सुंबली मावस उत्सव: 36 साल बाद कश्मीरी पंडित बांदीपोरा लौटे, आँसुओं से हुआ पुनर्मिलन
सारांश
मुख्य बातें
बांदीपोरा, जम्मू-कश्मीर — 36 वर्षों के लंबे विस्थापन के बाद, 17 मई 2026 को रविवार के दिन बड़ी संख्या में विस्थापित कश्मीरी पंडित बांदीपोरा जिले के सुंबल इलाके में स्थित ऐतिहासिक नंद किशोर मंदिर पहुँचे। यह आगमन 'सुंबली मावस' उत्सव के उपलक्ष्य में हुआ, जो कश्मीरी पंडित संत महाराज नंद किशोर की जयंती पर तीन दिनों तक मनाया जाता है। देश के विभिन्न कोनों से आए विस्थापित पंडित परिवार इस भावनात्मक पुनर्मिलन के साक्षी बने।
भावुक पुनर्मिलन: जब दीवारें ढह गईं
सुंबल इलाका रविवार को एक अत्यंत मार्मिक दृश्य का गवाह बना। जब विस्थापित कश्मीरी पंडित अपने पुराने पड़ोसियों से मिले, तो धर्म और राजनीति की सारी सीमाएँ जैसे मिट गईं। मुस्लिम और पंडित, दोनों ही एक-दूसरे से मिलकर रो पड़े — यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि दशकों की दूरी इंसानी रिश्तों की गर्माहट को पूरी तरह नहीं मिटा सकती।
सुंबल इलाके को विस्थापित पंडितों के लिए अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने का एक दुर्लभ अवसर माना जा रहा है। कई परिवारों के लिए यह पहली बार था जब वे तीन दशकों से भी अधिक समय बाद अपनी पुश्तैनी ज़मीन के पास खड़े हुए।
खोई हुई जमीन और बदला हुआ परिदृश्य
कई जाने-माने कश्मीरी पंडित परिवारों की सुंबल इलाके में अपनी ज़मीनें थीं, जिनमें से अधिकांश पर सेब के बाग लहलहाते थे। समय के साथ, उन विशाल भूखंडों पर अब मकान और दुकानें खड़ी हो गई हैं। अधिकतर कश्मीरी पंडित परिवारों को अपनी पुश्तैनी संपत्ति मजबूरी में बेचनी पड़ी, जबकि कई मामलों में — कथित तौर पर — घाटी में हिंसा के दौरान इन ज़मीनों पर अवैध कब्ज़ा कर लिया गया था।
1990 का विस्थापन: एक अधूरा अध्याय
1990 के दशक की शुरुआत में, जब घाटी में पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद का साया गहराया, तब कश्मीरी पंडित समुदाय को अपना घर-बार छोड़कर पलायन करने पर विवश होना पड़ा। घर, ज़मीन और पीढ़ियों से संजोई संपत्तियाँ पीछे छोड़कर वे जम्मू और देश के अन्य हिस्सों में शरण लेने को मजबूर हुए। जबरदस्ती विस्थापन के वे गहरे ज़ख्म आज भी बुजुर्गों के दिलों में ताज़ा हैं। उनमें से अधिकांश आज तक वापस नहीं लौट पाए।
प्रशासन की तैयारी और सुरक्षा व्यवस्था
इस उत्सव को शांतिपूर्ण और सुव्यवस्थित ढंग से संपन्न कराने के लिए प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए। बांदीपोरा की डिप्टी कमिश्नर इंदु कंवल चिब ने स्वयं मंदिर का दौरा किया और विशेष प्रार्थनाओं में भाग लिया। बांदीपोरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने उत्सव शुरू होने से पूर्व सुरक्षा व्यवस्था का स्थलीय निरीक्षण किया।
आगे की राह
यह तीन दिवसीय उत्सव कश्मीरी पंडित समुदाय और घाटी के स्थानीय निवासियों के बीच सांस्कृतिक और भावनात्मक सेतु बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आयोजन विस्थापित समुदाय की घर वापसी और पुनर्वास की दीर्घकालिक प्रक्रिया में सहायक हो सकते हैं।