'सतलुज' फिल्म पर पूर्व IAS करण बीर सिंह सिद्धू: 'इतिहास संतुलित दिखाएं, पुराने जख्म न कुरेदें'
सारांश
मुख्य बातें
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी करण बीर सिंह सिद्धू ने 16 जुलाई को चंडीगढ़ में फिल्म 'सतलुज' पर अपनी विस्तृत राय साझा की। उनका कहना है कि यह फिल्म एक संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को उठाती है, किंतु यदि इतिहास को पर्दे पर प्रस्तुत किया जाए तो उसे पूर्ण सच्चाई और सभी पक्षों के साथ दिखाया जाना अनिवार्य है — केवल एकपक्षीय नजरिए से नहीं।
पंजाब के उस कठिन दौर का प्रत्यक्षदर्शी अनुभव
सिद्धू 1992 से 1996 तक अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर रहे और इससे पहले दो वर्षों तक अतिरिक्त उपायुक्त (विकास) के पद पर कार्यरत थे। उस काल में आज का तरनतारन जिला भी अमृतसर जिले का अंग था। उन्होंने बताया कि पंजाब उस समय अत्यंत कठिन दौर से गुजर रहा था — राष्ट्रपति शासन से लेकर बेअंत सिंह सरकार के कार्यकाल तक पंजाब पुलिस आतंकवाद के विरुद्ध निरंतर अभियान चला रही थी।
1994 के मध्य तक हालात सामान्य होते दिखने लगे थे। लेकिन 31 अगस्त 1995 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की बम विस्फोट में हत्या के कुछ ही दिन बाद, 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा के कथित अपहरण की घटना सामने आई।
खालड़ा प्रकरण: घटनाक्रम और प्रशासनिक कार्रवाई
सिद्धू ने बताया कि जसवंत सिंह खालड़ा शिरोमणि अकाली दल के नेता और मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव थे। प्रशासन से उनका नियमित संपर्क रहता था और वे कथित अवैध दाह संस्कारों की स्वतंत्र जांच कर रहे थे, जिसके लिए विदेश यात्राएं भी कर चुके थे।
6 सितंबर 1995 की सुबह परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस खालड़ा को घर से उठा ले गई है। अमृतसर के एसएसपी से संपर्क करने पर बताया गया कि खालड़ा पुलिस की हिरासत में नहीं हैं। इसके बाद तत्कालीन तरनतारन एसएसपी अजीत सिंह संधू से भी संपर्क का प्रयास किया गया। जब पुलिस की ओर से कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिली, तो सिद्धू ने तत्काल अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट, तरनतारन को मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए। गवाहों के बयान दर्ज किए गए और वाहन संबंधी सूचनाएं एकत्र की गईं।
इसी बीच खालड़ा की पत्नी और एसजीपीसी के तत्कालीन अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहरा ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सर्वोच्च न्यायालय में पहले से कथित अज्ञात शवों के दाह संस्कार संबंधी याचिका लंबित थी, और उसी याचिकाकर्ता के अचानक लापता होने पर अदालत ने मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया।
सीबीआई जांच और अदालती फैसला
सर्वोच्च न्यायालय ने 15 नवंबर 1995 को सीबीआई को नई एफआईआर दर्ज कर जांच का निर्देश दिया। एसएसपी अजीत सिंह संधू ने भी अपने हलफनामे में कहा था कि खालड़ा उनकी हिरासत में नहीं हैं। सीबीआई ने पूरे घटनाक्रम की कड़ी-दर-कड़ी जांच की।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण गवाह तत्कालीन एसपीओ कुलदीप सिंह बने। कुलदीप सिंह ने दावा किया कि खालड़ा को अवैध हिरासत में रखा गया, बाद में गोली मार दी गई और शव को हरिके नहर क्षेत्र में ठिकाने लगाया गया। जान के खतरे के कारण वे शुरुआत में सामने नहीं आए, परंतु 1998 में सीबीआई के समक्ष बयान दिया। लंबी सुनवाई के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने छह पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया — दो को हत्या में उम्रकैद और अन्य को अपहरण सहित विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई गई। यह एक दुर्लभ मामला था, क्योंकि खालड़ा का शव कभी बरामद नहीं हुआ, फिर भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हत्या सिद्ध मानी गई।
फिल्म 'सतलुज' पर सिद्धू की राय
सिद्धू ने कहा कि कलाकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है और यदि यह जसवंत सिंह खालड़ा की बायोपिक है तो निर्माता उनका पक्ष दिखा सकते हैं। किंतु यदि इतिहास प्रस्तुत किया जा रहा है तो वह पूर्ण और संतुलित होना चाहिए। उनके अनुसार, नया दर्शक यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भारतीय राज्य ने संगठित रूप से सिख युवाओं के विरुद्ध अभियान चलाया, जबकि वास्तविकता कहीं अधिक जटिल थी।
उन्होंने स्मरण दिलाया कि पंजाब ने आतंकवाद, ऑपरेशन ब्लू स्टार, 1984 के दंगे और हजारों निर्दोष नागरिकों तथा पुलिसकर्मियों की शहादत का दर्द झेला है। इसलिए इतिहास को केवल एक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
ओटीटी नियमन और आगे की राह
सिद्धू ने यह भी रेखांकित किया कि यदि फिल्म थिएटरों के लिए सेंसर बोर्ड द्वारा सुझाए गए संशोधनों के बिना प्रदर्शन योग्य नहीं मानी गई थी, लेकिन वही सामग्री ओटीटी पर बिना समान नियमन के उपलब्ध हो जाती है, तो यह नीति-निर्माताओं के लिए गंभीर विचार का विषय है। उन्होंने कहा कि आज पंजाब शांति के दौर में है और अतीत के घावों को बार-बार कुरेदने के बजाय राज्य की वर्तमान समस्याओं — बेरोजगारी, नशा, कृषि संकट, गैंगस्टर नेटवर्क और सीमा पार से ड्रोन के जरिए हथियारों व मादक पदार्थों की तस्करी — पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।
यदि अतीत की निष्पक्ष पड़ताल करनी ही हो, तो सिद्धू ने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार के कानून के तहत सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक ट्रुथ कमीशन बनाया जा सकता है, जो उस पूरे दौर की घटनाओं की संतुलित और निष्पक्ष समीक्षा करे। उनका मानना है कि फिल्म का संभावित नुकसान उसके लाभ से अधिक हो सकता है।