17 जुलाई 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

'वंदे मातरम' बिल पर सुन्नी उलेमा काउंसिल का विरोध, धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
'वंदे मातरम' बिल पर सुन्नी उलेमा काउंसिल का विरोध, धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप

सारांश

'वंदे मातरम' के अपमान पर दंड का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक पर सुन्नी उलेमा काउंसिल और कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम ने कड़ा विरोध जताया है। हाजी शालिस ने इसे धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति बताया, जबकि महबूब आलम ने संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला दिया।

मुख्य बातें

सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी शालिस ने 'वंदे मातरम' विधेयक को धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति बताया।
कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम के महासचिव महबूब आलम ने कहा कि किसी पर कोई धार्मिक अभिव्यक्ति अनिवार्य नहीं की जानी चाहिए।
हाजी शालिस के अनुसार, मुस्लिम समुदाय का 'वंदे मातरम' न पढ़ना राष्ट्र-विरोध नहीं , बल्कि इस्लाम की तौहीद की आस्था से जुड़ा विषय है।
दोनों नेताओं ने सरकार से आग्रह किया कि किसी भी कानून में संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का ध्यान रखा जाए।
हाजी शालिस ने आरोप लगाया कि सरकार बेरोज़गारी और महंगाई जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह विवाद उठा रही है।

कानपुर में 17 जुलाई को 'वंदे मातरम' के अपमान पर दंड का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक के विरोध में सुन्नी उलेमा काउंसिल और कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम ने तीखी प्रतिक्रिया दी। दोनों संगठनों के पदाधिकारियों ने सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि किसी भी समुदाय पर धार्मिक अभिव्यक्ति को अनिवार्य रूप से थोपना संविधान की भावना के विरुद्ध है।

सुन्नी उलेमा काउंसिल की आपत्तियाँ

सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी शालिस ने कहा कि सरकार लगातार ऐसे मुद्दे उठा रही है जिनसे समाज में धार्मिक तनाव और नफरत का माहौल पैदा होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की आज़ादी से लेकर आज तक किसी मुसलमान ने 'वंदे मातरम' गाने वालों का विरोध नहीं किया है।

हाजी शालिस के अनुसार, मुस्लिम समुदाय का 'वंदे मातरम' न पढ़ना किसी विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि इस्लाम में तौहीद — यानी एकेश्वरवाद — की धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि कुछ पंक्तियों की धार्मिक व्याख्या के कारण कुछ लोग इसका पाठ नहीं करते, लेकिन इसका अर्थ राष्ट्र का अपमान नहीं है।

कानून की ज़रूरत पर सवाल

हाजी शालिस ने यह भी सवाल उठाया कि जब 'वंदे मातरम' के अपमान की घटनाएँ सामने ही नहीं आई हैं, तो दंड के प्रावधान की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है। उनका आरोप है कि सरकार बेरोज़गारी, महंगाई और सीमा सुरक्षा जैसे वास्तविक जनसमस्याओं से ध्यान हटाने के लिए इस प्रकार के मुद्दे उठा रही है।

उन्होंने कहा कि धर्म को लोगों की आस्था तक सीमित रहने देना चाहिए और उसे राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।

कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम का पक्ष

कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम के महासचिव महबूब आलम ने कहा कि कानून का सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि वह सभी नागरिकों के लिए समान होता है। उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमान 'जन गण मन' और 'सारे जहाँ से अच्छा' जैसे राष्ट्रीय गीतों और प्रतीकों का सम्मान करते हैं।

महबूब आलम के अनुसार, यदि किसी प्रावधान से किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका हो, तो उस पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय लंबे समय से यह माँग करता रहा है कि 'वंदे मातरम' की उन पंक्तियों पर पुनर्विचार किया जाए जिन्हें कुछ लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं मानते।

संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता

महबूब आलम ने ज़ोर देकर कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था के पालन की स्वतंत्रता देता है। इसलिए किसी भी कानून को लागू करते समय संविधान द्रारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और सभी समुदायों की भावनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि इन पहलुओं पर संतुलित ढंग से विचार किया जाए तो ऐसे कानून का स्वागत किया जा सकता है।

आगे क्या

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब 'वंदे मातरम' विधेयक को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो रही है। आलोचकों का कहना है कि इस प्रकार के विधेयक सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बन सकते हैं। गौरतलब है कि धार्मिक प्रतीकों और राष्ट्रीय पहचान को लेकर इस तरह की बहसें भारत में नई नहीं हैं और भविष्य में इस विधेयक पर संसदीय और सामाजिक स्तर पर व्यापक विमर्श की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो दंड का प्रावधान किस समस्या का समाधान करता है। संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, और सर्वोच्च न्यायालय भी 'वंदे मातरम' को अनिवार्य नहीं ठहरा चुका है। ऐसे में यह विधेयक कानूनी चुनौतियों से भी नहीं बचेगा — और इसका असली नुकसान सामाजिक विश्वास की उस पूँजी को होगा जिसे बनाने में पीढ़ियाँ लगती हैं।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'वंदे मातरम' बिल क्या है और इसमें क्या प्रावधान है?
यह एक प्रस्तावित विधेयक है जिसमें 'वंदे मातरम' का अपमान करने पर दंड का प्रावधान किया जाना है। अभी यह विधेयक प्रस्ताव के स्तर पर है और इसके विस्तृत प्रावधानों पर व्यापक बहस जारी है।
सुन्नी उलेमा काउंसिल ने इस बिल का विरोध क्यों किया?
सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी शालिस का कहना है कि मुस्लिम समुदाय का 'वंदे मातरम' न पढ़ना राष्ट्र-विरोध नहीं, बल्कि इस्लाम की तौहीद की धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जनसमस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए यह मुद्दा उठा रही है।
कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम का इस मामले में क्या रुख है?
कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम के महासचिव महबूब आलम ने कहा कि कानून का सम्मान होना चाहिए, लेकिन किसी पर कोई धार्मिक अभिव्यक्ति अनिवार्य नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का ध्यान रखा जाए तो संतुलित कानून का स्वागत किया जा सकता है।
क्या मुस्लिम समुदाय राष्ट्रीय गीतों का सम्मान करता है?
महबूब आलम के अनुसार मुसलमान 'जन गण मन' और 'सारे जहाँ से अच्छा' जैसे राष्ट्रीय गीतों और प्रतीकों का सम्मान करते हैं। 'वंदे मातरम' की कुछ पंक्तियों को लेकर धार्मिक आपत्ति को राष्ट्र-विरोध से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
इस विधेयक पर आगे क्या होने की संभावना है?
फिलहाल यह विधेयक प्रस्ताव के स्तर पर है और इस पर संसदीय व सामाजिक विमर्श जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी को देखते हुए इस विधेयक को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 1 घंटा पहले
  2. 1 घंटा पहले
  3. 1 घंटा पहले
  4. 5 घंटे पहले
  5. 3 सप्ताह पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 7 महीने पहले
  8. 7 महीने पहले