शिवराज सिंह चौहान: किसान सशक्त होगा तभी बनेगा विकसित और आत्मनिर्भर भारत 2047
सारांश
मुख्य बातें
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 27 अगस्त 2026 को स्पष्ट कहा कि विकसित भारत 2047 की राह गाँवों और खेत-खलिहानों से होकर गुज़रती है। नई दिल्ली के होटल ली मेरिडियन में आयोजित 21वें ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी समिट के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आय, सम्मान और सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनाना संभव नहीं है।
सम्मेलन का संदर्भ और उपस्थित प्रतिनिधि
इस सत्र का विषय था — 'रूरल प्रॉस्पेरिटी फॉर विकसित भारत : एडवांसिंग सस्टेनेबल एग्रीकल्चर एंड इन्क्लूसिव ग्रोथ', और समग्र सम्मेलन की थीम थी — 'एक्सेलरेटिंग द सस्टेनेबिलिटी ट्रांजिशन : स्पीड, स्केल, सिस्टम्स।' सत्र में सीआईआई (CII) के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी और आईटीसी लिमिटेड के चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक तथा सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष संजीव पुरी सहित उद्योग जगत के प्रमुख प्रतिनिधि उपस्थित रहे। जलवायु-स्मार्ट खेती, हरित आजीविका, समावेशी ग्रामीण बुनियादी ढाँचे और किसान भागीदारी पर केंद्रित चर्चा हुई।
सतत कृषि और खाद्य सुरक्षा पर मंत्री का आह्वान
चौहान ने कहा कि सतत कृषि को केवल पर्यावरणीय मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए — यह आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय, खाद्य सुरक्षा, किसान कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि भारत अपनी खाद्य ज़रूरतों के लिए किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रह सकता। देश के किसानों और वैज्ञानिकों के प्रयासों से खाद्यान्न उत्पादन में उल्लेखनीय आत्मनिर्भरता हासिल हुई है, लेकिन बदलते जलवायु संकट के बीच उत्पादन और संसाधन-सुरक्षा दोनों पर समान ध्यान देना ज़रूरी है।
उन्होंने भारतीय जीवन-दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि पेड़, नदियाँ, पर्वत, फसलें और मिट्टी पूजनीय रहे हैं। उनके शब्दों में — 'पेड़ से फल लेना दोहन है, लेकिन पेड़ को काट देना शोषण है।' सरकार का लक्ष्य संतुलित दोहन की दिशा में आगे बढ़ना है, न कि अंधाधुंध शोषण।
मृदा स्वास्थ्य और जल संरक्षण की प्राथमिकता
मंत्री चौहान ने मिट्टी की सेहत को कृषि का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के असंतुलित उपयोग से भूमि की उर्वरता प्रभावित हो रही है। इसके समाधान के रूप में उन्होंने मृदा स्वास्थ्य कार्ड, जैविक खाद, हरी खाद, फसल अवशेष प्रबंधन और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर ज़ोर दिया। स्वस्थ मिट्टी से उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ेगी, खेती की लागत घटेगी और किसानों की आय में सुधार होगा।
जल संरक्षण पर बोलते हुए चौहान ने कहा कि आने वाले समय में पानी की उपलब्धता कृषि के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है। खेत-तालाब, सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों के ज़रिए पानी के हर बूँद का बेहतर उपयोग करना होगा।
एकीकृत खेती और फसल विविधीकरण का संदेश
चौहान ने किसानों से एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत खेती अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अनाज के साथ दलहन, तिलहन, सब्जियाँ, फल, पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और कृषि वानिकी को जोड़ा जा सकता है। दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन बढ़ाने में सहायक हैं, जिससे उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है। एकीकृत खेती विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए उपयोगी है, क्योंकि सीमित भूमि से भी विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से अधिक आय प्राप्त की जा सकती है।
जलवायु-स्मार्ट कृषि और तकनीक की भूमिका
कृषि मंत्री ने कहा कि मौसम में तेज़ी से हो रहे बदलावों का सीधा असर खेती पर पड़ रहा है। देश के जिलों के लिए जलवायु जोखिम आकलन के आधार पर कृषि सलाह और कार्ययोजनाएँ तैयार की जा रही हैं। उन्होंने मौसम पूर्वानुमान, ड्रोन, उपग्रह आधारित निगरानी, सेंसर, डिजिटल सलाह और आधुनिक सिंचाई तकनीकों को जलवायु-स्मार्ट कृषि का अनिवार्य हिस्सा बताया। इन सुविधाओं को किसानों तक सरल भाषा और कम लागत में पहुँचाना सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योग की साझा जिम्मेदारी है। यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबाव और घटते भूजल स्तर की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है।