29 अक्टूबर 2026
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श्रीनगर: हाई कोर्ट के यथास्थिति आदेश के बाद भी कश्मीरी पंडित महिला की 165 कनाल जमीन पर अतिक्रमण का आरोप

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श्रीनगर: हाई कोर्ट के यथास्थिति आदेश के बाद भी कश्मीरी पंडित महिला की 165 कनाल जमीन पर अतिक्रमण का आरोप

सारांश

हाई कोर्ट के यथास्थिति आदेश और जिला मजिस्ट्रेट की कानूनी अभिरक्षा के बावजूद श्रीनगर में एक कश्मीरी पंडित महिला की 165 कनाल जमीन पर कथित अतिक्रमण का मामला सामने आया है — यह उस प्रशासनिक चूक की ओर इशारा करता है जो दशकों से विस्थापित पंडित परिवारों की संपत्तियों को असुरक्षित छोड़ती रही है।

मुख्य बातें

शकुंतला जलाली ने 29 अक्टूबर 2026 को श्रीनगर के सौरा, उमरहीर में अपनी 165 कनाल संपत्ति पर अतिक्रमण का आरोप लगाया।
जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने 7 फरवरी 2024 को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था; मामला रिट याचिका (सिविल) संख्या 1373/2023 के तहत लंबित है।
कथित अतिक्रमण में भूमि के बड़े हिस्से को कंक्रीट ब्लॉक और धातु की बाड़ से घेरा गया।
पटवारी द्वारा जारी भूमि-राजस्व विवरण (इंतखाब) की वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
जम्मू-कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति अधिनियम, 1997 के तहत जिला मजिस्ट्रेट को अनाधिकृत कब्जेदारों को बेदखल करने और बाजार मूल्य के दोगुने तक मुआवजा लगाने का अधिकार है।
जलाली ने श्रीनगर जिला प्रशासन से तत्काल जाँच और अतिक्रमणकारियों व दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई की माँग की है।

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय के यथास्थिति आदेश के बावजूद कश्मीरी पंडित प्रवासी महिला शकुंतला जलाली ने 29 अक्टूबर 2026 को श्रीनगर के सौरा क्षेत्र, उमरहीर स्थित अपनी संपत्ति पर अतिक्रमण का गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि 165 कनाल भूमि के एक बड़े हिस्से को कंक्रीट ब्लॉक और धातु की बाड़ से घेर दिया गया है, जबकि अदालत ने संपत्ति की यथास्थिति बनाए रखने का स्पष्ट निर्देश दिया हुआ है।

मामले की पृष्ठभूमि

शंभू नाथ जलाली की पुत्री और श्रीनगर के हब्बा कदल की मूल निवासी शकुंतला जलाली वर्तमान में जम्मू के मुट्ठी प्रवासी शिविर में रह रही हैं। उनकी संपत्ति में 51 कनाल खुली भूमि सहित कुल 165 कनाल जमीन शामिल है, जो सौरा के उमरहीर इलाके में स्थित है।

यह विवाद जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय में रिट याचिका (सिविल) संख्या 1373, वर्ष 2023 — शीर्षक 'शकुंतला भान बनाम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू एवं कश्मीर एवं अन्य' — के तहत लंबित है।

अदालत और प्रशासन के आदेश

7 फरवरी 2024 को उच्च न्यायालय ने श्रीनगर के उपायुक्त अक्षय लबरू और श्रीनगर नगर निगम आयुक्त बशारत कयूम को संपत्ति पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। इससे पहले 7 जून 2023 को श्रीनगर के उपायुक्त कार्यालय ने तहसीलदार ईदगाह को जम्मू-कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति (संरक्षण, सुरक्षा एवं संकट विक्रय पर रोक) अधिनियम, 1997 के तहत संपत्ति अपने कब्जे में लेने का निर्देश भी दिया था।

संपत्ति को विचाराधीन घोषित करते हुए स्थल पर सुरक्षात्मक बोर्ड भी लगाए गए हैं, जो इसे जिला मजिस्ट्रेट की अभिरक्षा में बताते हैं। इन सभी उपायों के बावजूद कथित अतिक्रमण की घटना सामने आई है।

राजस्व रिकॉर्ड पर सवाल

शकुंतला जलाली ने संबंधित पटवारी द्वारा भूमि पर अधिकार का दावा करने वाले व्यक्तियों के पक्ष में जारी किए गए भूमि-राजस्व विवरण (इंतखाब) पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। संबंधित वार्ड अधिकारी ने पुष्टि की कि कंक्रीट ब्लॉक लगाने वाले व्यक्ति ने पटवारी द्वारा जारी भूमि-राजस्व विवरण प्रस्तुत किया था।

जलाली ने श्रीनगर जिला प्रशासन से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि अदालत के आदेश और अभिरक्षा प्रावधानों के बावजूद राजस्व कर कैसे जारी किया गया।

कानूनी ढाँचा: 1997 का संरक्षण अधिनियम

जम्मू-कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति (संरक्षण, सुरक्षा एवं संकट विक्रय पर रोक) अधिनियम, 1997 उन विस्थापित व्यक्तियों और कश्मीरी पंडितों की संपत्तियों की रक्षा करता है, जिन्होंने 1 नवंबर 1989 के बाद कश्मीर घाटी छोड़ी। इस कानून के अंतर्गत जिला मजिस्ट्रेट अनाधिकृत कब्जेदारों को बेदखल कर सकते हैं और कब्जाधारियों पर बाजार मूल्य के कम से कम दोगुने के बराबर मुआवजा या किराया लगाया जा सकता है।

सक्षम प्राधिकारी (मंडल आयुक्त) की स्पष्ट पूर्व लिखित अनुमति के बिना प्रवासी संपत्ति की कोई भी बिक्री, उपहार, विनिमय या गिरवी अमान्य है और ऐसे किसी दस्तावेज का पंजीकरण नहीं किया जा सकता।

जलाली की माँग और आगे की राह

शकुंतला जलाली ने श्रीनगर जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है — अतिक्रमणकारियों को हटाने, राजस्व रिकॉर्ड की जाँच करने और दोषी पाए जाने वाले किसी भी अधिकारी के विरुद्ध उचित कार्रवाई करने का आग्रह किया है। गौरतलब है कि यह मामला उस बड़ी समस्या की एक कड़ी है, जिसमें दशकों बाद भी हजारों कश्मीरी पंडित प्रवासी अपनी संपत्तियों की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यदि जिला प्रशासन ने शीघ्र कदम नहीं उठाए, तो यह मामला उच्च न्यायालय में अवमानना कार्यवाही का रूप ले सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन ज़मीन पर खोखला साबित होता है। 1997 का संरक्षण अधिनियम और अदालती आदेश दोनों मौजूद हैं, फिर भी कथित तौर पर पटवारी स्तर पर ऐसे राजस्व दस्तावेज़ जारी हो जाते हैं जो अतिक्रमण को वैधता का आवरण दे देते हैं। असली सवाल यह है कि जब संपत्ति जिला मजिस्ट्रेट की कानूनी अभिरक्षा में थी, तब राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव कैसे संभव हुआ — और किसकी मिलीभगत से। जब तक राजस्व तंत्र और संपत्ति संरक्षण कानून के बीच की इस खाई को नहीं पाटा जाता, तब तक हजारों कश्मीरी पंडित परिवारों की संपत्तियाँ कागजी सुरक्षा के भरोसे ही रहेंगी।
RashtraPress
29 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शकुंतला जलाली का संपत्ति विवाद क्या है?
शकुंतला जलाली एक कश्मीरी पंडित प्रवासी महिला हैं, जिनकी श्रीनगर के सौरा, उमरहीर में 165 कनाल भूमि है। उनका आरोप है कि जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय के यथास्थिति आदेश और जिला मजिस्ट्रेट की कानूनी अभिरक्षा के बावजूद इस भूमि के एक बड़े हिस्से को कंक्रीट ब्लॉक और धातु की बाड़ से घेर दिया गया है।
उच्च न्यायालय का यथास्थिति आदेश कब जारी हुआ और इसमें क्या था?
7 फरवरी 2024 को उच्च न्यायालय ने श्रीनगर के उपायुक्त अक्षय लबरू और नगर निगम आयुक्त बशारत कयूम को संपत्ति पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। यह मामला रिट याचिका (सिविल) संख्या 1373, वर्ष 2023 के तहत अभी भी उच्च न्यायालय में लंबित है।
जम्मू-कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति अधिनियम 1997 क्या सुरक्षा देता है?
यह अधिनियम 1 नवंबर 1989 के बाद कश्मीर घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी पंडितों और अन्य विस्थापित व्यक्तियों की संपत्तियों की रक्षा करता है। इसके तहत बिना सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति के संपत्ति की बिक्री, उपहार या गिरवी अमान्य है, और जिला मजिस्ट्रेट अनाधिकृत कब्जेदारों को बेदखल करते हुए बाजार मूल्य के दोगुने तक मुआवजा लगा सकते हैं।
इंतखाब (भूमि-राजस्व विवरण) विवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
शकुंतला जलाली ने आरोप लगाया है कि पटवारी ने उन व्यक्तियों के पक्ष में इंतखाब जारी किया जो इस भूमि पर अधिकार का दावा कर रहे हैं। यह संदिग्ध है क्योंकि संपत्ति जिला मजिस्ट्रेट की कानूनी अभिरक्षा में दर्ज है; वार्ड अधिकारी ने स्वीकार किया कि अतिक्रमणकारी ने यही दस्तावेज़ प्रस्तुत किया था।
जलाली ने प्रशासन से क्या माँगें की हैं?
जलाली ने श्रीनगर जिला प्रशासन से तीन माँगें की हैं: अतिक्रमण की तत्काल जाँच, यह स्पष्ट करना कि अदालत के आदेश के बावजूद राजस्व कर कैसे जारी हुए, और अतिक्रमणकारियों तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध उचित कानूनी कार्रवाई।
राष्ट्र प्रेस
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