महुआ मोइत्रा ने सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एफआईआर की माँग की, एसआईआर प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
तृणमूल कांग्रेस (TMC) सांसद महुआ मोइत्रा ने 24 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर एफआईआर दर्ज करने और जाँच की माँग की है। कृष्णानगर से सांसद मोइत्रा का यह कदम चुनाव आयोग के आंतरिक कामकाज को लेकर देश में जारी व्यापक बहस के बीच आया है।
शिकायत में क्या है
थाने के एसएचओ को संबोधित पत्र में मोइत्रा ने पुलिस से मामला दर्ज करने, कथित अपराधों की जाँच करने और सभी संलिप्त व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट करने की माँग की। उन्होंने दोनों चुनाव आयुक्तों समेत संबंधित गवाहों से पूछताछ और साक्ष्यों को बिना देरी सुरक्षित करने का भी अनुरोध किया।
मोइत्रा ने अपनी शिकायत में लिखा, 'मुख्य चुनाव आयुक्त को अपने दोनों सहयोगियों की दर्ज राय के खिलाफ आयोग की ओर से काम करने का अधिकार नहीं है। उन्हें आयोग के नाम से ऐसे संदेश या आदेश जारी करने का भी कोई अधिकार नहीं है, जिन्हें आयोग ने कभी मंजूरी ही न दी हो।'
संवैधानिक और कानूनी आधार
मोइत्रा ने अपने आरोपों को कानूनी ढाँचे से जोड़ा। उनके अनुसार, यदि कोई दस्तावेज इस प्रकार तैयार किया जाए कि वह भारत निर्वाचन आयोग के अधिकार से जारी लगे, जबकि वास्तव में ऐसा न हो, तो वह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 335 के तहत फर्जी दस्तावेज की श्रेणी में आता है। उन्होंने कहा कि ऐसा दस्तावेज बनाना धारा 336 के तहत जालसाजी और उसे असली के रूप में इस्तेमाल करना धारा 340(2) के तहत दंडनीय है।
मोइत्रा ने यह भी दावा किया कि मतदाता सूची एक सार्वजनिक रजिस्टर है और यदि किसी जीवित व अपने पते पर रह रहे मतदाता को आवश्यक सत्यापन के बिना जानबूझकर अनुपस्थित, स्थानांतरित या मृत बताया जाता है, तो यह उस रजिस्टर में जालसाजी है। उनके अनुसार, ऐसी प्रत्येक प्रविष्टि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत एक अलग अपराध है।
एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल
मोइत्रा ने आरोप लगाया कि निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म-6 में बदलाव किया गया और मतदाताओं से पुरानी मतदाता सूचियों के जरिये अपने माता-पिता से जुड़ी जानकारी साबित करने को कहा गया, जबकि इसके लिए नियमों में संबंधित संशोधन नहीं किए गए। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य स्तर के चुनाव अधिकारियों को मतदाता सूचियों तक पूरी पहुँच नहीं दी गई।
गौरतलब है कि मीडिया रिपोर्टों के हवाले से मोइत्रा ने दावा किया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना और उनकी राय के विपरीत लिए जा रहे फैसलों पर कई बार आपत्ति जताई थी। आयोग के भीतर दोनों चुनाव आयुक्तों से मतदाता सूचियों की निगरानी की जिम्मेदारी हटाए जाने का मुद्दा भी शिकायत में उठाया गया है।
राजनीतिक संदर्भ
यह शिकायत ऐसे समय में आई है जब विपक्षी दल चुनाव आयोग की स्वायत्तता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) पहले से ही पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया का विरोध करती रही है। मोइत्रा की यह कार्रवाई उस विरोध को संसदीय स्तर से कानूनी मैदान में ले जाने की कोशिश मानी जा रही है।
आगे क्या होगा
अभी तक पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन की ओर से इस शिकायत पर एफआईआर दर्ज होने या न होने की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। चुनाव आयोग ने भी मोइत्रा के आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले शिकायत की प्रारंभिक जाँच कर सकती है। यह मामला संवैधानिक संस्थाओं और उनके आंतरिक निर्णय-तंत्र पर एक बड़ी बहस को जन्म दे सकता है।