गौ संरक्षण केवल सरकार की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी: कैलाश विजयवर्गीय का हरिद्वार में बड़ा बयान
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने 24 मई को हरिद्वार में मीडिया से बातचीत के दौरान स्पष्ट कहा कि गौ संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज का दायित्व है। यह बयान ऐसे समय में आया जब गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किए जाने की माँग विभिन्न धार्मिक और सामाजिक मंचों पर जोर पकड़ रही है।
सनातन परंपरा में गाय का महत्व
विजयवर्गीय ने कहा कि सनातन परंपरा में गाय का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अतुलनीय है। उन्होंने मान्यता का हवाला देते हुए कहा कि गौमाता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास माना जाता है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि कई संत-महात्मा पहले गाय को अन्न खिलाते हैं और उसके पश्चात स्वयं भोजन ग्रहण करते हैं — यह श्रद्धा की गहराई को दर्शाता है।
उन्होंने कुछ संतों का उदाहरण देते हुए बताया कि वे गाय के गोबर से निकले अन्न को सुखाकर उसका आटा तैयार करते हैं और उसी से भोजन बनाते हैं। विजयवर्गीय के अनुसार, यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय जीवनशैली और परंपराओं का अभिन्न अंग है।
सामाजिक समरसता का संदर्भ
विजयवर्गीय ने कहा कि उन्हें इस बात पर गर्व है कि अब मुस्लिम समाज के कुछ मौलवी भी गाय को सम्मान देने की बात कर रहे हैं। उनके अनुसार, यह प्रवृत्ति भारतीय संस्कृति के प्रति बढ़ते सम्मान और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। गौरतलब है कि गौ संरक्षण का विषय अक्सर सांप्रदायिक संवेदनशीलता से जुड़ा रहा है, ऐसे में यह टिप्पणी उल्लेखनीय है।
आवारा पशुओं की समस्या पर चिंता
मंत्री ने समाज में व्याप्त एक गंभीर समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि बहुत से लोग गाय के बूढ़ी हो जाने पर उसे खुले में छोड़ देते हैं, जो चिंताजनक है। ट्रैक्टरों के बढ़ते उपयोग के बाद बैलों को भी खुले में छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ी है। इस प्रवृत्ति को उन्होंने न केवल पशुओं के प्रति क्रूरता, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों से विचलन भी बताया।
समाज को आगे आने का आह्वान
विजयवर्गीय ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि केवल शासन-तंत्र के भरोसे गौमाता की रक्षा संभव नहीं है। उन्होंने समाज से आग्रह किया कि वह सामूहिक रूप से जागरूक हो और गौ संरक्षण की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले। यह बयान ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब कई राज्यों में गौशालाओं की दुर्दशा और आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या एक नीतिगत चुनौती बनी हुई है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि इस सामाजिक आह्वान को ज़मीनी स्तर पर किस रूप में अमल में लाया जाता है।