हिजाब धार्मिक अधिकार है, वंदे मातरम जबरन नहीं थोपा जा सकता: एआईएमआईएम नेता वारिस पठान
सारांश
मुख्य बातें
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिममीन (एआईएमआईएम) के नेता वारिस पठान ने 26 अगस्त को मुंबई में कई विवादास्पद राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना पक्ष स्पष्ट किया — जिनमें इलाहाबाद हाई कोर्ट का ड्रेस कोड से जुड़ा फैसला, महाराष्ट्र में टीपू सुल्तान की तस्वीर का विवाद, वंदे मातरम की अनिवार्यता, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और उत्तर प्रदेश में चुनाव पूर्व घोषित कल्याणकारी योजनाएँ शामिल हैं। पठान ने हाई कोर्ट के फैसले से पूरी तरह असहमति जताते हुए इसे संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया।
हिजाब विवाद: संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता
वारिस पठान ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के ड्रेस कोड संबंधी फैसले से वे पूरी तरह असहमत हैं। उनके अनुसार, भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है और किसी मुस्लिम महिला को हिजाब पहनने से रोकने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि किसी धार्मिक प्रथा के 'आवश्यक' या 'गैर-आवश्यक' होने का निर्णय कौन करेगा।
पठान ने तर्क दिया कि हिजाब इस्लाम में धार्मिक प्रथा का हिस्सा है और इस पर रोक लगाना धार्मिक स्वतंत्रता तथा व्यक्तिगत पसंद के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने हिंदू महिलाओं द्वारा सिंदूर-मंगलसूत्र और सिख समुदाय द्वारा पगड़ी-कड़ा धारण करने का उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि अन्य समुदायों को अपने धार्मिक प्रतीक पहनने की छूट है, तो मुस्लिम महिला के हिजाब पर आपत्ति क्यों। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हाई कोर्ट के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाती है, तो वहाँ अलग निर्णय आ सकता है।
टीपू सुल्तान विवाद और ऐतिहासिक संदर्भ
महाराष्ट्र में टीपू सुल्तान की तस्वीर लगाने को लेकर उठे विवाद पर पठान ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर सीधा हमला किया। उन्होंने टीपू सुल्तान को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ते हुए शहीद होने वाला ऐतिहासिक व्यक्तित्व बताया और कहा कि उन्हें सम्मान देना गलत नहीं हो सकता।
पठान ने आरोप लगाया कि विनायक दामोदर सावरकर के अंग्रेजों को लिखे माफीनामों का हवाला देते हुए भाजपा की राष्ट्रवाद की राजनीति पर सवाल उठाया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि RSS ने लंबे समय तक राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान नहीं किया। उनके अनुसार, जो लोग आज दूसरों को देशभक्ति का प्रमाणपत्र बाँटते हैं, उन्हें पहले स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदान का लेखा-जोखा देना चाहिए।
वंदे मातरम और संवैधानिक अधिकार
वंदे मातरम की अनिवार्यता पर वारिस पठान ने स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी राष्ट्रीय गीत का सम्मान करती है, लेकिन किसी को इसे जबरन बोलने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस्लाम में इबादत केवल अल्लाह की होती है, इसलिए वंदे मातरम की कुछ पंक्तियाँ मुस्लिम समुदाय की धार्मिक मान्यताओं के अनुकूल नहीं हैं।
पठान ने सर्वोच्च न्यायालय के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान तथा किसी राष्ट्रीय गीत को अनिवार्य करने के बीच कानूनी अंतर को समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभक्ति के नाम पर किसी विशेष गीत को गाने के लिए मजबूर करना संविधान की भावना के विरुद्ध है।
यूसीसी और मुस्लिम समुदाय की चिंताएँ
समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर पठान ने विरोध जताते हुए कहा कि इसे लागू करने से पहले सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि 'यूनिफॉर्मिटी' से उसका क्या आशय है। उन्होंने हिंदू उत्तराधिकार कानून सहित विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि क्या इन सभी व्यवस्थाओं को बदलकर मुस्लिम समुदाय पर एकसमान कानून थोपा जाएगा। उनके अनुसार, यूसीसी मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।
उत्तर प्रदेश चुनाव और कल्याणकारी योजनाएँ
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावों से पहले मुफ्त लैपटॉप और महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा जैसी घोषणाओं पर पठान ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब है और सरकार विकास के बजाय 'बुलडोजर की राजनीति' पर निर्भर है। पठान के अनुसार, चुनाव नजदीक आते देख सरकार को अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है, इसीलिए कल्याणकारी योजनाओं की झड़ी लगाई जा रही है। यह देखना होगा कि इन घोषणाओं का मतदाताओं पर कितना असर पड़ता है।