजिटल अरेस्ट' ठगी से कैसे बचें?
कोई भी सरकारी एजेंसी वीडियो कॉल पर 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती — ऐसी कोई भी कॉल तुरंत काटें और निकटतम साइबर पुलिस स्टेशन या राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन 1930 पर सूचित करें। परिवार के सदस्यों को इस बारे में सतर्क रखें और कभी भी फोन या वीडियो कॉल के दबाव में बैंक ट्रांसफर न करें।
राष्ट्र प्रेस
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