17 जुलाई 2026
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तस्लीमा नसरीन के विचार मुस्लिम समुदाय को अस्वीकार्य, वंदे मातरम विधेयक पर सिद्दीकुल्ला चौधरी ने कहा — अदालत करेगी फैसला

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तस्लीमा नसरीन के विचार मुस्लिम समुदाय को अस्वीकार्य, वंदे मातरम विधेयक पर सिद्दीकुल्ला चौधरी ने कहा — अदालत करेगी फैसला

सारांश

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष सिद्दीकुल्ला चौधरी ने दो विवादास्पद मुद्दों पर एक साथ रुख स्पष्ट किया — तस्लीमा नसरीन के विचारों को समुदाय के लिए अस्वीकार्य बताया और वंदे मातरम विधेयक पर न्यायपालिका पर भरोसा जताया। पश्चिम बंगाल की धार्मिक-सांस्कृतिक राजनीति के लिए यह बयान महत्वपूर्ण संकेत है।

मुख्य बातें

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष सिद्दीकुल्ला चौधरी ने 17 जुलाई को कोलकाता में तस्लीमा नसरीन के विचारों को मुस्लिम समुदाय के लिए अस्वीकार्य करार दिया।
चौधरी के अनुसार, नसरीन के लेखन के कारण बांग्लादेश सहित दुनिया के कई हिस्सों में विरोध हुआ और मुस्लिम समुदाय ने उन्हें बाहर कर दिया है।
उन्होंने 'वंदे मातरम' विधेयक पर कहा कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है और उन्होंने स्वयं अदालत में अपील दायर की है।
उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि किसी को भी 'वंदे मातरम' गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
चौधरी ने पश्चिम बंगाल में हिंदू-मुस्लिम सह-अस्तित्व की परंपरा का उल्लेख करते हुए सभी धर्मों के सम्मान पर जोर दिया।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष सिद्दीकुल्ला चौधरी ने 17 जुलाई को कोलकाता में बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन और 'वंदे मातरम' के अपमान पर सजा का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक — दोनों विषयों पर स्पष्ट रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय ने तस्लीमा नसरीन के विचारों को कभी स्वीकार नहीं किया और उन्हें समुदाय से बाहर माना जाता है, जबकि वंदे मातरम का मामला न्यायालय में विचाराधीन है और अंतिम निर्णय न्यायपालिका पर छोड़ा गया है।

तस्लीमा नसरीन पर चौधरी का रुख

चौधरी ने कहा कि तस्लीमा नसरीन के लेखन और विचारों के कारण बांग्लादेश सहित दुनिया के कई हिस्सों में व्यापक विरोध हुआ। उनके अनुसार, नसरीन ने इस्लाम और धार्मिक मान्यताओं के बारे में ऐसी बातें लिखीं जिन्हें मुस्लिम समुदाय स्वीकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा, 'अब उनका अध्याय समाप्त हो चुका है।'

चौधरी ने बताया कि इस मुद्दे पर उन्होंने तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को पत्र लिखा था और पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु से भी इस विषय पर चर्चा हुई थी। उनके अनुसार, उनके विरोध के बाद तत्कालीन सरकार ने भी मामले को गंभीरता से लिया था।

धार्मिक सौहार्द और सह-अस्तित्व पर जोर

चौधरी ने कहा कि मुस्लिम समुदाय अपने धार्मिक विश्वास, पैगंबर और इस्लामी परंपराओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील है और इन पर किसी भी प्रकार की टिप्पणी स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में सभी धर्मों का सम्मान आवश्यक है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दुर्गा पूजा और काली पूजा जैसे आयोजनों पर मुस्लिम समुदाय ने कभी आपत्ति नहीं जताई। उनके अनुसार, पश्चिम बंगाल में हिंदू और मुसलमान वर्षों से मिलकर रहते आए हैं और यह परंपरा बनाए रखनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है, किंतु दूसरे धर्म की भावनाओं को आहत करने का अधिकार किसी को नहीं है।

वंदे मातरम विधेयक पर न्यायालय में अपील

'वंदे मातरम' के अपमान पर दंड का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक के बारे में पूछे जाने पर चौधरी ने कहा कि यह मामला फिलहाल न्यायालय के विचाराधीन है। उन्होंने बताया कि उन्होंने स्वयं इस संबंध में अदालत का दरवाजा खटखटाया है और अब अंतिम फैसला न्यायपालिका ही सुनाएगी।

उन्होंने उच्चतम न्यायालय के पूर्व निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि किसी भी व्यक्ति को 'वंदे मातरम' गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता — जो गाना चाहें, गाएं; जो नहीं गाना चाहते, उन पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। चौधरी ने कहा कि उनकी अदालती अपील के बारे में अभी अधिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाएगी और वे न्यायालय के निर्णय का इंतजार करेंगे।

क्या होगा आगे

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब पश्चिम बंगाल में धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दे राजनीतिक रूप से संवेदनशील बने हुए हैं। 'वंदे मातरम' विधेयक पर न्यायालय का निर्णय भविष्य में इस बहस की दिशा तय करेगा। गौरतलब है कि इस तरह के विधायी प्रयास पहले भी विभिन्न राज्यों में विवाद का केंद्र रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

इसलिए अदालत पर भरोसे की यह घोषणा कानूनी रूप से सुरक्षित भी है और राजनीतिक रूप से सावधान भी। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के बीच यह तनाव और गहरा होने की संभावना है।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सिद्दीकुल्ला चौधरी ने तस्लीमा नसरीन के बारे में क्या कहा?
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष सिद्दीकुल्ला चौधरी ने कहा कि तस्लीमा नसरीन के विचार और लेखन मुस्लिम समुदाय को अस्वीकार्य हैं और समुदाय ने उन्हें बाहर कर दिया है। उनके अनुसार, बांग्लादेश सहित दुनिया के कई हिस्सों में नसरीन के लेखन के कारण विरोध हुआ।
वंदे मातरम विधेयक पर चौधरी का क्या रुख है?
'वंदे मातरम' के अपमान पर दंड का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक पर चौधरी ने कहा कि यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है और उन्होंने स्वयं अदालत में अपील दायर की है। उनके अनुसार, अंतिम फैसला न्यायपालिका ही करेगी।
उच्चतम न्यायालय ने वंदे मातरम गाने की बाध्यता पर क्या कहा है?
सिद्दीकुल्ला चौधरी के अनुसार, उच्चतम न्यायालय पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि किसी भी व्यक्ति को 'वंदे मातरम' गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जो गाना चाहें, गाएं — लेकिन जो नहीं गाना चाहते, उन पर दबाव नहीं डाला जाना चाहिए।
चौधरी ने पश्चिम बंगाल में धार्मिक सौहार्द पर क्या कहा?
चौधरी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंदू और मुसलमान वर्षों से मिलकर रहते आए हैं और मुस्लिम समुदाय ने दुर्गा पूजा व काली पूजा जैसे आयोजनों पर कभी आपत्ति नहीं जताई। उन्होंने जोर दिया कि किसी को भी दूसरे धर्म की भावनाओं को आहत करने का अधिकार नहीं है।
तस्लीमा नसरीन विवाद में चौधरी की पूर्व भूमिका क्या रही है?
चौधरी ने बताया कि उन्होंने तस्लीमा नसरीन के मुद्दे पर तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को पत्र लिखा था और पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु से भी चर्चा हुई थी। उनके अनुसार, उनके विरोध के बाद तत्कालीन सरकार ने भी मामले को गंभीरता से लिया था।
राष्ट्र प्रेस
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