24 अक्टूबर 2026
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उज्जैन: महाकालेश्वर मंदिर में त्रयोदशी पर भव्य भस्म आरती, त्रिपुंड-चंद्र-शेषनाग से सजे बाबा महाकाल

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उज्जैन: महाकालेश्वर मंदिर में त्रयोदशी पर भव्य भस्म आरती, त्रिपुंड-चंद्र-शेषनाग से सजे बाबा महाकाल

सारांश

उज्जैन में आश्विन शुक्ल त्रयोदशी की भोर बाबा महाकाल के अलौकिक दर्शन लेकर आई — त्रिपुंड, चंद्र और शेषनाग से सुसज्जित महाकाल की भस्म आरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से पूरा परिसर गूंज उठा।

मुख्य बातें

श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन में 24 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी पर भव्य भस्म आरती संपन्न हुई।
बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिपुंड, चंद्र और शेषनाग अर्पित कर आभूषणों से दिव्य शृंगार किया गया।
महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा के अनुसार भस्म आरती संपन्न; कपाट खुलने पर जलाभिषेक व पंचामृत अभिषेक किया गया।
रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु कतारबद्ध रहे; दर्शन के बाद परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गूंज उठा।
ढोल-नगाड़े, झांझ-मंजीरे और शंखनाद की मंगल ध्वनि के बीच पूरा अनुष्ठान संपन्न हुआ।

उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर में 24 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के पावन अवसर पर बाबा महाकाल की भव्य भस्म आरती संपन्न हुई। तड़के सवेरे शुरू हुए इस अलौकिक अनुष्ठान के दर्शन के लिए रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर में कतारबद्ध हो गए थे।

कपाट खुलने का विधान

शनिवार की भोर में परंपरागत विधि-विधान के अनुसार भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के उपरांत ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच बाबा महाकाल के कपाट खोले गए। कपाट खुलते ही मंत्रोच्चार के बीच जलाभिषेक किया गया और तत्पश्चात दूध, दही, घी, शहद तथा फलों के रस से निर्मित पंचामृत से अभिषेक संपन्न हुआ।

दिव्य शृंगार और भस्म आरती

पूजन के क्रम में प्रथम घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर की आरती के पश्चात बाबा महाकाल ने मुकुट धारण किया। इसके बाद बाबा महाकाल के मस्तक पर त्रिपुंड, चंद्र और शेषनाग अर्पित किए गए तथा उन्हें विविध आभूषणों से सुसज्जित किया गया। झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद की मंगल ध्वनि के बीच भस्म आरती का यह अनुष्ठान संपन्न हुआ।

महानिर्वाणी अखाड़े की परंपरा

परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म अर्पित किए जाने के पश्चात बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। यह परंपरा सदियों से अनवरत रूप से चली आ रही है और इसे ज्योतिर्लिंग की विशिष्ट आराधना-पद्धति माना जाता है।

श्रद्धालुओं की उपस्थिति

भस्म आरती और दिव्य शृंगार के दर्शन के उपरांत मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के उद्घोष से गूंज उठा। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार की अनुगूंज में वातावरण भक्तिमय हो गया। अपने आराध्य देव के दर्शन के लिए रात से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु उज्जैन की पावन नगरी पहुँचे और दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस किया। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की आस्था आज भी लाखों भक्तों के हृदय में उतनी ही जीवंत है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह उज्जैन की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का केंद्रबिंदु है, जो हर तिथि पर हज़ारों श्रद्धालुओं को देशभर से खींचती है। यह उल्लेखनीय है कि महाकाल लोक के विस्तार के बाद से मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो धार्मिक पर्यटन की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाती है। महानिर्वाणी अखाड़े की सदियों पुरानी परंपरा और आधुनिक प्रबंधन व्यवस्था के बीच सामंजस्य ही इस ज्योतिर्लिंग की अखंड आस्था को जीवित रखता है।
RashtraPress
24 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती क्या होती है?
भस्म आरती श्री महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन का सबसे प्रमुख और अलौकिक अनुष्ठान है, जिसमें बाबा महाकाल को भस्म अर्पित की जाती है। मान्यता है कि भस्म चढ़ाने के बाद भगवान महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
भस्म आरती में भाग लेने के लिए कब और कैसे पहुँचें?
भस्म आरती प्रतिदिन तड़के सवेरे आयोजित होती है और इसके लिए श्रद्धालु रात से ही कतार में लग जाते हैं। उज्जैन पहुँचकर मंदिर प्रशासन की वेबसाइट या काउंटर से ऑनलाइन या ऑफलाइन पास प्राप्त किया जा सकता है।
24 अक्टूबर को कौन-सी तिथि थी और इसका क्या महत्व है?
24 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी थी, जो धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पावन मानी जाती है। इस तिथि पर महाकालेश्वर में विशेष शृंगार और भस्म आरती की जाती है, जिसमें श्रद्धालुओं की भागीदारी विशेष रूप से अधिक रहती है।
बाबा महाकाल का दिव्य शृंगार कैसे किया जाता है?
पूजन विधि के अनुसार जलाभिषेक और पंचामृत अभिषेक के बाद बाबा महाकाल को मुकुट, त्रिपुंड, चंद्र और शेषनाग अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद विविध आभूषणों से उनका दिव्य शृंगार किया जाता है।
भस्म आरती की परंपरा कौन निभाता है?
परंपरा के अनुसार महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित की जाती है। यह सदियों पुरानी परंपरा अनवरत रूप से चली आ रही है और इसे ज्योतिर्लिंग की विशिष्ट आराधना-पद्धति के रूप में मान्यता प्राप्त है।
राष्ट्र प्रेस
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