भारत का निर्यात 12 वर्षों में 85% उछला, वित्त वर्ष 2025-26 में $863 अरब के पार
सारांश
मुख्य बातें
भारत का कुल वार्षिक निर्यात बीते 12 वर्षों में 85 प्रतिशत की छलांग लगाकर वित्त वर्ष 2025-26 में 863 अरब डॉलर तक पहुँच गया है, जबकि वित्त वर्ष 2014-15 में यह आँकड़ा 468 अरब डॉलर था। वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने 16 जून को यह जानकारी सार्वजनिक की। इस अवधि में देश की वार्षिक निर्यात वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत रही, जो वैश्विक व्यापार में भारत की बढ़ती साख को दर्शाती है।
वस्तु निर्यात में उछाल
समीक्षा अवधि में वस्तुओं (Goods) का निर्यात 310 अरब डॉलर से बढ़कर 442 अरब डॉलर हो गया। मंत्रालय के अनुसार, इस वृद्धि में इंजीनियरिंग गुड्स और इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स की भूमिका सबसे उल्लेखनीय रही है। यह संकेत देता है कि भारत का निर्यात आधार परंपरागत कच्चे माल से हटकर उच्च-मूल्य (High-Value) उत्पादों की ओर तेज़ी से स्थानांतरित हो रहा है। मई 2026 में अकेले वस्तु निर्यात सालाना आधार पर 18 प्रतिशत बढ़कर 45.2 अरब डॉलर रहा।
सेवा क्षेत्र बना निर्यात का नया इंजन
सर्विसेज निर्यात इस दौरान 158.1 अरब डॉलर से लगभग तीन गुना बढ़कर 421.3 अरब डॉलर पर पहुँच गया, जिसकी सालाना वृद्धि दर 9 प्रतिशत रही। इसके परिणामस्वरूप कुल निर्यात में सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी 33.8 प्रतिशत से बढ़कर 48.8 प्रतिशत हो गई है — यानी अब भारत के हर दो डॉलर के निर्यात में लगभग एक डॉलर सेवाओं से आता है।
इस तीव्र वृद्धि के पीछे देश के आईटी क्षेत्र का विस्तार, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) की बढ़ती संख्या और कोविड महामारी के बाद डिजिटल सेवाओं की वैश्विक माँग में आई उछाल प्रमुख कारण रहे हैं। सॉफ्टवेयर सेवाएँ कुल सेवा निर्यात में 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी के साथ सबसे बड़ी योगदानकर्ता बनी हुई हैं, जबकि प्रोफेशनल और मैनेजमेंट कंसल्टिंग दूसरे सबसे बड़े योगदानकर्ता के रूप में उभरी हैं।
नीतिगत सुधारों की भूमिका
वाणिज्य मंत्रालय ने बताया कि निर्यात को सुगम बनाने के लिए पिछले वर्षों में कई संरचनात्मक सुधार किए गए। इनमें 47 व्यापार प्रक्रियाओं का सरलीकरण, स्वचालित विदेश व्यापार नीति (FTP) प्रक्रियाएँ, ऑटो-वैलिडेटेड आयातक-निर्यातक कोड (IEC) जारी करना और एक समर्पित निर्यात संवर्धन मिशन की शुरुआत शामिल हैं। गौरतलब है कि ये सुधार वैश्विक आपूर्ति शृंखला पुनर्गठन के उस दौर में आए, जब अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ 'चाइना-प्लस-वन' रणनीति के तहत भारत को विकल्प के रूप में देख रही थीं।
वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी गति बरकरार
पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न वैश्विक बाज़ार की अनिश्चितताओं के बावजूद, मंत्रालय के अनुसार मज़बूत मैन्युफैक्चरिंग इंटीग्रेशन और उन्नत डिजिटल क्षमताओं के बल पर चालू वित्त वर्ष में भी निर्यात की रफ़्तार बनी हुई है। यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक व्यापार पर अमेरिकी टैरिफ नीतियों और भू-राजनीतिक तनावों का दबाव बढ़ रहा है।
आगे की राह
आँकड़ों के अनुसार, भारत के निर्यात की संरचना में यह बदलाव दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए सकारात्मक संकेत है। विशेषज्ञों का मानना है कि सेवा निर्यात में GCC की भूमिका और इलेक्ट्रॉनिक्स में घरेलू विनिर्माण की मज़बूती आने वाले वर्षों में $1 ट्रिलियन निर्यात लक्ष्य की दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है।