मध्य प्रदेश में एग्रीवोल्टाइक ऊर्जा के लिए इंडो-जर्मन एमओयू, किसानों को मिलेगी खेती के साथ सौर आय
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश सरकार ने 15 जून 2025 को कृषि भूमि पर सौर ऊर्जा उत्पादन को एकसाथ बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। राज्य के नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग, ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड और जर्मन सरकार समर्थित इंडो-जर्मन एग्री वोल्टाइक सहयोग परियोजना (आईजीसीए) के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। भोपाल में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री मोहन यादव विशेष रूप से उपस्थित रहे।
एग्रीवोल्टाइक क्या है और यह क्यों अहम है
एग्रीवोल्टाइक एक ऐसी अवधारणा है जिसमें कृषि भूमि पर खेती के साथ-साथ उसी खेत में सोलर पैनल लगाकर सौर ऊर्जा उत्पादन किया जाता है। इससे अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता नहीं रहती, खाद्य सुरक्षा बनी रहती है और भूमि संबंधी विवादों से भी बचा जा सकता है। यह मॉडल यूरोप सहित कई देशों में सफलतापूर्वक लागू हो चुका है।
एमओयू के तहत क्या होगा
इस साझेदारी के अंतर्गत आईजीसीए द्वारा राज्य में एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं की पहचान, तकनीकी एवं आर्थिक मूल्यांकन, डिज़ाइन, वित्तीय व्यवहार्यता और क्रियान्वयन में सहयोग प्रदान किया जाएगा। किसानों, किसान उत्पादक संगठनों, ऊर्जा विकासकर्ताओं, वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) और अन्य संबंधित हितधारकों के लिए क्षमता निर्माण एवं जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। यह गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापन मई 2030 तक प्रभावी रहेगा।
किसानों को क्या फायदा मिलेगा
सरकार की ओर से दावा किया गया है कि एग्री सौर पीवी के तहत किसानों को सब्सिडी दी जाएगी। किसान अपनी जमीन के मालिकाना हक बनाए रखते हुए खेती करते रहेंगे और उसी खेत में सोलर पैनल से सौर ऊर्जा उत्पादन कर अतिरिक्त आय भी अर्जित करेंगे। यह पहल पीएम-कुसुम 2.0 सहित अन्य केंद्रीय योजनाओं के अनुरूप है और जलवायु-अनुकूल ग्रामीण विकास को भी गति देगी।
नीतिगत एवं नियामक ढाँचे पर ज़ोर
आईजीसीए राज्य में कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा को संरक्षित रखते हुए उपयुक्त नीतिगत एवं नियामक ढाँचा विकसित करने में भी सहयोग करेगी। भूमि उपयोग दक्षता सुधारने और उत्पादित ऊर्जा की सुरक्षा सुदृढ़ करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। यह पहल मध्य प्रदेश को एग्रीवोल्टाइक क्षेत्र में अग्रणी राज्यों की श्रेणी में लाने का प्रयास है।
आगे की राह
एमओयू पर हस्ताक्षर के बाद अब राज्य सरकार और जर्मन सहयोगी मिलकर पायलट परियोजनाओं की पहचान करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्रियान्वयन सुचारू रहा, तो मध्य प्रदेश के किसानों के लिए यह मॉडल आय के एक स्थायी वैकल्पिक स्रोत के रूप में उभर सकता है।