31 जुलाई 2026
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कर्नाटक हाईकोर्ट का सरकार और पुलिस पर कड़ा प्रहार: चामराजनगर में मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक पर भीड़ के हमले पर जज बोले 'राज्य में अराजकता है'

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कर्नाटक हाईकोर्ट का सरकार और पुलिस पर कड़ा प्रहार: चामराजनगर में मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक पर भीड़ के हमले पर जज बोले 'राज्य में अराजकता है'

सारांश

कर्नाटक हाईकोर्ट ने चामराजनगर में मानसिक रूप से अस्वस्थ 19 वर्षीय युवक को नंगा कर खंभे से बाँधने और पीटने की घटना पर राज्य सरकार और पुलिस को आड़े हाथों लिया। जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा — 'राज्य में अराजकता है, कानून का कोई राज नहीं।' एसपी के धमकी भरे बयान ने विवाद और गहरा कर दिया।

मुख्य बातें

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2026 को राज्य सरकार और पुलिस को चामराजनगर में मानसिक रूप से अस्वस्थ 19 वर्षीय युवक पर भीड़ के कथित हमले को लेकर कड़ी फटकार लगाई।
कथित तौर पर भीड़ ने युवक को नंगा कर बिजली के खंभे से बाँधा और पुलिस के आने से पहले उस पर हमला किया।
पुलिस ने युवक की मानसिक स्थिति के बावजूद उसके खिलाफ बीएनएस की धारा 299 और 324(4) के तहत मामला दर्ज किया।
नागप्रसन्ना ने कहा, 'राज्य में अराजकता है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा नहीं होना चाहिए।' एक पुलिस अधीक्षक का युवक को देश निकाला देने और हर साल एफआईआर दर्ज करने की धमकी देने वाला वीडियो कोर्ट के संज्ञान में लाया गया।
मामला अभी कर्नाटक हाईकोर्ट में विचाराधीन है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2026 को चामराजनगर जिले में मानसिक रूप से अस्वस्थ 19 वर्षीय युवक पर भीड़ के कथित हमले को लेकर राज्य सरकार और पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने घटना की तस्वीरें देखने के बाद कर्नाटक में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि लोकतांत्रिक समाज में इस तरह की बर्बरता की कोई जगह नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला चामराजनगर जिले के एक गाँव में घटी उस घटना से जुड़ा है, जिसमें उक्त युवक पर डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर वाले साइनबोर्ड की लाइटिंग को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया गया था। युवक के पिता ने अपने बेटे के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की माँग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर सुनवाई के दौरान यह पूरा मामला सामने आया।

मुख्य घटनाक्रम: भीड़ की बर्बरता

कोर्ट में पेश दलीलों के अनुसार, स्थानीय लोगों ने कथित तौर पर उस युवक को नंगा कर दिया, उसे बिजली के खंभे से बाँध दिया और पुलिस के मौके पर पहुँचने से पहले उस पर हमला किया। इसके बावजूद पुलिस ने उस युवक की मानसिक स्थिति को नजरअंदाज करते हुए उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 299 और 324(4) के तहत मामला दर्ज कर दिया।

गौरतलब है कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने पहले ही पुलिस को निर्देश दे रखा था कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई जबरदस्ती की कार्रवाई न की जाए।

जस्टिस नागप्रसन्ना की तीखी टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागप्रसन्ना ने कड़े शब्दों में कहा, 'क्या यह कानून का राज है? यह क्या है? इसीलिए मैं रोज कह रहा हूँ, राज्य में अराजकता है। कानून का कोई राज नहीं है। दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं होता। डेमोक्रेटिक सिस्टम में ऐसा नहीं होता।' उन्होंने यह भी कहा, 'सबसे बुरे राज में भी ये चीजें बहुत पहले बंद हो गई हैं, लेकिन इस देश में नहीं।'

पुलिस अधिकारी के आचरण पर सवाल

कोर्ट को यह भी बताया गया कि एक पुलिस अधीक्षक (SP) कैमरे में उस युवक को देश निकाला देने की धमकी देते और हर साल उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की चेतावनी देते दिखाई दे रहे हैं। इस पर जस्टिस नागप्रसन्ना ने तीखा सवाल किया, 'एसपी को इस तरह बात करने का कोई हक नहीं है। इस तरह का तुष्टिकरण क्या है?' यह टिप्पणी पुलिस की भूमिका और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

आगे क्या होगा

यह मामला अभी कर्नाटक हाईकोर्ट में विचाराधीन है। अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन पर इस मामले में ठोस जवाब देने का दबाव बढ़ गया है। यह ऐसे समय में आया है जब मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों के अधिकारों और भीड़ न्याय (mob justice) की बढ़ती घटनाओं को लेकर पूरे देश में बहस तेज है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भीड़ न्याय की उस बढ़ती प्रवृत्ति का प्रतिबिंब है जिसमें पुलिस की मौजूदगी भीड़ को रोकने की बजाय उसे वैधता देती दिखती है। जब एक पुलिस अधीक्षक कैमरे पर धमकी देता है और प्रशासन मानसिक रोगी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करता है, तो सवाल सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही का है। जस्टिस नागप्रसन्ना की 'अराजकता' वाली टिप्पणी न्यायपालिका की उस बेचैनी को दर्शाती है जो तब उभरती है जब कार्यपालिका अपनी सीमाएँ तोड़ती है। असली परीक्षा यह है कि क्या हाईकोर्ट की फटकार के बाद राज्य सरकार मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए ठोस तंत्र बनाती है, या यह भी महज एक अदालती टिप्पणी बनकर रह जाती है।
RashtraPress
31 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक हाईकोर्ट ने किस मामले में सरकार और पुलिस को फटकारा?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने चामराजनगर जिले में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ 19 वर्षीय युवक पर भीड़ के कथित हमले को लेकर राज्य सरकार और पुलिस को फटकारा। युवक के पिता ने अपने बेटे के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की माँग को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
चामराजनगर में मानसिक रूप से अस्वस्थ युवक के साथ क्या हुआ था?
कोर्ट में पेश दलीलों के अनुसार, स्थानीय भीड़ ने कथित तौर पर युवक को नंगा कर बिजली के खंभे से बाँध दिया और पुलिस के पहुँचने से पहले उस पर हमला किया। युवक पर डॉ. अंबेडकर की तस्वीर वाले साइनबोर्ड की लाइटिंग को नुकसान पहुँचाने का आरोप था।
जस्टिस नागप्रसन्ना ने क्या कहा?
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने कहा, 'राज्य में अराजकता है, कानून का कोई राज नहीं है। दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं होता, लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा नहीं होता।' उन्होंने यह भी कहा कि सबसे बुरे शासन में भी ऐसी चीजें बहुत पहले बंद हो गई हैं।
पुलिस अधीक्षक पर क्या आरोप लगे?
कोर्ट को बताया गया कि एक पुलिस अधीक्षक कैमरे में युवक को देश निकाला देने की धमकी देते और हर साल उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की चेतावनी देते दिखे। जस्टिस नागप्रसन्ना ने इस पर कहा, 'एसपी को इस तरह बात करने का कोई हक नहीं है।'
इस मामले में अब आगे क्या होगा?
यह मामला अभी कर्नाटक हाईकोर्ट में विचाराधीन है। हाईकोर्ट ने पहले ही पुलिस को युवक के खिलाफ जबरदस्ती की कोई कार्रवाई न करने का निर्देश दे रखा है। अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन पर जवाब देने का दबाव बढ़ा है।
राष्ट्र प्रेस
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