भारत 'होराइजन यूरोप' से जुड़ा, भारतीय शोधकर्ताओं को EU फंडिंग और अत्याधुनिक सुविधाओं तक पहुँच मिलेगी
सारांश
मुख्य बातें
भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने यूरोप के सबसे बड़े शोध एवं नवाचार कार्यक्रम 'होराइजन यूरोप' में भारत की औपचारिक भागीदारी के लिए बातचीत सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 7 नवंबर 2026 को इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि इस समझौते से भारतीय शोधकर्ताओं, शैक्षणिक संस्थानों और उद्योग जगत को EU की फंडिंग, यूरोपीय शोध समूहों और अत्याधुनिक बुनियादी ढाँचे तक सीधी पहुँच मिलेगी। यह भारत-EU रणनीतिक साझेदारी में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
समझौते की पृष्ठभूमि
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, 'भारत और यूरोपीय संघ ने होराइजन यूरोप के साथ भारत के जुड़ने के लिए बातचीत सफलतापूर्वक पूरी कर ली है। यह भारत-EU रणनीतिक साझेदारी में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इसका उद्देश्य अनुसंधान सहयोग के लिए एक दीर्घकालिक ढाँचा तैयार करना है, जो जनवरी 2026 में ऐतिहासिक भारत-EU शिखर सम्मेलन के दौरान नेताओं की ओर से तय किए गए दृष्टिकोण के अनुरूप है।'
इस सहयोग पर चर्चा की नींव 27 जनवरी 2026 को हुए ऐतिहासिक भारत-EU शिखर सम्मेलन में रखी गई थी। इसके बाद 15 जुलाई 2026 को ब्रुसेल्स में आयोजित व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद की मंत्रिस्तरीय बैठक में सहमति के आधार पर औपचारिक वार्ता शुरू हुई थी।
भारतीय शोधकर्ताओं को क्या मिलेगा
इस समझौते के तहत भारतीय शोधकर्ता और संस्थान अब होराइजन यूरोप के अंतर्गत उपलब्ध फंडिंग के लिए सीधे आवेदन कर सकेंगे। वे यूरोपीय शोध समूहों के साथ संयुक्त परियोजनाओं में भाग ले सकेंगे और महाद्वीप की उन्नत शोध प्रयोगशालाओं व सुविधाओं का लाभ उठा सकेंगे।
मंत्रालय के अनुसार, यह भागीदारी पहले से जारी भारत-EU विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग समझौते और भारत-EU व्यापार एवं प्रौद्योगिकी परिषद के तहत हो रहे सहयोग को और गहरा करेगी।
प्राथमिक क्षेत्र और भारत की प्राथमिकताएँ
होराइजन यूरोप के दूसरे स्तंभ के अंतर्गत आने वाले प्रमुख क्षेत्र — स्वास्थ्य, डिजिटल तकनीक, उद्योग एवं अंतरिक्ष, जलवायु, ऊर्जा एवं परिवहन, तथा खाद्य एवं जैव-अर्थव्यवस्था — भारत की अपनी शोध प्राथमिकताओं से काफी मेल खाते हैं। मंत्रालय का मानना है कि इन क्षेत्रों में भारत की वैज्ञानिक क्षमताओं का अधिकतम उपयोग किया जा सकेगा।
यह साझेदारी शोध और तकनीक के क्षेत्र में प्रतिभाओं के आदान-प्रदान को भी प्रोत्साहित करेगी। साथ ही महत्वपूर्ण तकनीकों, मानकों और बड़े पैमाने पर लागू किए जा सकने वाले समाधानों के संयुक्त विकास का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
विकसित भारत 2047 की दिशा में अहम कदम
गौरतलब है कि यह समझौता ऐसे समय में आया है जब भारत विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। वैश्विक शोध नेटवर्क से सीधे जुड़ाव के बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता अधूरी मानी जाती है, और होराइजन यूरोप में भागीदारी इसी दिशा में एक ठोस संस्थागत कदम है।
यह समझौता भारत के वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों और उद्योगों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए अवसर खोलेगा और उन्नत तकनीकों के विकास में भारत की भूमिका को और सुदृढ़ करेगा। आने वाले महीनों में दोनों पक्षों के बीच क्रियान्वयन की रूपरेखा तैयार होने की उम्मीद है।