अक्टूबर 2026 में कोयला उत्पादन 42% उछला, कैप्टिव-कमर्शियल खदानों से 22.03 मिलियन टन
सारांश
मुख्य बातें
कोयला मंत्रालय ने 2 नवंबर 2026 को बताया कि अक्टूबर 2026 में कैप्टिव और कमर्शियल खदानों से कोयले का उत्पादन 22.03 मिलियन टन (एमटी) रहा — जो अक्टूबर 2025 के 15.49 एमटी की तुलना में सालाना आधार पर 42 प्रतिशत अधिक है। मंत्रालय ने इसे खनन कार्यों में बनी निरंतर तेजी का संकेत बताया है।
उत्पादन और आपूर्ति के मुख्य आँकड़े
उत्पादन के साथ-साथ कोयले की आपूर्ति भी सालाना आधार पर 36 प्रतिशत बढ़कर 21.11 एमटी हो गई, जो अक्टूबर 2025 में 15.48 एमटी थी। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से अक्टूबर 2026 की संचयी अवधि में कोयला उत्पादन 11.30 प्रतिशत बढ़कर 117.23 एमटी हो गया, जो गत वर्ष की इसी अवधि में 105.33 एमटी था। इसी दौरान आपूर्ति 111.95 एमटी से बढ़कर 124.86 एमटी तक पहुँच गई।
लोहारी खदान को मंजूरी और खदानों की बढ़ती संख्या
झारखंड की लोहारी कोयला खदान को अक्टूबर 2026 में खदान खोलने की अनुमति मिली है। यह खदान कई वर्षों से चालू होने का इंतजार कर रही थी। मंत्रालय के अनुसार, यह मंजूरी 'व्यापार करने में आसानी' सुधारों की दिशा में एक अहम कदम है।
इस मंजूरी के साथ ही देश में चालू कैप्टिव और कमर्शियल कोयला खदानों की कुल संख्या बढ़कर 87 हो गई है। मंत्रालय ने कहा, 'ये उत्साहजनक नतीजे बेहतर परिचालन दक्षता, खनन उत्पादकता में वृद्धि और कैप्टिव तथा कमर्शियल कोयला खनन क्षेत्रों में खनन क्षमताओं के अधिक प्रभावी उपयोग को दर्शाते हैं।'
कोयला आयात में कमी और 'आत्मनिर्भर भारत'
घरेलू उत्पादन में वृद्धि का असर आयात के आँकड़ों में भी दिखा। अगस्त 2026 में भारत का कोयला आयात गत वर्ष के इसी महीने के 111.05 मिलियन टन से 5.83 प्रतिशत घटकर 104.57 मिलियन टन रह गया — यानी एक महीने में 6.48 एमटी की कमी। मंत्रालय के अनुसार, यह घरेलू स्तर पर कोयले की बेहतर उपलब्धता का प्रत्यक्ष परिणाम है।
मंत्रालय ने कहा कि इन खदानों से बढ़ता उत्पादन आयातित कोयले पर निर्भरता कम करने, सप्लाई-चेन को मजबूत बनाने और बहुमूल्य विदेशी मुद्रा बचाने में सहायक होगा — और सरकार के 'आत्मनिर्भर भारत' विजन को आगे बढ़ाएगा।
आगे की रणनीति
कोयला मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वह उत्पादन वृद्धि बनाए रखने, आपूर्ति संबंधी बाधाओं को दूर करने और कोयले की उपलब्धता में सुधार पर ध्यान केंद्रित रखेगा। इसके लिए प्रगतिशील नीतियों, मजबूत नियामक निगरानी और सभी हितधारकों के निरंतर सहयोग का सहारा लिया जाएगा। यह प्रयास देश की बढ़ती ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने की दिशा में निर्णायक साबित हो सकते हैं।