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कोलकाता पुलिस बनाएगी 'ट्रायल मॉनिटरिंग ऐप', 360 पुराने आपराधिक मामलों की होगी डिजिटल निगरानी

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कोलकाता पुलिस बनाएगी 'ट्रायल मॉनिटरिंग ऐप', 360 पुराने आपराधिक मामलों की होगी डिजिटल निगरानी

सारांश

कोलकाता पुलिस ने वर्षों से खिंच रहे 360 आपराधिक मामलों की निगरानी के लिए 'ट्रायल मॉनिटरिंग ऐप' बनाने का फैसला किया है। लालबाजार में सेल गठित, 2010 के पार्क स्ट्रीट अग्निकांड और 2011 के 89 मौतों वाले अस्पताल हादसे जैसे केस भी सूची में शामिल।

मुख्य बातें

कोलकाता पुलिस पुराने लंबित मुकदमों के लिए 'ट्रायल मॉनिटरिंग ऐप' विकसित कर रही है।
शुरुआती चरण में 360 पुराने विचाराधीन मामलों को ऐप के ज़रिए मॉनिटर किया जाएगा।
लालबाजार के इंटेलिजेंस विभाग में 'ट्रायल मॉनिटरिंग सेल' का गठन किया जा चुका है।
सूची में 2010 का पार्क स्ट्रीट आग हादसा और 2011 में धाकुरिया अस्पताल अग्निकांड (जिसमें 89 मरीजों की मौत हुई) शामिल हैं।
देरी के कारणों में जांच अधिकारियों का तबादला/सेवानिवृत्ति , गवाहों की अनुपस्थिति और आरोपियों का अदालत न आना शामिल हैं।
ऐप पर गवाहों की स्थिति, आरोपियों की हिरासत/जमानत और अगली सुनवाई की तारीख तत्काल देखी जा सकेगी।

कोलकाता पुलिस ने वर्षों से लंबित आपराधिक मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए एक विशेष 'ट्रायल मॉनिटरिंग ऐप' विकसित करने की योजना बनाई है, जिसके ज़रिए शुरुआती चरण में 360 पुराने विचाराधीन मामलों की डिजिटल निगरानी की जाएगी। 28 जुलाई को पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि यह पहल न्याय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।

ट्रायल मॉनिटरिंग सेल का गठन

इस डिजिटल पहल की नींव के रूप में कोलकाता पुलिस मुख्यालय लालबाजार के इंटेलिजेंस विभाग में 'ट्रायल मॉनिटरिंग सेल' का गठन पहले ही किया जा चुका है। यह सेल फिलहाल धीमी गति से चल रहे मामलों की समीक्षा कर रहा है और जांच अधिकारियों तथा सरकारी वकीलों के साथ बैठकें कर देरी के कारणों की पहचान कर रहा है।

अधिकारियों के अनुसार, इस सेल ने उन मामलों को चिह्नित किया है जिनमें सुनवाई असामान्य रूप से धीमी रही है। इनमें कुछ ऐसे मामले भी शामिल हैं जो पहले पश्चिम बंगाल पुलिस के अधीन थे, लेकिन अदालत के निर्देश पर उनकी जिम्मेदारी कोलकाता पुलिस को सौंपी गई।

मुख्य घटनाक्रम और चयनित मामले

चयनित 360 मामलों में कुछ अत्यंत संवेदनशील और चर्चित केस भी शामिल हैं। इनमें वर्ष 2010 का पार्क स्ट्रीट आग हादसा और वर्ष 2011 में धाकुरिया के एक निजी अस्पताल में आग लगने से 89 मरीजों की मौत का मामला प्रमुख रूप से शामिल है। शहर के विभिन्न थानों से जुड़े अन्य गंभीर मामले भी इस सूची में हैं।

गौरतलब है कि इनमें से कई मामले एक दशक से अधिक समय से अदालतों में विचाराधीन हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति को रेखांकित करते हैं।

देरी के प्रमुख कारण

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मुकदमों में देरी के पीछे कई कारण सामने आए हैं। इनमें जांच अधिकारियों का सेवानिवृत्त होना या तबादला होना, गवाहों का समय पर अदालत में उपस्थित न होना और आरोपियों की अनुपस्थिति प्रमुख हैं।

इसके अलावा कई मामलों में मुकदमे की शुरुआत से पहले आरोप तय करने की प्रक्रिया भी लंबित है, क्योंकि सभी आरोपी एक साथ अदालत में उपस्थित नहीं हो पाते। इन बाधाओं के चलते कई पुराने मामले वर्षों तक खिंचते रहे हैं।

ऐप में क्या होगा उपलब्ध

लालबाजार सूत्रों के अनुसार, प्रस्तावित ऐप में प्रत्येक लंबित मामले की विस्तृत जानकारी दर्ज होगी। पुलिस अधिकारियों, जांच अधिकारियों, ट्रायल मॉनिटरिंग सेल के सदस्यों, सरकारी वकीलों और संबंधित अधिकारियों को यह सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।

ऐप पर किसी भी केस की स्थिति तत्काल देखी जा सकेगी — जिसमें यह जानकारी होगी कि कितने गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं, कितने शेष हैं, कितने आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं और कितने जमानत पर हैं। अब तक हुई सुनवाई और अगली तारीख का विवरण भी ऐप पर उपलब्ध रहेगा।

आगे क्या होगा

पुलिस का कहना है कि इस डिजिटल पहल का उद्देश्य केवल मामलों की निगरानी नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया को गति देना और अपराधियों को जल्द से जल्द कानून के दायरे में लाना है। ऐप के लागू होने के बाद पुराने मामलों के निपटारे की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होने की उम्मीद जताई जा रही है। यह पहल ऐसे समय में आई है जब देशभर में न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि ऐप बनाने से अदालती प्रक्रिया की संरचनात्मक खामियाँ कैसे दूर होंगी — गवाहों की सुरक्षा, सरकारी वकीलों की कमी और न्यायाधीशों पर बोझ जैसी समस्याएँ किसी ट्रैकिंग टूल से नहीं सुलझतीं। 2011 के धाकुरिया अस्पताल अग्निकांड में 89 मौतें हुईं और डेढ़ दशक बाद भी मामला अधूरा है — यह निगरानी की नहीं, जवाबदेही की विफलता है। ऐप एक उपकरण है, समाधान नहीं; जब तक सरकारी अभियोजन तंत्र को मज़बूत नहीं किया जाता, डिजिटल डैशबोर्ड केवल देरी को दृश्यमान बनाएगा, समाप्त नहीं।
RashtraPress
29 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कोलकाता पुलिस का 'ट्रायल मॉनिटरिंग ऐप' क्या है?
यह एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है जिसे कोलकाता पुलिस पुराने लंबित आपराधिक मामलों की सुनवाई की प्रगति ट्रैक करने के लिए विकसित कर रही है। शुरुआती चरण में 360 विचाराधीन मामलों को इस ऐप के ज़रिए मॉनिटर किया जाएगा।
इस ऐप में कौन-सी जानकारी उपलब्ध होगी?
ऐप पर किसी भी मामले में गवाहों के बयान की स्थिति, आरोपियों की न्यायिक हिरासत या जमानत की जानकारी, अब तक हुई सुनवाई और अगली तारीख का विवरण तत्काल देखा जा सकेगा। पुलिस अधिकारी, जांच अधिकारी, सरकारी वकील और ट्रायल मॉनिटरिंग सेल के सदस्य इसे उपयोग कर सकेंगे।
मुकदमों में देरी के क्या कारण हैं?
पुलिस के अनुसार, जांच अधिकारियों का सेवानिवृत्त होना या तबादला, गवाहों का समय पर अदालत में उपस्थित न होना और आरोपियों की अनुपस्थिति प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा कई मामलों में सभी आरोपी एक साथ उपस्थित न होने के कारण आरोप तय करने की प्रक्रिया भी लंबित रहती है।
इस सूची में कौन-से प्रमुख मामले शामिल हैं?
सूची में वर्ष 2010 का पार्क स्ट्रीट आग हादसा और वर्ष 2011 में धाकुरिया के एक निजी अस्पताल में आग लगने से 89 मरीजों की मौत का मामला शामिल है। इसके अलावा शहर के विभिन्न थानों से जुड़े कई अन्य गंभीर मामले भी इस सूची में हैं।
ट्रायल मॉनिटरिंग सेल क्या है और यह कहाँ स्थित है?
ट्रायल मॉनिटरिंग सेल कोलकाता पुलिस मुख्यालय लालबाजार के इंटेलिजेंस विभाग में गठित एक विशेष इकाई है। यह सेल धीमी गति से चल रहे मामलों की समीक्षा करती है और जांच अधिकारियों व सरकारी वकीलों के साथ मिलकर देरी के कारणों का समाधान खोजती है।
राष्ट्र प्रेस
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