'वंदे मातरम' बिल पर सुन्नी उलेमा काउंसिल का विरोध, धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
कानपुर में 17 जुलाई को 'वंदे मातरम' के अपमान पर दंड का प्रावधान करने वाले प्रस्तावित विधेयक के विरोध में सुन्नी उलेमा काउंसिल और कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम ने तीखी प्रतिक्रिया दी। दोनों संगठनों के पदाधिकारियों ने सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि किसी भी समुदाय पर धार्मिक अभिव्यक्ति को अनिवार्य रूप से थोपना संविधान की भावना के विरुद्ध है।
सुन्नी उलेमा काउंसिल की आपत्तियाँ
सुन्नी उलेमा काउंसिल के महासचिव हाजी शालिस ने कहा कि सरकार लगातार ऐसे मुद्दे उठा रही है जिनसे समाज में धार्मिक तनाव और नफरत का माहौल पैदा होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देश की आज़ादी से लेकर आज तक किसी मुसलमान ने 'वंदे मातरम' गाने वालों का विरोध नहीं किया है।
हाजी शालिस के अनुसार, मुस्लिम समुदाय का 'वंदे मातरम' न पढ़ना किसी विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि इस्लाम में तौहीद — यानी एकेश्वरवाद — की धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि कुछ पंक्तियों की धार्मिक व्याख्या के कारण कुछ लोग इसका पाठ नहीं करते, लेकिन इसका अर्थ राष्ट्र का अपमान नहीं है।
कानून की ज़रूरत पर सवाल
हाजी शालिस ने यह भी सवाल उठाया कि जब 'वंदे मातरम' के अपमान की घटनाएँ सामने ही नहीं आई हैं, तो दंड के प्रावधान की आवश्यकता क्यों महसूस की जा रही है। उनका आरोप है कि सरकार बेरोज़गारी, महंगाई और सीमा सुरक्षा जैसे वास्तविक जनसमस्याओं से ध्यान हटाने के लिए इस प्रकार के मुद्दे उठा रही है।
उन्होंने कहा कि धर्म को लोगों की आस्था तक सीमित रहने देना चाहिए और उसे राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम का पक्ष
कुल हिंद जमीयत-उल-अवाम के महासचिव महबूब आलम ने कहा कि कानून का सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि वह सभी नागरिकों के लिए समान होता है। उन्होंने यह भी कहा कि मुसलमान 'जन गण मन' और 'सारे जहाँ से अच्छा' जैसे राष्ट्रीय गीतों और प्रतीकों का सम्मान करते हैं।
महबूब आलम के अनुसार, यदि किसी प्रावधान से किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका हो, तो उस पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय लंबे समय से यह माँग करता रहा है कि 'वंदे मातरम' की उन पंक्तियों पर पुनर्विचार किया जाए जिन्हें कुछ लोग अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं मानते।
संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता
महबूब आलम ने ज़ोर देकर कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था के पालन की स्वतंत्रता देता है। इसलिए किसी भी कानून को लागू करते समय संविधान द्रारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता और सभी समुदायों की भावनाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि इन पहलुओं पर संतुलित ढंग से विचार किया जाए तो ऐसे कानून का स्वागत किया जा सकता है।
आगे क्या
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब 'वंदे मातरम' विधेयक को लेकर देशभर में बहस तेज़ हो रही है। आलोचकों का कहना है कि इस प्रकार के विधेयक सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बन सकते हैं। गौरतलब है कि धार्मिक प्रतीकों और राष्ट्रीय पहचान को लेकर इस तरह की बहसें भारत में नई नहीं हैं और भविष्य में इस विधेयक पर संसदीय और सामाजिक स्तर पर व्यापक विमर्श की संभावना है।