हिमालय के लिए अलग विकास मॉडल की माँग, कांग्रेस नेता प्रदीप टम्टा ने केंद्र पर साधा निशाना
सारांश
मुख्य बातें
कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा ने 21 सितंबर 2026 को देहरादून में हिमालयी क्षेत्रों के विकास मॉडल पर केंद्र सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि हिमालय की भौगोलिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को देखते हुए वहाँ सामान्य विकास मॉडल लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार हिमालयी क्षेत्र की नाज़ुकता को नज़रअंदाज़ कर रही है और बार-बार आ रही प्राकृतिक आपदाओं से कोई ठोस सबक नहीं लिया जा रहा। टम्टा के अनुसार, हिमालय को बचाना केवल उत्तराखंड की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि यह पूरे देश के पर्यावरणीय संतुलन का प्रश्न है।
हिमालय की संवेदनशीलता और विकास का विरोधाभास
प्रदीप टम्टा ने कहा कि उत्तराखंड भारत की लगभग ढाई से तीन हजार किलोमीटर लंबी हिमालयी श्रृंखला के मध्य भाग में स्थित है। उन्होंने इसे 'सेंट्रल हिमालय' का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए कहा कि इस पर वही विकास का ढाँचा नहीं थोपा जा सकता जो मैदानी इलाकों के लिए उपयुक्त है। गौरतलब है कि 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हिमालयी राज्यों के लिए एक विशेष समिति का गठन किया गया था। टम्टा ने बताया कि बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में गठित उस समिति ने भी हिमालयी राज्यों के लिए नए और टिकाऊ विकास दृष्टिकोण की सिफारिश की थी, लेकिन उन सुझावों पर अपेक्षित अमल नहीं हुआ।
नेपाल त्रासदी और साझा हिमालयी ज़िम्मेदारी
हाल की नेपाल की प्राकृतिक आपदा का उल्लेख करते हुए टम्टा ने कहा कि हिमालय कोई एक देश या राज्य की सीमा तक सीमित नहीं है — यह एक साझा भौगोलिक इकाई है। उन्होंने कहा कि भूस्खलन, हिमस्खलन और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी घटनाओं का प्रभाव सीमा पार भी महसूस किया जाता है। चमोली आपदा का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी घटनाएँ पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए चेतावनी हैं और विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय पर्यावरणीय संवेदनशीलता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
चौड़ी सड़कों पर सवाल और विशेषज्ञ समिति की अनदेखी का आरोप
टम्टा ने हिमालयी क्षेत्रों में बनाई जा रही चौड़ी सड़कों पर भी गंभीर सवाल उठाए। धाराली की पिछली घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि परिवहन मंत्रालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने खुद कुछ स्थानों पर इतनी चौड़ी सड़कों की आवश्यकता पर प्रश्न उठाए थे। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार अपनी ही विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को गंभीरता से नहीं ले रही। उन्होंने कहा कि किसी भी परियोजना को मंजूरी देने से पहले उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव का स्वतंत्र आकलन अनिवार्य होना चाहिए।
हिमालय के प्राकृतिक संसाधन और मैदानी राज्यों पर असर
टम्टा ने केंद्र सरकार पर हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि हिमालय की नदियाँ, जंगल और पारिस्थितिकी तंत्र केवल उत्तराखंड की नहीं, बल्कि पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे मैदानी राज्यों की जीवनरेखा हैं। यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड सहित कई हिमालयी राज्यों में मानसून के दौरान भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।
यूपीआई शुल्क और हरीश रावत के संन्यास पर भी बोले टम्टा
यूपीआई लेन-देन पर शुल्क की चर्चाओं पर टम्टा ने कहा कि पहले डिजिटल भुगतान को मुफ्त बनाकर लोगों को इसका आदी किया गया और अब अंतरराष्ट्रीय भुगतान कंपनियों के दबाव में शुल्क लगाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने चिंता जताई कि यदि यूपीआई पर शुल्क बढ़ाया गया तो इसका सबसे बड़ा बोझ आम और गरीब उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के राजनीतिक संन्यास की चर्चाओं को नकारते हुए टम्टा ने कहा कि हरीश रावत उत्तराखंड में लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उम्मीदों के केंद्र हैं और जब देश, लोकतंत्र और कांग्रेस को संघर्ष की ज़रूरत है, तब ऐसे नेताओं का सक्रिय राजनीति से दूर जाना उचित नहीं होगा। आगे देखना होगा कि केंद्र सरकार हिमालयी विकास की नीति पर विपक्ष की इन माँगों को कितना तवज्जो देती है।