केरल मुख्य सचिव ए. जयतिलक की विदाई के दिन IAS अधिकारी एन. प्रशांत की सोशल मीडिया पोस्ट से नौकरशाही में हलचल
सारांश
मुख्य बातें
केरल के मुख्य सचिव ए. जयतिलक के 30 जून 2026 को तीन दशक से अधिक लंबे प्रशासनिक करियर के बाद सेवानिवृत्त होने के दिन ही वरिष्ठ IAS अधिकारी एन. प्रशांत ने सोशल मीडिया पर एक तीखी पोस्ट साझा कर तिरुवनंतपुरम के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। विदाई समारोह से महज कुछ घंटे पहले किया गया यह पोस्ट पूरे दिन चर्चा का केंद्र बना रहा।
पोस्ट का समय और संदर्भ
एन. प्रशांत ने अपनी पोस्ट में ए. जयतिलक का नाम कहीं नहीं लिया, लेकिन उनकी तस्वीर के साथ 'धर्मो रक्षति रक्षितः' शीर्षक से एक विस्तृत लेख साझा किया। पोस्ट का समय — सचिवालय के दरबार हॉल में आयोजित विदाई समारोह से ठीक पहले — और संलग्न तस्वीर के कारण नौकरशाही से जुड़े लोगों ने इसे सेवानिवृत्त हो रहे मुख्य सचिव पर सीधा निशाना माना।
विडंबना यह रही कि जब मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन की उपस्थिति में ए. जयतिलक को औपचारिक विदाई दी जा रही थी, उसी समय एन. प्रशांत की यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल रही थी।
पोस्ट में क्या कहा गया
लेख में प्रशांत ने लिखा कि सत्ता और पद हमेशा स्थायी नहीं होते। उनके अनुसार, लंबे समय तक ऊँचे पदों पर रहने वाले अधिकारी अक्सर इस भ्रम में आ जाते हैं कि उनका प्रभाव कभी समाप्त नहीं होगा, लेकिन समय अंततः सब कुछ बदल देता है।
पोस्ट में पूंथानम की 'ज्ञानप्पाना', 'भगवद्गीता' और 'द गॉस्पेल ऑफ मैथ्यू' का उल्लेख करते हुए शक्तिशाली अधिकारियों के इर्द-गिर्द बन जाने वाली चाटुकारिता की संस्कृति पर कड़ा प्रहार किया गया। लेख में कहा गया कि विदाई समारोहों में कई बार अधिकारियों के वास्तविक कार्यकाल को छिपाकर उनके अहंकार को प्रशासनिक दृढ़ता और गलतियों को दक्षता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
सबसे चर्चित अंश में मैथ्यू 23:27 का हवाला देते हुए पाखंडियों की तुलना 'सफेद पुती हुई कब्रों' से की गई — जो बाहर से सुंदर दिखती हैं, लेकिन भीतर सड़न छिपाए रहती हैं। लेख में यह भी कहा गया कि आने वाली पीढ़ियाँ डर को सम्मान, चुप्पी को सहमति और सजा न मिलने को बेगुनाही न समझें।
दोनों अधिकारियों के बीच पुराना विवाद
यह पोस्ट दोनों IAS अधिकारियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद का नया अध्याय माना जा रहा है। पिछली सरकार के कार्यकाल में भी एन. प्रशांत ने सोशल मीडिया के माध्यम से नौकरशाही के कुछ वर्गों पर आरोप लगाए थे, जिसके बाद उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई थी।
तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली सरकार में प्रशांत को लंबे समय तक निलंबित रहना पड़ा था। नई सरकार के सत्ता में आने के बाद इसी महीने उनकी सेवा में बहाली हुई है।
प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल
लेख में यह भी रेखांकित किया गया कि व्यक्तिगत क्षमा का अर्थ यह नहीं है कि कानून के उल्लंघन पर कानूनी जवाबदेही समाप्त हो जाए। यह टिप्पणी नौकरशाही में पारदर्शिता और जवाबदेही की बहस को नए सिरे से उठाती है।
गौरतलब है कि एन. प्रशांत की सेवा बहाली और इस पोस्ट का समय एक साथ आना केरल की प्रशासनिक राजनीति में नई परतें जोड़ता है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि सरकार और नौकरशाही इस विवाद पर क्या रुख अपनाती है।