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एग्री-वोल्टाइक MOU पर उमंग सिंघार का हमला: 'मोहन सरकार विदेशी मॉडल की अंधी नकल कर रही'

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एग्री-वोल्टाइक MOU पर उमंग सिंघार का हमला: 'मोहन सरकार विदेशी मॉडल की अंधी नकल कर रही'

सारांश

मध्य प्रदेश में इंडो-जर्मन एग्री-वोल्टाइक MOU पर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सवाल उठाए — 70% छोटे किसानों के लिए व्यावहारिकता शून्य, बिजली खरीद और भुगतान का कोई ठोस ढाँचा नहीं, और विदेशी मॉडल की 'अंधी नकल' का आरोप।

मुख्य बातें

मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम और इंडो-जर्मन एग्री-वोल्टाइक सहयोग परियोजना के बीच 16 जून को MOU हस्ताक्षरित।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का आरोप — योजना से किसानों को नहीं, बड़ी निजी कंपनियों को फायदा।
MP के 70% से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है।
सिंघार ने ग्रामीण बिजली वितरण नेटवर्क की कमज़ोरी और बिजली खरीद तंत्र की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए।
सरकार ने अब तक आरोपों का आधिकारिक खंडन नहीं किया; परियोजना क्रियान्वयन की रूपरेखा बाकी।

मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 16 जून को राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला, जब मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम और जर्मन सरकार समर्थित इंडो-जर्मन एग्री-वोल्टाइक सहयोग परियोजना के बीच एग्रो सौर ऊर्जा उत्पादन को लेकर एक MOU पर हस्ताक्षर हुए। सिंघार का आरोप है कि यह करार किसानों के हित में नहीं, बल्कि बड़ी निजी कंपनियों के फायदे के लिए है।

क्या है एग्री-वोल्टाइक परियोजना

राज्य के नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग और ऊर्जा विकास निगम ने जर्मन सरकार समर्थित इंडो-जर्मन एग्री-वोल्टाइक सहयोग परियोजना के साथ यह MOU किया है। इस मॉडल में किसान अपने खेतों में सोलर पैनल लगाकर पारंपरिक खेती के साथ-साथ सौर ऊर्जा उत्पादन भी कर सकते हैं — यह अवधारणा यूरोप में प्रचलित है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार इसे किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में एक कदम बता रही है। हालाँकि, सरकार की ओर से इस MOU की विस्तृत शर्तों पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

सिंघार के सवाल: छोटे किसान कैसे उठाएँगे फायदा

सिंघार ने कहा कि मध्य प्रदेश के 70 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। उनका तर्क है कि इतने छोटे खेतों में सोलर पैनल लगाने के बाद ट्रैक्टर चलाना और फसल की कटाई करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाएगा।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली वितरण व्यवस्था, सब-स्टेशन और ट्रांसमिशन नेटवर्क की जो मौजूदा हालत है, उसमें किसान बिजली तो बना लेगा — लेकिन खरीदेगा कौन और भुगतान कब होगा? उन्होंने कहा, 'किसान को घोषणाएँ नहीं, जमीन पर काम और उनकी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप नीति चाहिए।'

विदेशी मॉडल की 'अंधी नकल' का आरोप

सिंघार ने आरोप लगाया कि मोहन यादव सरकार विदेशी मॉडल की आँख मूँदकर नकल कर रही है, 'बिना यह समझे कि मध्यप्रदेश का किसान जर्मनी की प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि जमीन की वास्तविक परिस्थितियों में खेती करता है।' उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार का पैटर्न स्पष्ट है — किसानों को सपने दिखाओ, संसाधनों को निजी हाथों में सौंपो और फायदा बड़े उद्योगपतियों को पहुँचाओ।

राजनीतिक संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब मध्य प्रदेश में कृषि संकट और बिजली आपूर्ति की समस्याएँ लगातार चर्चा में हैं। गौरतलब है कि एग्री-वोल्टाइक मॉडल को लेकर देश के कई राज्यों में प्रयोग हुए हैं, लेकिन छोटे किसानों के लिए इसकी व्यावहारिकता पर विशेषज्ञों में मतभेद बने हुए हैं।

आलोचकों का कहना है कि बिना मजबूत बिजली खरीद समझौते (PPA) और पारदर्शी भुगतान तंत्र के, ऐसी योजनाएँ कागजों तक सीमित रह जाती हैं। सरकार की ओर से अभी तक इन आरोपों का कोई खंडन सामने नहीं आया है।

आगे क्या

MOU पर हस्ताक्षर के बाद अब परियोजना के क्रियान्वयन की रूपरेखा तय होनी बाकी है। विपक्ष ने माँग की है कि सरकार यह स्पष्ट करे कि इस परियोजना से प्रत्यक्ष रूप से कितने किसानों को लाभ मिलेगा, भुगतान का तंत्र क्या होगा और छोटे किसानों के लिए क्या विशेष प्रावधान किए जाएँगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन वहाँ बड़े जोत वाले किसान और मजबूत ग्रिड बुनियादी ढाँचा है। मध्य प्रदेश में जहाँ 70% किसान दो हेक्टेयर से कम जमीन पर निर्भर हैं और ग्रामीण ट्रांसमिशन नेटवर्क अभी भी कमज़ोर है, वहाँ बिना ठोस बिजली खरीद समझौते और भुगतान तंत्र के यह MOU महज एक इरादे की घोषणा बनकर रह सकता है। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि किसान को उत्पादित बिजली का भुगतान कब, कैसे और कितना मिलेगा — वरना यह योजना किसान की जमीन पर कॉर्पोरेट के सौर संयंत्र लगाने का रास्ता बन सकती है।
RashtraPress
1 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंडो-जर्मन एग्री-वोल्टाइक सहयोग परियोजना क्या है?
यह जर्मन सरकार समर्थित एक परियोजना है जिसमें किसान अपने खेतों में सोलर पैनल लगाकर पारंपरिक खेती के साथ-साथ सौर ऊर्जा भी उत्पादित कर सकते हैं। मध्य प्रदेश के नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग और ऊर्जा विकास निगम ने 16 जून को इस परियोजना के साथ MOU पर हस्ताक्षर किए।
उमंग सिंघार ने इस MOU पर क्या आपत्ति जताई?
सिंघार का कहना है कि MP के 70% से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है, ऐसे में सोलर पैनल लगने के बाद खेती करना व्यावहारिक नहीं होगा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि किसान द्वारा उत्पादित बिजली खरीदेगा कौन और भुगतान का तंत्र क्या होगा।
क्या मध्य प्रदेश सरकार ने इन आरोपों का जवाब दिया?
अभी तक मोहन यादव सरकार की ओर से सिंघार के आरोपों का कोई आधिकारिक खंडन या स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। परियोजना के क्रियान्वयन की विस्तृत रूपरेखा भी अभी जारी नहीं हुई है।
एग्री-वोल्टाइक मॉडल छोटे किसानों के लिए क्यों चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है?
छोटे खेतों में सोलर पैनल की स्थापना के बाद ट्रैक्टर चलाने और फसल कटाई के लिए पर्याप्त जगह नहीं बचती। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली ग्रिड और ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमज़ोर स्थिति के कारण उत्पादित बिजली की बिक्री और समय पर भुगतान सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती है।
विपक्ष ने सरकार से क्या माँगें रखी हैं?
विपक्ष ने माँग की है कि सरकार स्पष्ट करे कि इस परियोजना से प्रत्यक्ष रूप से कितने किसानों को लाभ मिलेगा, बिजली खरीद का तंत्र क्या होगा, भुगतान की समयसीमा क्या होगी और छोटे-सीमांत किसानों के लिए क्या विशेष प्रावधान किए जाएँगे।
राष्ट्र प्रेस
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