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किशाऊ बांध परियोजना: हिमाचल को मिलेगी सालाना 100 करोड़ यूनिट बिजली, 8 साल पुराना वित्तीय विवाद सुलझा

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किशाऊ बांध परियोजना: हिमाचल को मिलेगी सालाना 100 करोड़ यूनिट बिजली, 8 साल पुराना वित्तीय विवाद सुलझा

सारांश

आठ साल से अटकी किशाऊ बांध परियोजना का वित्तीय पेच अब सुलझ गया है। अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में तय हुआ कि दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा हिमाचल के विद्युत घटक की ₹2,000 करोड़ की लागत उठाएँगे। इससे हिमाचल को सालाना 100 करोड़ यूनिट बिजली और ₹600 करोड़ की आमदनी मिलेगी।

मुख्य बातें

किशाऊ बहु उद्देशीय बांध परियोजना से जुड़ा 8 वर्ष पुराना वित्तीय विवाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुई बैठक में सुलझा।
परियोजना की अनुमानित लागत ₹15,000 करोड़ ; क्षमता 422 मेगावाट ; स्थान — टौंस नदी पर हिमाचल-उत्तराखंड सीमा।
दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा हिमाचल के विद्युत घटक की अनुमानित ₹2,000 करोड़ की लागत वहन करेंगे।
हिमाचल को परियोजना पूर्ण होने पर प्रतिवर्ष 100 करोड़ यूनिट बिजली मिलेगी, जिसकी कीमत लगभग ₹600 करोड़ सालाना आँकी गई है।
पूर्ववर्ती सरकार ने हिमाचल के हिस्से के रूप में ₹800 करोड़ देने पर सहमति दी थी, जिसे वर्तमान सरकार ने अस्वीकार किया।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 16 जून 2025 को घोषणा की कि किशाऊ बहु उद्देशीय बांध परियोजना से जुड़ा आठ वर्ष पुराना वित्तीय विवाद अब सुलझ गया है, जिससे ₹15,000 करोड़ की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में यह सफलता मिली। परियोजना के पूर्ण होने पर हिमाचल प्रदेश को प्रतिवर्ष 100 करोड़ यूनिट बिजली प्राप्त होगी, जिसकी अनुमानित बाज़ार कीमत लगभग ₹600 करोड़ सालाना आँकी गई है।

परियोजना की मुख्य विशेषताएँ

422 मेगावाट क्षमता वाली किशाऊ बांध परियोजना टौंस नदी पर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर प्रस्तावित है। यह एक बहु उद्देशीय परियोजना है, जिसमें विद्युत उत्पादन के साथ-साथ जल आपूर्ति का घटक भी शामिल है। वर्षों से परियोजना के वित्तीय ढाँचे और लागत वहन को लेकर संबंधित राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी, जिसके कारण निर्माण कार्य अवरुद्ध था।

वित्तीय विवाद और समाधान

बैठक में भारत सरकार ने सैद्धांतिक रूप से सहमति जताई कि परियोजना के जल घटक से लाभान्वित होने वाले राज्य — दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा — हिमाचल प्रदेश के हिस्से के विद्युत घटक पर आने वाली अनुमानित ₹2,000 करोड़ की लागत वहन करेंगे। मुख्यमंत्री सुक्खू ने बताया कि पूर्ववर्ती राज्य सरकार ने परियोजना में हिमाचल के हिस्से के रूप में ₹800 करोड़ देने पर सहमति जताई थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने प्रदेश के सीमित संसाधनों को देखते हुए इस शर्त को अस्वीकार कर दिया।

हिमाचल की दलील और केंद्र की स्वीकृति

मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि जब परियोजना के जल घटक के लिए केंद्र सरकार 90 प्रतिशत अनुदान उपलब्ध करा रही है, तो विद्युत घटक के लिए भी समान सहायता मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि परियोजना से सर्वाधिक विस्थापन और भौगोलिक प्रभाव हिमाचल प्रदेश पर पड़ेगा, इसलिए राज्य पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना अनुचित होता। राज्य सरकार की इस दलील को केंद्र ने स्वीकार किया, जिसे सुक्खू ने बिजली परियोजनाओं में हिमाचल के अधिकारों की लड़ाई में बड़ी जीत बताया।

राज्य की अर्थव्यवस्था पर असर

परियोजना के पूरा होने के बाद हिमाचल प्रदेश को विद्युत घटक के रूप में प्रतिवर्ष 100 करोड़ यूनिट बिजली मिलेगी। इसकी अनुमानित कीमत लगभग ₹600 करोड़ सालाना होगी, जिससे राज्य की राजस्व आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब हिमाचल प्रदेश वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है और जलविद्युत क्षेत्र राज्य की आय का एक प्रमुख स्रोत है।

आगे क्या होगा

सैद्धांतिक सहमति बन जाने के बाद अब परियोजना के औपचारिक अनुमोदन और निर्माण की प्रक्रिया शुरू होने की उम्मीद है। हिमाचल प्रदेश सरकार के अनुसार, यह निर्णय राज्य के जलविद्युत अधिकारों और लंबित वित्तीय दावों की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन 'सैद्धांतिक सहमति' और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच की खाई को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता — यह परियोजना दशकों से इसी खाई में अटकी रही है। दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा द्वारा ₹2,000 करोड़ वहन करने की बात अभी औपचारिक अंतर-राज्यीय समझौते में नहीं बदली है, और इन राज्यों की सहमति की पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है। इसके अलावा, परियोजना से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले विस्थापितों के पुनर्वास और पर्यावरणीय मंज़ूरियों का मुद्दा अभी भी अनुत्तरित है। जब तक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर नहीं होते और निर्माण की समयसीमा तय नहीं होती, यह घोषणा उन कई 'ऐतिहासिक' बैठकों की कतार में खड़ी है जो किशाऊ को आगे नहीं बढ़ा सकीं।
RashtraPress
2 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

किशाऊ बांध परियोजना क्या है और यह कहाँ बनेगी?
किशाऊ बहु उद्देशीय बांध परियोजना एक 422 मेगावाट क्षमता की जलविद्युत एवं जल आपूर्ति परियोजना है, जो टौंस नदी पर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर प्रस्तावित है। इसकी अनुमानित लागत ₹15,000 करोड़ है।
किशाऊ परियोजना का वित्तीय विवाद क्या था और कैसे सुलझा?
पिछले आठ वर्षों से परियोजना के विद्युत घटक की लागत वहन को लेकर राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। 16 जून 2025 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में तय हुआ कि जल घटक से लाभान्वित राज्य — दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा — हिमाचल के विद्युत घटक की अनुमानित ₹2,000 करोड़ की लागत वहन करेंगे।
हिमाचल प्रदेश को किशाऊ परियोजना से क्या फायदा होगा?
परियोजना पूर्ण होने के बाद हिमाचल प्रदेश को प्रतिवर्ष 100 करोड़ यूनिट बिजली मिलेगी, जिसकी अनुमानित बाज़ार कीमत लगभग ₹600 करोड़ सालाना है। इससे राज्य की राजस्व आय में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।
पूर्ववर्ती सरकार की तुलना में वर्तमान सरकार का रुख क्या अलग रहा?
पूर्ववर्ती हिमाचल सरकार ने परियोजना में राज्य के हिस्से के रूप में ₹800 करोड़ देने पर सहमति जताई थी। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार ने प्रदेश के सीमित संसाधनों का हवाला देते हुए यह शर्त अस्वीकार की और केंद्र से समान अनुदान नीति की माँग की।
क्या किशाऊ परियोजना का निर्माण अब शुरू हो जाएगा?
केंद्र सरकार की सैद्धांतिक सहमति मिलने के बाद निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ है, लेकिन औपचारिक अनुमोदन और संबंधित राज्यों के बीच लिखित समझौते अभी बाकी हैं। परियोजना की समयसीमा और क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा आने वाले समय में स्पष्ट होगी।
राष्ट्र प्रेस
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