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कर्नाटक हाई कोर्ट ने छात्र की एफआईआर रद्द की, कहा — क्लासमेट को 'सुंदर' कहना अपराध नहीं

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कर्नाटक हाई कोर्ट ने छात्र की एफआईआर रद्द की, कहा — क्लासमेट को 'सुंदर' कहना अपराध नहीं

सारांश

बेंगलुरु के एक कॉलेज छात्र ने इंस्टाग्राम पर दोस्त को 'सुंदर' कहा — और उस पर एफआईआर दर्ज हो गई। कर्नाटक हाई कोर्ट ने इसे कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए मामला खारिज किया और कहा कि 'जेन-जी की भाषा' अपराध नहीं है।

मुख्य बातें

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 20 वर्षीय छात्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द की, जिसने इंस्टाग्राम पर क्लासमेट को 'प्रिटी' और 'ब्यूटीफुल' कहा था।
नागप्रसन्ना ने कहा कि निजी बातचीत में की गई तारीफ स्टॉकिंग, वॉयरिज्म या महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने का अपराध नहीं है।
शिकायतकर्ता के पिता एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं; निजी संदेश उनके संज्ञान में आने के बाद बीएनएस और आईटी अधिनियम धारा 66ए के तहत एफआईआर दर्ज हुई थी।
कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही जारी रखने को कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया और छात्र के भविष्य पर पड़ने वाले असर पर चिंता जताई।
न्यायालय ने जाँच अधिकारी को निर्देश दिया कि जब्त किए गए सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तत्काल याचिकाकर्ता को लौटाए जाएँ।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 22 जुलाई 2025 को एक 20 वर्षीय कॉलेज छात्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया, जिस पर अपनी 21 वर्षीय महिला क्लासमेट को इंस्टाग्राम पर निजी संदेश भेजकर 'प्रिटी' और 'ब्यूटीफुल' कहने का आरोप था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि निजी बातचीत में की गई तारीफ को स्टॉकिंग, वॉयरिज्म या महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने जैसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

मामले का घटनाक्रम

यह मामला दो कॉलेज मित्रों के बीच इंस्टाग्राम पर हुई निजी बातचीत से उपजा। याचिकाकर्ता छात्र ने अपनी क्लासमेट को डायरेक्ट मैसेज में 'प्रिटी' और 'ब्यूटीफुल' जैसे शब्दों का प्रयोग किया था। कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, यह निजी संदेश बाद में शिकायतकर्ता के पिता को दिखाया गया, जो एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं। इसके बाद पुलिस ने छात्र के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए के तहत एफआईआर दर्ज कर दी।

न्यायालय का तर्क

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल-पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि विचाराधीन बातचीत पूरी तरह निजी थी और इसमें प्रयुक्त भाषा आज की युवा पीढ़ी — जिसे 'जेन-जी' कहा जाता है — के संवाद का स्वाभाविक हिस्सा है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, 'यह चैट सार्वजनिक नहीं है। यह दो लोगों के बीच की बातचीत है। इसमें इस्तेमाल की गई भाषा वैसी ही है जैसी आजकल के छात्र इस्तेमाल करते हैं। इसे अपराध नहीं माना जा सकता।' न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि महज प्रशंसा के शब्द स्टॉकिंग या वॉयरिज्म की परिभाषा में नहीं आते।

युवाओं के भविष्य पर चिंता

जस्टिस नागप्रसन्ना ने आगाह किया कि इस प्रकार की आपराधिक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति देना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे एक युवा छात्र का भविष्य अनावश्यक रूप से संकट में पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि केवल इसलिए आपराधिक कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता कि किसी ने निजी बातचीत में अपने मित्र की तारीफ की हो। यह टिप्पणी उन मामलों में न्यायिक संयम की आवश्यकता को रेखांकित करती है जहाँ कानून का इस्तेमाल व्यक्तिगत दबाव के लिए हो सकता है।

कोर्ट का अंतिम आदेश

हाई कोर्ट ने एफआईआर को पूरी तरह रद्द करते हुए जाँच अधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता से जब्त किए गए सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य सामग्री तत्काल उसे वापस लौटाई जाए। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब डिजिटल संवाद से जुड़े मामलों में कानून की सीमाओं को लेकर देशभर में बहस जारी है।

आगे क्या

इस निर्णय से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि अदालतें डिजिटल माध्यमों पर हुई निजी बातचीत को आपराधिक दायरे में खींचने से पहले संदर्भ और आशय दोनों की गहन जाँच करेंगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में इसी तरह के मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो सवाल उठता है कि क्या कानून की ताकत का इस्तेमाल व्यक्तिगत प्रभाव के लिए हुआ। आईटी अधिनियम की धारा 66ए को सर्वोच्च न्यायालय पहले ही 2015 में श्रेया सिंघल मामले में असंवैधानिक घोषित कर चुका है — फिर भी इसका इस्तेमाल यहाँ हुआ, जो पुलिस की कानूनी जागरूकता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जस्टिस नागप्रसन्ना का यह फैसला युवाओं के अभिव्यक्ति के अधिकार और डिजिटल निजता की रक्षा में एक ज़रूरी हस्तक्षेप है।
RashtraPress
22 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कर्नाटक हाई कोर्ट ने किस आधार पर छात्र की एफआईआर रद्द की?
कोर्ट ने कहा कि इंस्टाग्राम पर निजी बातचीत में 'प्रिटी' और 'ब्यूटीफुल' जैसे शब्दों का प्रयोग स्टॉकिंग, वॉयरिज्म या महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने जैसे अपराधों की परिभाषा में नहीं आता। जस्टिस नागप्रसन्ना ने कहा कि यह 'जेन-जी' पीढ़ी की सामान्य भाषा है और आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
छात्र पर कौन-सी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था?
पुलिस ने छात्र के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66ए के तहत एफआईआर दर्ज की थी। उल्लेखनीय है कि धारा 66ए को सर्वोच्च न्यायालय 2015 में ही असंवैधानिक घोषित कर चुका है।
इस मामले में एफआईआर कैसे दर्ज हुई?
याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ते थे और मित्र थे। इंस्टाग्राम पर भेजे गए निजी संदेश बाद में शिकायतकर्ता के पिता — एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी — को दिखाए गए, जिसके बाद एफआईआर दर्ज की गई।
कोर्ट ने जब्त सामान के बारे में क्या आदेश दिया?
हाई कोर्ट ने जाँच अधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता से जब्त किए गए सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और अन्य सामग्री तत्काल वापस लौटाई जाए।
इस फैसले का व्यापक कानूनी महत्व क्या है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय डिजिटल माध्यमों पर हुई निजी बातचीत को आपराधिक दायरे में लाने से पहले संदर्भ और आशय की जाँच की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह फैसला भविष्य में इसी प्रकार के मामलों में एक महत्वपूर्ण नज़ीर के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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