महाकालेश्वर भस्म आरती: ज्येष्ठ अधिकमास पूर्णिमा पर जटाधारी स्वरूप, मखाने की माला से दिव्य श्रृंगार
सारांश
मुख्य बातें
उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में 30 मई को ज्येष्ठ अधिकमास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर अलौकिक भस्म आरती का आयोजन हुआ, जिसमें देश-विदेश से आए हज़ारों श्रद्धालु शामिल हुए। इस विशेष अवसर पर भगवान महाकाल को जटाधारी स्वरूप में सजाया गया और मखाने की माला से उनका विशेष श्रृंगार किया गया। अधिकमास पूर्णिमा के संयोग ने इस आरती के धार्मिक महत्व को और भी गहरा कर दिया।
भस्म आरती का क्रम और परंपरा
परंपरा के अनुसार, वीरभद्र से आज्ञा लेकर शनिवार तड़के मंदिर के कपाट खोले गए। सर्वप्रथम भगवान महाकाल को शुद्ध जल से स्नान कराया गया, तत्पश्चात दूध, दही, घी, शक्कर और शहद से निर्मित पंचामृत से अभिषेक किया गया। गर्भगृह में मंत्रोच्चार के बीच पूरा वातावरण शिवमय हो उठा।
जटाधारी स्वरूप और मखाने की माला
विशेष अभिषेक के उपरांत बाबा महाकाल को जटाधारी स्वरूप में अलंकृत किया गया। उनके मस्तक पर प्रतीकात्मक त्रिनेत्र बनाया गया और मखाने की विशेष माला पहनाई गई। इसके बाद महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा को भस्म अर्पित की गई। शंख, डमरू और घंटियों की गूंज से मंदिर परिसर का वातावरण दिव्य और आध्यात्मिक हो गया।
भस्म का महत्व और तैयारी की विधि
भस्म संसार की नश्वरता का प्रतीक मानी जाती है — यह संदेश देती है कि सब कुछ अंततः राख हो जाता है, जिससे भक्तों को अहंकार त्यागने की प्रेरणा मिलती है। मान्यता है कि पूर्व में चिता की भस्म का उपयोग होता था, किंतु अब परंपरा के अनुसार भस्म कपिला गाय के गोबर से बने कंडों और शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलताश तथा बेर की पवित्र लकड़ियों को जलाकर तैयार की जाती है। आरती के समय महिलाएँ परंपरानुसार घूंघट में रहकर दर्शन लाभ लेती हैं।
अधिकमास पूर्णिमा का विशेष संयोग
ज्येष्ठ अधिकमास की पूर्णिमा होने के कारण इस दिन का धार्मिक महत्व सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक माना गया। देर रात से ही श्रद्धालुओं की लंबी पंक्तियाँ मंदिर के बाहर लग गई थीं। हर ओर भक्ति और आस्था का अपूर्व वातावरण था। आने वाले पर्वों पर भी इसी तरह विशेष श्रृंगार की परंपरा जारी रहने की संभावना है।