कपिल सिब्बल का चुनाव आयोग पर तीखा हमला: CEC ज्ञानेश कुमार को सस्पेंड करो, SIR तुरंत रोको
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने 23 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए और माँग की कि उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए तथा पूरे देश में जारी खास गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को फौरन रोका जाए। सिब्बल के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत 30 राज्यों में 13 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से पहले ही हटाए जा चुके हैं, और यदि यह जारी रहा तो यह आँकड़ा 30 करोड़ तक पहुँच सकता है।
आयोग पर केंद्रीकरण के आरोप
सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने 40 अलग-अलग पोर्टल और ऐप्स को एकीकृत कर सारा नियंत्रण एक ही जगह केंद्रित कर दिया है, जो आयोग की डायरेक्टर जनरल (आईटी) सीमा खन्ना के अधीन आ गया है। उनका कहना है कि यह संरचनागत बदलाव पारदर्शिता के बजाय शक्ति-संकेंद्रण की दिशा में उठाया गया कदम है।
सिब्बल ने कहा, 'हमने ये बातें पहले ही सुप्रीम कोर्ट को बता दी हैं। हम सुप्रीम कोर्ट को हर दिन बता रहे हैं। जब भी यह मामला सामने आता है, सुप्रीम कोर्ट हमारी बात सुनता तक नहीं है। हम कहते हैं कि उन पर भरोसा न करें, जमीनी हकीकत देखें।'
सहयोगी आयुक्तों के विरोध को नज़रअंदाज़ करने का दावा
सिब्बल के अनुसार, तीन सदस्यीय आयोग में बहुमत से फैसले लेने का प्रावधान है, लेकिन कथित तौर पर CEC ज्ञानेश कुमार अकेले ही तमाम फैसले ले रहे हैं — चाहे वह चुनाव संचालन का तरीका हो, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) के दायित्व हों या फॉर्म भरने की प्रक्रिया। उन्होंने दावा किया कि दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों — जोशी साहब और संधू साहब — ने पिछले 10 महीनों में लगभग 14 बार विरोध जताया और कहा कि यह कार्रवाई 'संवैधानिक नहीं है, कानून के मुताबिक नहीं है', लेकिन उनकी आपत्तियाँ नजरअंदाज़ कर दी गईं।
गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब चुनाव आयोग की स्वायत्तता और CEC नियुक्ति प्रक्रिया पर पहले से ही राष्ट्रीय बहस जारी है।
SIR की वैधता पर सवाल
सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयुक्तों ने खुद स्वीकार किया है कि 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट' के तहत SIR केवल विशेष परिस्थितियों में और सीमित दायरे में की जा सकती है। इससे पूर्व यह प्रक्रिया सिर्फ एक बार, एक ही निर्वाचन क्षेत्र में लागू हुई थी। अब इसे पूरे देश में लागू करना, उनके अनुसार, कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से अभूतपूर्व है।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया इसलिए चलाई जा रही है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि मतदान का अधिकार किसे मिलेगा और किसका नाम सूची से हटाया जाएगा।
फॉर्म-6 विवाद: 'झूठा घोषणापत्र' देने की मजबूरी का दावा
सिब्बल ने फॉर्म-6 में एक गंभीर खामी की ओर ध्यान दिलाया। उनके अनुसार, नए वोटर के रूप में फॉर्म-6 भरते समय यह घोषणा करनी होती है कि 'मैंने पहले कभी वोट नहीं दिया।' जिन मतदाताओं के नाम सूची से हट गए हैं — या जिनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम लिस्ट में नहीं हैं — उन्हें दोबारा यह फॉर्म भरना होगा और एक ऐसी घोषणा करनी होगी जो तथ्यात्मक रूप से असत्य होगी, क्योंकि वे पहले वोट दे चुके हैं।
माँगें और आगे की राह
सिब्बल ने माँग की कि इस पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए और जाँच पूरी होने तक CEC ज्ञानेश कुमार को निलंबित कर SIR को तत्काल रोका जाए। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया जा चुका है, और आने वाले दिनों में इस पर सुनवाई की संभावना बनी हुई है।