तिमोर-लेस्ते के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसिस्को गुटेरेस 'लू-ओलो' के निधन पर भारत ने जताया गहरा शोक
सारांश
मुख्य बातें
भारत ने तिमोर-लेस्ते (पूर्वी तिमोर) के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसिस्को गुटेरेस 'लू-ओलो' के निधन पर बुधवार, 24 जून 2026 को गहरी संवेदना व्यक्त की। विदेश मंत्रालय (MEA) ने कहा कि गुटेरेस को दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को प्रगाढ़ करने में उनके अतुलनीय योगदान के लिए सदा स्मरण किया जाएगा।
भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी दी कि पूर्वी मामलों के सचिव रुद्रेंद्र टंडन नई दिल्ली स्थित तिमोर-लेस्ते के दूतावास पहुँचे और शोक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने भारत सरकार की ओर से दिवंगत राष्ट्रपति के परिजनों, तिमोर-लेस्ते की सरकार और वहाँ की जनता के प्रति शोक संवेदनाएँ अर्पित कीं।
जायसवाल ने अपने बयान में कहा, 'डॉ. फ्रांसिस्को गुटेरेस लू-ओलो भारत और तिमोर-लेस्ते के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए हमेशा याद किए जाएंगे।'
निधन का विवरण
71 वर्षीय गुटेरेस 'लू-ओलो' का निधन रविवार को मलेशिया के एक अस्पताल में हुआ, जहाँ वे उपचाराधीन थे। तिमोर-लेस्ते की समाचार एजेंसी टाटोली ने इसकी पुष्टि की। उनके परिजनों ने इसे उनकी पत्नी, बच्चों, राजनीतिक दल फ्रेटिलिन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले सभी लोगों के लिए 'गहरी क्षति' बताया।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
गुटेरेस ने 1974 में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन से जुड़कर इंडोनेशियाई कब्जे के विरुद्ध सक्रिय संघर्ष में हिस्सा लिया। 1998 में वे फ्रेटिलिन के प्रमुख बने — वह पार्टी जो सशस्त्र प्रतिरोध की कोख से उभरी थी।
गौरतलब है कि 1974 में स्थापित फ्रेटिलिन ने 28 नवंबर 1975 को पुर्तगाल से पूर्वी तिमोर की स्वतंत्रता का एकतरफा ऐलान किया था। इस घोषणा के तुरंत बाद इंडोनेशिया ने पूर्वी तिमोर पर सैन्य आक्रमण कर दिया, जिसके बाद फ्रेटिलिन ने अपने सशस्त्र विंग 'फालिनटिल' के ज़रिए दशकों तक लंबा और रक्तरंजित प्रतिरोध जारी रखा।
राजनीतिक विरासत
स्वतंत्रता जनमत संग्रह के बाद 2001 में गुटेरेस संविधान सभा के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और राष्ट्रीय संसद के अध्यक्ष की भूमिका निभाते हुए उन्होंने 2002 में तिमोर-लेस्ते की स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना की घोषणा की। वे 2002 से 2007 तक संसद के अध्यक्ष (स्पीकर) रहे और 2017 से 2022 तक देश के राष्ट्रपति के पद पर आसीन रहे।
उनके निधन से तिमोर-लेस्ते ने अपने स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख स्तंभ को खो दिया है। भारत-तिमोर-लेस्ते द्विपक्षीय संबंधों पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव का आकलन आने वाले समय में होगा।