कुल्लू के चनसारी स्कूल की इमारत: ₹1.18 करोड़ का टेंडर, 7 साल बाद भी निर्माण अधूरा, 100+ छात्र प्रभावित
सारांश
मुख्य बातें
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की खराहल घाटी स्थित चनसारी सरकारी हाई स्कूल की नई इमारत का निर्माण 2019 में शुरू होने के बावजूद सात वर्षों बाद भी अधूरा पड़ा है। ₹1.18 करोड़ के टेंडर पर शुरू हुए इस निर्माण कार्य की अनदेखी के चलते 100 से अधिक छात्रों की पढ़ाई बाधित हो रही है और तीन पंचायतों के बच्चे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
मुख्य घटनाक्रम
चनसारी स्कूल की पुरानी इमारत बारिश और प्राकृतिक आपदा की चपेट में आकर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। इसके बाद स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (एसएमसी) ने एक निजी भवन में कक्षाएँ चलाने की अस्थायी व्यवस्था की, किंतु वह अनुबंध भी अब समाप्त हो चुका है। वर्तमान स्थिति यह है कि एक ही कमरे में दो से तीन कक्षाएँ एक साथ संचालित की जा रही हैं।
निर्माण में देरी का एक और बड़ा परिणाम यह सामने आया है कि परियोजना की लागत मूल अनुमान की तुलना में कहीं अधिक बढ़ चुकी है। बांदल पंचायत, स्यूगी पंचायत और चनसारी पंचायत के तीन गाँवों के छात्र इस स्कूल पर निर्भर हैं।
एसएमसी और ग्रामीणों की आवाज़
स्कूल मैनेजमेंट कमेटी के अध्यक्ष देवेंद्र शर्मा ने बताया कि स्कूल भवन निर्माण का टेंडर लगभग ₹1.18 करोड़ में दिया गया था, फिर भी इतने वर्षों बाद काम अधूरा पड़ा है। उन्होंने चेतावनी दी, "अगर शिक्षा विभाग ने तुरंत कोई कदम नहीं उठाया, तो आने वाले समय में कक्षाएँ चलाना मुश्किल हो जाएगा।"
एसएमसी और ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में कुल्लू के डिप्टी कमिश्नर से मुलाकात कर निर्माण कार्य शीघ्र पूरा करने की माँग रखी। माता-पिता और स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकला।
शिक्षकों की स्थिति
स्कूल शिक्षक भल चंद शास्त्री ने बताया कि पुरानी इमारत कई वर्षों से जर्जर हालत में है और नई इमारत का निर्माण भी लंबे अरसे से ठप पड़ा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार इस शिकायत पर संज्ञान लेगी और बच्चों को पढ़ाई के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएँ जल्द उपलब्ध कराएगी।
आम जनता पर असर
एक ही कमरे में एकसाथ दो-तीन कक्षाओं का संचालन छात्रों की शैक्षणिक गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। यह ऐसे समय में आया है जब हिमाचल प्रदेश सरकार शिक्षा क्षेत्र में सुधार के दावे करती रही है। गौरतलब है कि पहाड़ी और दूरदराज़ के क्षेत्रों में सरकारी स्कूल भवनों की जर्जर स्थिति कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन सात वर्षों तक निर्माण का अधूरा रहना प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाता है।
क्या होगा आगे
फिलहाल, डिप्टी कमिश्नर से मुलाकात के बाद प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक समयसीमा घोषित नहीं की गई है। स्थानीय समुदाय और एसएमसी शिक्षा विभाग से त्वरित हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में है, ताकि आगामी शैक्षणिक सत्र में बच्चों को उचित कक्षाएँ मिल सकें।