लखपति दीदी योजना: नीमच की ग्रामीण महिलाओं ने स्व-सहायता समूहों से पाई आर्थिक आज़ादी, हर माह ₹20-25 हज़ार की कमाई
सारांश
मुख्य बातें
लखपति दीदी योजना के तहत मध्य प्रदेश के नीमच जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ी ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं। कभी घर की दहलीज़ तक सीमित रहने वाली ये महिलाएं आज आटा चक्की, डेयरी फार्मिंग, पत्तल-दोना निर्माण और किराना व्यवसाय जैसे उद्यमों के ज़रिए अपने परिवारों की आर्थिक रीढ़ बन चुकी हैं। 17 सितंबर 2026 को, जब देशभर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मनाया जा रहा था, नीमच की इन लाभार्थी महिलाओं ने योजना के प्रति अपना आभार व्यक्त किया।
स्व-सहायता समूहों की भूमिका और ऋण की राह
नीमच जिले के गाँवों में एनआरएलएम के तहत गठित स्व-सहायता समूहों ने महिलाओं को आरएफ (रिज़र्व फंड), सीआईएफ (कस्टमर इन्फॉर्मेशन फाइल) और सीसीएल (कैश क्रेडिट लिमिट) जैसे वित्तीय साधनों से जोड़ा। इन ऋण सुविधाओं के ज़रिए महिलाओं ने छोटे-छोटे उद्यम खड़े किए और धीरे-धीरे उनका विस्तार किया। ग्राम कराड़िया महाराज की एक पंचायत में ही पहले जहाँ केवल 5 समूह सक्रिय थे, आज वहाँ 36 समूह काम कर रहे हैं — यह संख्या स्वयं इस पहल की ज़मीनी सफलता बयान करती है।
लाभार्थियों की ज़ुबानी — बदलती ज़िंदगियाँ
रागिनी कुंवर राजपूत, जो किसान सहेली स्व-सहायता समूह से जुड़ी हैं, ने बताया कि समूह से ऋण मिलने के बाद उन्होंने पहले कपड़े की दुकान खोली और फिर पत्तल-दोना निर्माण की मशीन लगाई। उनके अनुसार, इस रोज़गार ने न सिर्फ उनकी अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी, बल्कि उन्होंने गाँव में नए समूह बनाकर अन्य महिलाओं को भी इससे जोड़ा। उनके समूह को अब तक ₹6 लाख तक का ऋण स्वीकृत हो चुका है।
दीपिका बागड़ी (ग्राम पंचायत कराड़िया महाराज) ने बताया कि वे वर्ष 2020 में खाटूश्याम स्व-सहायता समूह से जुड़ीं, जिसमें 13 महिलाएं शामिल हैं। समूह को ₹9 लाख का ऋण मिला, जो ज़रूरतमंद महिलाओं में बाँटा गया। इसके बाद ₹1 लाख का अलग ऋण लेकर उन्होंने डेयरी फार्म शुरू किया। सीसीएल के ज़रिए उनके समूह को चरणबद्ध तरीके से ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹12 लाख तक का ऋण मिल चुका है।
रंजना कुंवर राणावत, जो शिव शक्ति स्व-सहायता समूह की सदस्य हैं, अब हर माह ₹20,000 से ₹25,000 तक की कमाई कर रही हैं। उनके समूह में 10 सदस्य हैं और हाल ही में ₹6 लाख का ऋण मिला, जिससे उन्होंने कॉस्मेटिक, बच्चों के कपड़े, लेडीज़ सामान और जनरल स्टोर का व्यवसाय शुरू किया। उनके अनुसार, पहले ₹500-1,000 खर्च करने के लिए भी सोचना पड़ता था, आज वे परिवार को आर्थिक सहारा दे रही हैं।
ओमकारी साल्वी (ग्राम कराड़िया महाराज) ने बताया कि समूह से शुरू में ₹30,000, फिर ₹60,000 की सहायता मिली और अब ₹6 लाख स्वीकृत हो रहे हैं। उन्होंने किराना, मनिहारी (चूड़ियाँ), कपड़े और जूते-चप्पल की होलसेल दुकान खोली है और एनआरएलएम के ज़रिए सिलाई का प्रशिक्षण लेकर सिलाई कार्य भी कर रही हैं।
मोनिका कुंवर की कहानी — परिवर्तन की मिसाल
मोनिका कुंवर, जो नीमच जिले के ग्राम सरवानियाबोर की रहने वाली हैं और नर्मदा स्व-सहायता समूह से जुड़ी हैं, ने बताया कि समूह से जुड़ने से पहले वे एक सामान्य गृहिणी थीं। रोज़गार मिलने के बाद उनकी पारिवारिक और आर्थिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है।
व्यापक असर और आगे की राह
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब ग्रामीण महिला रोज़गार के आँकड़े राष्ट्रीय बहस का केंद्र बने हुए हैं। नीमच जैसे छोटे जिलों में स्व-सहायता समूह मॉडल की सफलता यह दर्शाती है कि वित्तीय समावेशन और कौशल प्रशिक्षण को एक साथ जोड़ा जाए तो ग्रामीण महिलाओं की आय में ठोस बदलाव संभव है। गौरतलब है कि एनआरएलएम के तहत स्व-सहायता समूहों की यह संरचना न सिर्फ ऋण उपलब्ध कराती है, बल्कि समूह की सामूहिक ज़िम्मेदारी महिलाओं को व्यावसायिक अनुशासन भी सिखाती है। आने वाले समय में इन समूहों का विस्तार और ऋण सीमा में वृद्धि इस मॉडल को और सुदृढ़ करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है।