कवच 4.0: लखनऊ डिवीजन में ₹252 करोड़ की रेल सुरक्षा परियोजना को मंजूरी, 607.7 किमी रूट होगा कवर
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रेलवे ने 19 सितंबर 2026 को पूर्वोत्तर रेलवे के लखनऊ डिवीजन में स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन प्रणाली कवच संस्करण 4.0 को 607.7 रूट किलोमीटर पर लागू करने की परियोजना को ₹252 करोड़ की लागत से स्वीकृति प्रदान की। एक आधिकारिक बयान के अनुसार, यह कदम उत्तर प्रदेश के रेल नेटवर्क में सुरक्षा ढाँचे को और सुदृढ़ करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
कवच 4.0 परियोजना का दायरा
स्वीकृत परियोजना के तहत लखनऊ डिवीजन के चिन्हित शेष रेल खंडों पर कवच 4.0 की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। रेलवे के अनुसार, यह परियोजना स्वदेशी तकनीक-आधारित रेल सुरक्षा प्रणाली के व्यापक विस्तार की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। यह पहल पूरे रेल नेटवर्क में कवच प्रणाली को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की चल रही प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है।
कवच प्रणाली क्या है और यह कैसे काम करती है
कवच भारतीय रेल द्वारा विकसित एक स्वदेशी ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली है, जिसका मुख्य उद्देश्य मानवीय त्रुटियों से उत्पन्न होने वाली दुर्घटनाओं को रोकना और ट्रेन संचालन को सुरक्षित बनाना है। यह प्रणाली सिग्नल पास्ड एट डेंजर (SPAD) जैसी गंभीर घटनाओं को रोकने में विशेष रूप से कारगर है।
ज़रूरत पड़ने पर कवच स्वतः ब्रेक लगा सकती है और ट्रेनों की गतिविधियों की लगातार निगरानी करते हुए सुरक्षित परिचालन सुनिश्चित करती है। गौरतलब है कि यह तकनीक पूरी तरह भारत में विकसित की गई है, जो 'आत्मनिर्भर भारत' के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
सोलापुर मंडल में इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग परियोजना
इसी कड़ी में भारतीय रेल ने मध्य रेलवे के सोलापुर मंडल के सात स्टेशनों पर इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग (EI) प्रणाली स्थापित करने की परियोजना को भी ₹209 करोड़ की लागत से मंजूरी दी है। जिन स्टेशनों पर यह आधुनिक सिग्नलिंग प्रणाली लगाई जाएगी, उनमें मोहोल, मुंधेवाड़ी, बाले, सोलापुर, होटगी जंक्शन-होटगी ए केबिन, शाहाबाद और वाडी जंक्शन शामिल हैं।
ये सभी स्टेशन हाई डेंसिटी नेटवर्क (HDN-7) मार्ग पर स्थित हैं, जहाँ पहले ही कवच, ऑटोमैटिक ब्लॉक सिग्नलिंग (ABS) और सेंट्रलाइज्ड ट्रैफिक कंट्रोल (CTC) परियोजनाओं को स्वीकृति दी जा चुकी है।
इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग का महत्त्व
इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग एक आधुनिक कंप्यूटर-आधारित सिग्नलिंग प्रणाली है जो पारंपरिक रिले-आधारित इंटरलॉकिंग की जगह लेती है। इससे पॉइंट्स और सिग्नलों का संचालन अधिक भरोसेमंद होता है, खराबी की पहचान और उसका समाधान तेज़ी से होता है, तथा समग्र रखरखाव भी सुगम बनता है। रेलवे के अनुसार, यह प्रणाली सोलापुर मंडल में कवच जैसी स्वदेशी सुरक्षा प्रणालियों के प्रभावी कार्यान्वयन में भी सहायक सिद्ध होगी।
आगे की राह
रेलवे का कहना है कि ये दोनों परियोजनाएँ उच्च घनत्व वाले रेल मार्गों पर सुरक्षा बढ़ाने, सिग्नलिंग व्यवस्था के आधुनिकीकरण और परिचालन दक्षता में सुधार की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा हैं। यह ऐसे समय में आया है जब देश में रेल दुर्घटनाओं को लेकर सार्वजनिक और संसदीय दबाव बढ़ा हुआ है। इन परियोजनाओं के पूरा होने के बाद रेल संचालन के अधिक सुरक्षित, तेज़ और विश्वसनीय बनने की उम्मीद जताई जा रही है।