21 सितंबर 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

आईओबी बैंक धोखाधड़ी: ईडी ने चेन्नई-तिरुप्पुर में छह ठिकानों पर छापे मारे, ₹82 लाख नकद जब्त

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
आईओबी बैंक धोखाधड़ी: ईडी ने चेन्नई-तिरुप्पुर में छह ठिकानों पर छापे मारे, ₹82 लाख नकद जब्त

सारांश

ईडी ने आईओबी के साथ ₹116.79 करोड़ की कथित धोखाधड़ी के मामले में चेन्नई और तिरुप्पुर में छह ठिकानों पर छापे मारे। जब्त सामान में ₹82 लाख नकद और दो लग्जरी वाहन शामिल हैं। पीजीसी कॉर्पोरेशन के निदेशकों पर हेरफेर किए वित्तीय विवरण और विदेशी कंपनियों के ज़रिए राउंड ट्रिपिंग का आरोप है।

मुख्य बातें

ईडी के चेन्नई जोनल ऑफिस-II ने चेन्नई और तिरुप्पुर में छह परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया।
मामला इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी) के साथ कथित ₹116.79 करोड़ की धोखाधड़ी से जुड़ा है।
तलाशी में ₹82 लाख बेहिसाबी नकदी, दो लग्जरी वाहन और डिजिटल उपकरण जब्त किए गए।
पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड के खाते को 2013 में एनपीए और 2020 में फ्रॉड अकाउंट घोषित किया गया था।
विक्रम पर भारत-विदेश में शेल-कंपनी नेटवर्क के ज़रिए ₹235 करोड़ की इन्वेंट्री बेचने का भी आरोप है।
मामले में आगे की जांच जारी है।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के चेन्नई जोनल ऑफिस-II ने इंडियन ओवरसीज बैंक (आईओबी) के साथ कथित ₹116.79 करोड़ की धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में चेन्नई और तिरुप्पुर स्थित छह रिहायशी व व्यावसायिक परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 के तहत पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य आरोपियों के विरुद्ध चल रही जांच का हिस्सा है। तलाशी में ₹82 लाख की बेहिसाबी नकदी, दो लग्जरी वाहन और बड़ी संख्या में डिजिटल उपकरण एवं दस्तावेज जब्त किए गए।

मामले की पृष्ठभूमि

ईडी ने यह जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की आर्थिक अपराध शाखा (ईओबी), चेन्नई द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की। उक्त एफआईआर में विभिन्न दंडात्मक धाराओं के साथ-साथ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 के प्रावधान भी शामिल हैं।

आरोप है कि पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड के निदेशकों — डी. प्रेम, आदित्य डी. विक्रम और के. कालीस्वरन — तथा कुछ अज्ञात सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों ने मिलकर इंडियन ओवरसीज बैंक के साथ करीब ₹116.79 करोड़ की धोखाधड़ी की।

कैसे हुई धोखाधड़ी

जांच एजेंसी के अनुसार, पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने बैंक से विभिन्न ऋण सुविधाएं प्राप्त की थीं। बैंक ने कंपनी के खाते को वर्ष 2013 में एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) घोषित किया, और 2020 में इसे फ्रॉड अकाउंट के रूप में वर्गीकृत किया। आरोप है कि कंपनी ने अधिक ऋण सुविधा हासिल करने के लिए वित्त वर्ष 2011-12 के हेरफेर किए गए वित्तीय विवरण बैंक को सौंपे।

ईडी का आरोप है कि ऋण से प्राप्त धन का दुरुपयोग किया गया — उसका एक हिस्सा निजी बैंक खातों और विदेशी कंपनियों को स्थानांतरित किया गया। जांच में फंड की 'राउंड ट्रिपिंग' का भी पता चला है, यानी विदेश भेजी गई ऋण राशि बाद में भारत वापस लाकर स्थानीय कारोबारी खर्चों में लगाई गई।

कंपनी-नेटवर्क और संपत्तियाँ

एजेंसी के मुताबिक, डी. प्रेम और आदित्य डी. विक्रम ने भारत और विदेशों में कंपनियों तथा फर्मों का एक नेटवर्क तैयार किया, जिसके ज़रिए ऋण राशि को निवेश के रूप में अलग-अलग संस्थाओं में भेजा गया। जांच में यह भी सामने आया कि बैंक द्वारा ऋण वसूली शुरू किए जाने के बाद पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड की करीब ₹235 करोड़ मूल्य की इन्वेंट्री संबंधित कंपनियों को बेच दी गई।

तलाशी के दौरान आरोपियों की कथित आलीशान जीवनशैली और उनके जीवनसाथियों व रिश्तेदारों के नाम पर दर्ज संपत्तियों की जानकारी भी मिली। आरोपियों ने अपने जीवनसाथियों और कर्मचारियों के नाम पर नए कारोबार भी शुरू किए थे, परंतु उनका वास्तविक नियंत्रण कथित तौर पर उन्हीं के हाथ में था।

जब्ती का ब्यौरा

ईडी ने तलाशी अभियान के दौरान ₹82 लाख की बेहिसाबी नकदी, दो लग्जरी वाहन, लैपटॉप, पेन ड्राइव और मोबाइल फोन सहित डिजिटल उपकरण, संपत्ति से जुड़े दस्तावेज और अन्य आपत्तिजनक कागजात बरामद कर जब्त किए। गौरतलब है कि यह मामला एक दशक से अधिक समय तक बैंकिंग तंत्र में बना रहा और तब सामने आया जब खाते को 2020 में औपचारिक रूप से फ्रॉड घोषित किया गया।

आगे की जांच

ईडी के अनुसार मामले में आगे की जांच जारी है। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्रीय एजेंसियाँ बैंकिंग धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में तेज़ी से कार्रवाई कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 'राउंड ट्रिपिंग' और शेल-कंपनी नेटवर्क के ज़रिए की जाने वाली इस तरह की धोखाधड़ी बैंकों के एनपीए संकट की एक प्रमुख जड़ रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तथा फ्रॉड में वर्गीकृत होने में एक दशक से अधिक लग गया। राउंड ट्रिपिंग और जीवनसाथियों के नाम पर संपत्तियाँ छिपाने के आरोप दर्शाते हैं कि यह केवल एक कंपनी की चूक नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ढाँचा था। असली सवाल यह है कि इतने वर्षों तक बैंक के आंतरिक ऑडिट और नियामकीय निगरानी इसे क्यों नहीं पकड़ पाई — जिस पर अभी तक कोई जवाब सामने नहीं आया है।
RashtraPress
21 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

आईओबी बैंक धोखाधड़ी मामले में ईडी की कार्रवाई क्या है?
ईडी ने इंडियन ओवरसीज बैंक के साथ कथित ₹116.79 करोड़ की धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में चेन्नई और तिरुप्पुर में छह परिसरों पर तलाशी अभियान चलाया। यह कार्रवाई प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट, 2002 के तहत पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड और संबंधित आरोपियों के विरुद्ध है।
पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड पर क्या आरोप हैं?
आरोप है कि कंपनी ने वित्त वर्ष 2011-12 के लिए हेरफेर किए गए वित्तीय विवरण बैंक को सौंपकर अधिक ऋण सुविधा ली। इसके बाद ऋण राशि को विदेशी कंपनियों में भेजा गया और 'राउंड ट्रिपिंग' के ज़रिए वापस भारत लाकर निजी खर्चों में उपयोग किया गया।
ईडी को छापेमारी में क्या मिला?
तलाशी में ₹82 लाख की बेहिसाबी नकदी, दो लग्जरी वाहन, लैपटॉप, पेन ड्राइव, मोबाइल फोन सहित डिजिटल उपकरण और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज जब्त किए गए। आरोपियों की आलीशान जीवनशैली और उनके परिजनों के नाम पर संपत्तियों की जानकारी भी मिली।
इस मामले में कौन-से आरोपी हैं?
मुख्य आरोपी पीजीसी कॉर्पोरेशन लिमिटेड के निदेशक डी. प्रेम, आदित्य डी. विक्रम और के. कालीस्वरन हैं। इनके अलावा कुछ अज्ञात सरकारी कर्मचारी और निजी व्यक्ति भी जांच के दायरे में हैं।
इस धोखाधड़ी का पता इतनी देर से क्यों चला?
पीजीसी कॉर्पोरेशन का खाता 2013 में एनपीए घोषित हुआ, लेकिन इसे फ्रॉड अकाउंट के रूप में वर्गीकृत करने में 2020 तक का समय लगा। ईडी की मौजूदा जांच सीबीआई की एफआईआर के आधार पर शुरू हुई, और मामले में आगे की जांच अभी जारी है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 10 मिनट पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 3 महीने पहले
  5. 10 महीने पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले