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भारत 'होराइजन यूरोप' से जुड़ा, भारतीय शोधकर्ताओं को EU फंडिंग और अत्याधुनिक सुविधाओं तक पहुँच मिलेगी

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भारत 'होराइजन यूरोप' से जुड़ा, भारतीय शोधकर्ताओं को EU फंडिंग और अत्याधुनिक सुविधाओं तक पहुँच मिलेगी

सारांश

भारत ने EU के सबसे बड़े शोध कार्यक्रम 'होराइजन यूरोप' में शामिल होने की बातचीत पूरी कर ली है। यह जनवरी 2026 के भारत-EU शिखर सम्मेलन के बाद की सबसे ठोस वैज्ञानिक साझेदारी है — जो विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को वैश्विक शोध नेटवर्क से जोड़ती है।

मुख्य बातें

भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने होराइजन यूरोप में भारत की भागीदारी के लिए वार्ता 7 नवंबर 2026 को सफलतापूर्वक पूरी की।
भारतीय शोधकर्ता, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग अब EU फंडिंग के लिए सीधे आवेदन कर सकेंगे।
सहयोग में स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष, जलवायु, ऊर्जा, खाद्य एवं जैव-अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
यह वार्ता 27 जनवरी 2026 के भारत-EU शिखर सम्मेलन और 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में हुई TTC मंत्रिस्तरीय बैठक के बाद शुरू हुई थी।
यह साझेदारी विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को वैश्विक शोध नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में अहम मानी जा रही है।

भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने यूरोप के सबसे बड़े शोध एवं नवाचार कार्यक्रम 'होराइजन यूरोप' में भारत की औपचारिक भागीदारी के लिए बातचीत सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 7 नवंबर 2026 को इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि इस समझौते से भारतीय शोधकर्ताओं, शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग जगत को EU की फंडिंग, यूरोपीय शोध समूहों और अत्याधुनिक बुनियादी ढाँचे तक सीधी पहुँच मिलेगी। यह भारत-EU रणनीतिक साझेदारी में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।

समझौते की पृष्ठभूमि

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'भारत और यूरोपीय संघ ने होराइजन यूरोप के साथ भारत के जुड़ने के लिए बातचीत सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। यह भारत-EU रणनीतिक साझेदारी में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसका उद्देश्य अनुसंधान सहयोग के लिए एक दीर्घकालिक ढाँचा तैयार करना है, जो जनवरी 2026 में ऐतिहासिक भारत-EU शिखर सम्मेलन के दौरान नेताओं की ओर से तय किए गए दृष्टिकोण के अनुरूप है।'

इस सहयोग पर चर्चा की नींव 27 जनवरी 2026 को हुए ऐतिहासिक भारत-EU शिखर सम्मेलन में रखी गई थी। इसके बाद 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में आयोजित व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की मंत्रिस्तरीय बैठक में सहमति के आधार पर औपचारिक वार्ता शुरू हुई थी।

भारतीय शोधकर्ताओं को क्या मिलेगा

इस समझौते के तहत भारतीय शोधकर्ता और संस्थान अब होराइजन यूरोप के अंतर्गत उपलब्ध फंडिंग के लिए सीधे आवेदन कर सकेंगे। वे यूरोपीय शोध समूहों के साथ संयुक्त परियोजनाओं में भाग ले सकेंगे और महाद्वीप की उन्नत शोध प्रयोगशालाओं व सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।

मंत्रालय के अनुसार, यह भागीदारी पहले से जारी भारत-EU विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते और भारत-EU व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद के तहत हो रहे सहयोग को और गहरा करेगी।

प्राथमिक क्षेत्र और भारत की प्राथमिकताएँ

होराइजन यूरोप के दूसरे स्तंभ के अंतर्गत आने वाले प्रमुख क्षेत्र — स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, उद्योग एवं अंतरिक्ष, जलवायु, ऊर्जा एवं परिवहन, तथा खाद्य एवं जैव-अर्थव्यवस्था — भारत की अपनी शोध प्राथमिकताओं से काफी मेल खाते हैं। मंत्रालय का मानना है कि इन क्षेत्रों में भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं का अधिकतम उपयोग किया जा सकेगा।

यह साझेदारी शोध और तकनीक के क्षेत्र में प्रतिभाओं के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित करेगी। साथ ही महत्वपूर्ण तकनीकों, मानकों और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले समाधानों के संयुक्त विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

विकसित भारत 2047 की दिशा में अहम कदम

गौरतलब है कि यह समझौता ऐसे समय में आया है जब भारत विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। वैश्विक शोध नेटवर्क से सीधे जुड़ाव के बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता अधूरी मानी जाती है, और होराइजन यूरोप में भागीदारी इसी दिशा में एक ठोस संस्थागत कदम है।

यह समझौता भारत के वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और उद्योगों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर खोलेगा और उन्नत तकनीकों के विकास में भारत की भूमिका को और सुदृढ़ करेगा। आने वाले महीनों में दोनों पक्षों के बीच क्रियान्वयन की रूपरेखा तैयार होने की उम्मीद है।

संपादकीय दृष्टिकोण

या यह समझौता महज़ कागज़ों पर रहता है। गौरतलब है कि अमेरिका, कनाडा, जापान और दक्षिण कोरिया पहले से ही ऐसे ढाँचों में हैं जो वैज्ञानिक सहयोग को संस्थागत रूप देते हैं — भारत का यह कदम देर से आया, लेकिन सही दिशा में है। विकसित भारत 2047 की महत्वाकांक्षा तभी साकार होगी जब घोषणाएँ क्रियान्वयन में बदलें और भारतीय शोधकर्ताओं की यूरोपीय परियोजनाओं में वास्तविक भागीदारी के आँकड़े सामने आएँ।
RashtraPress
7 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

होराइजन यूरोप क्या है और भारत इससे क्यों जुड़ा?
होराइजन यूरोप, यूरोपीय संघ का प्रमुख शोध एवं नवाचार कार्यक्रम है जो वैज्ञानिक परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग प्रदान करता है। भारत इससे जुड़ा ताकि भारतीय शोधकर्ताओं और संस्थानों को यूरोपीय फंडिंग, शोध नेटवर्क और अत्याधुनिक सुविधाओं तक सीधी पहुँच मिल सके।
इस समझौते से भारतीय शोधकर्ताओं को क्या फायदा होगा?
भारतीय शोधकर्ता, शैक्षणिक संस्थान और उद्योग अब होराइजन यूरोप की फंडिंग के लिए सीधे आवेदन कर सकेंगे। वे यूरोपीय शोध समूहों के साथ संयुक्त परियोजनाओं में भाग लेंगे और प्रतिभाओं के अंतरराष्ट्रीय आदान-प्रदान का अवसर भी मिलेगा।
भारत और EU के बीच इस बातचीत की शुरुआत कब हुई?
इस सहयोग की नींव 27 जनवरी 2026 को हुए ऐतिहासिक भारत-EU शिखर सम्मेलन में रखी गई। इसके बाद 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की मंत्रिस्तरीय बैठक में हुई सहमति के बाद औपचारिक वार्ता शुरू हुई।
होराइजन यूरोप के तहत किन क्षेत्रों में सहयोग होगा?
कार्यक्रम के दूसरे स्तंभ के तहत स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, उद्योग एवं अंतरिक्ष, जलवायु, ऊर्जा एवं परिवहन, और खाद्य एवं जैव-अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ये सभी क्षेत्र भारत की अपनी शोध प्राथमिकताओं से मेल खाते हैं।
यह समझौता विकसित भारत 2047 के लक्ष्य से कैसे जुड़ा है?
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अंतर्गत भारत को तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना है। होराइजन यूरोप में भागीदारी भारत के शोध तंत्र को वैश्विक नेटवर्क से जोड़कर उन्नत तकनीकों के संयुक्त विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।
राष्ट्र प्रेस
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