24 सितंबर 2026
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग, मनीष तिवारी ने जेपीसी जांच की भी उठाई आवाज़

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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग, मनीष तिवारी ने जेपीसी जांच की भी उठाई आवाज़

सारांश

चुनाव आयोग के भीतर से उठे असहमति के सुरों को कांग्रेस ने बड़ा हथियार बना लिया है। मनीष तिवारी का आरोप है कि SIR से 13 करोड़ लोगों का मताधिकार छिना — और CEC के फैसले बहुमत के बिना लिए गए, जो संवैधानिक दृष्टि से अवैध हैं। मामला संसद तक पहुँच सकता है।

मुख्य बातें

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 24 सितंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की।
तिवारी ने चुनाव आयोग (ECI) के कामकाज की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) गठित करने की भी मांग उठाई।
उनका दावा है कि SIR प्रक्रिया के कारण कथित तौर पर लगभग 13 करोड़ लोगों को मतदाता सूची से हटाया गया — हालाँकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
तिवारी ने 1993 के सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय का हवाला दिया जिसके अनुसार चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए।
ECI ने अब तक इन आरोपों पर कोई स्पष्ट आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने 24 सितंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की और चुनाव आयोग (ECI) के कामकाज की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) गठित करने की अपील की। यह मांग उन खबरों के बीच आई है जिनमें कहा जा रहा है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े फैसलों पर चुनाव आयोग के भीतर ही आपत्तियाँ दर्ज की गई थीं।

मुख्य आरोप और संवैधानिक तर्क

तिवारी ने दावा किया कि यदि दो चुनाव आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों से असहमत थे, तो वे फैसले कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से अवैध ठहरते हैं। उन्होंने इस सिलसिले में 1993 के उस ऐतिहासिक प्रसंग का हवाला दिया जब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनाव आयुक्त जीवीके कृष्णमूर्ति और सरदार मनोहर सिंह गिल की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

उन्होंने कहा, "उस समय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि जो भी होगा, वह पूरी सहमति के बाद होना चाहिए या अगर सहमति नहीं बनती है तो फैसला बहुमत से होना चाहिए।" उनके अनुसार, इस स्थापित सिद्धांत की अनदेखी कर लिए गए निर्णय संवैधानिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते।

SIR और मताधिकार पर गंभीर आरोप

तिवारी ने यह भी दावा किया कि SIR प्रक्रिया के कारण कथित तौर पर लगभग 13 करोड़ लोगों को मतदाता सूची से हटाया गया है। उन्होंने इसे 'दुनिया का सबसे बड़ा मताधिकार छीनने का मामला' करार दिया।

उन्होंने कहा, "हटाए गए लोगों की संख्या कई देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। यह एक अभूतपूर्व और अत्यंत गंभीर स्थिति है।" हालाँकि इन आँकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अभी तक नहीं हुई है और यह तिवारी का दावा है।

ECI की प्रतिक्रिया पर सवाल

तिवारी ने कहा कि इस खुलासे के बाद चुनाव आयोग ने न तो आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज किया और न ही संतोषजनक स्पष्टीकरण दिया। उन्होंने इसे 'अजीब' रवैया बताया और कहा कि इस बार सवाल 'बाहर' से नहीं बल्कि संस्था के 'भीतर' से उठे हैं, जो इस मामले को और अधिक गंभीर बनाता है।

उन्होंने स्पष्ट किया, "अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते, तो संसद को जेपीसी के जरिए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली की जांच करनी चाहिए।"

लोकतांत्रिक व्यंग्य और अन्य मुद्दे

इसके अलावा, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की उपस्थिति वाले एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री पर उठे विवाद पर तिवारी ने कहा कि व्यंग्य लोकतांत्रिक विमर्श का अनिवार्य अंग है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता के आसपास से ही भारतीय लोकतंत्र में व्यंग्य की परंपरा रही है, हालाँकि इसकी एक 'सीमा और मर्यादा' होनी चाहिए।

पंजाब में नशे की समस्या से जुड़ी आत्महत्याओं पर बोलते हुए तिवारी ने आरोप लगाया कि 1995 में पंजाब में आतंकवाद पर काबू पाने के बाद पाकिस्तान ने भारत की युवा पीढ़ी को नशे की लत में धकेलकर उन्हें कमज़ोर करने की रणनीति अपनाई। यह उनका राजनीतिक आकलन है।

आगे क्या

चुनाव आयोग ने अब तक इन मांगों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। राजनीतिक हलकों में यह मामला तेज़ी से बहस का केंद्र बन रहा है और संभव है कि विपक्षी दल संसद में भी इस मुद्दे को उठाएँ।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इस बार तिवारी का तर्क एक अलग वज़न रखता है — असहमति बाहर से नहीं, संस्था के भीतर से आई बताई जा रही है। 1993 का सुप्रीम कोर्ट का हवाला कानूनी रूप से ठोस है, परंतु असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष इसे संसदीय मंच पर साक्ष्य आधारित तरीके से आगे ले जा पाएगा या यह महज राजनीतिक बयानबाज़ी तक सिमट जाएगा। 13 करोड़ मतदाताओं के हटाए जाने का दावा अत्यंत गंभीर है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि के बिना इस संख्या को तथ्य मानना जल्दबाज़ी होगी। चुनाव आयोग की चुप्पी इस विवाद को शांत करने की बजाय और हवा दे रही है।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मनीष तिवारी ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग क्यों की?
तिवारी का तर्क है कि यदि दो चुनाव आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त के SIR संबंधी फैसलों से असहमत थे, तो वे फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के बिना लिए गए और इसलिए संवैधानिक दृष्टि से अवैध हैं। उन्होंने 1993 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला दिया जिसमें यह सिद्धांत स्थापित किया गया था।
JPC जांच की मांग क्या है और यह क्यों ज़रूरी बताई जा रही है?
संयुक्त संसदीय समिति (JPC) एक संसदीय जांच निकाय होती है जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के सदस्य होते हैं। तिवारी का कहना है कि ECI के भीतर से उठे सवालों की निष्पक्ष जांच के लिए JPC ही सही मंच है, क्योंकि चुनाव आयोग ने खुद इन आरोपों पर संतोषजनक जवाब नहीं दिया।
SIR क्या है और इस पर विवाद क्यों है?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चुनाव आयोग की वह प्रक्रिया है जिसके तहत मतदाता सूचियों की विशेष समीक्षा की जाती है। विवाद इस बात पर है कि कथित तौर पर इस प्रक्रिया के दौरान लिए गए फैसलों पर आयोग के भीतर असहमति थी और तिवारी का दावा है कि इससे करीब 13 करोड़ मतदाताओं को सूची से हटाया गया।
1993 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के बारे में क्या कहा था?
1993 में तत्कालीन CEC टीएन शेषन ने चुनाव आयुक्त जीवीके कृष्णमूर्ति और सरदार मनोहर सिंह गिल की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। तब अदालत ने कहा था कि चुनाव आयोग के फैसले पूरी सहमति से होने चाहिए या सहमति न बनने पर बहुमत से — और यही संवैधानिक आधार तिवारी अपनी मांग के लिए उद्धृत कर रहे हैं।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
तिवारी के अनुसार, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को न तो स्पष्ट रूप से खारिज किया और न ही संतोषजनक स्पष्टीकरण दिया। आधिकारिक स्तर पर ECI की ओर से अब तक कोई विस्तृत बयान सामने नहीं आया है।
राष्ट्र प्रेस
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