मन की बात में मोदी ने किया चोल ताम्र-पत्रों का जिक्र, नीदरलैंड से लौटी 11वीं सदी की अमूल्य धरोहर
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 मई 2026 को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में 11वीं सदी के चोल ताम्र-पत्रों की वापसी का उल्लेख किया, जिन्हें उनकी हालिया नीदरलैंड यात्रा के दौरान एक विशेष समारोह में भारत को सौंपा गया। इन पट्टिकाओं में 21 बड़ी और 3 छोटी ताम्र पट्टियाँ शामिल हैं, जो मुख्यतः तमिल भाषा में लिखी हुई हैं। मोदी ने कहा कि यह हर भारतीय के लिए गर्व और खुशी का पल है।
नीदरलैंड में कैसे हुई वापसी
प्रधानमंत्री मोदी ने 'मन की बात' में बताया कि यूरोप दौरे के दौरान नीदरलैंड में आयोजित एक विशेष समारोह में ये प्राचीन चोल ताम्र पट्टिकाएँ भारत को वापस सौंपी गईं। उन्होंने कहा, 'उस कार्यक्रम में नीदरलैंड के प्रधानमंत्री भी मौजूद थे।' मोदी ने यह भी बताया कि इन पट्टिकाओं को लेकर देश-विदेश से उन्हें लगातार संदेश मिल रहे हैं और दुनियाभर के तमिल समुदाय में विशेष उत्साह देखा जा रहा है।
ताम्र-पत्रों का ऐतिहासिक महत्व
मोदी के अनुसार ये ताम्र पट्टिकाएँ मुख्य रूप से राजा राजेंद्र चोला-प्रथम द्वारा अपने पिता राजा राजराजा चोला के एक वचन को पूरा करने से जुड़ी हैं। इनमें आनइमंगलम् गांव को एक बौद्ध विहार को दान देने का उल्लेख है। इन पट्टिकाओं में चोल वंश की उपलब्धियों के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ चोल साम्राज्य के संबंधों और उसकी समुद्री शक्ति का भी वर्णन मिलता है।
छत्तीसगढ़ में भी मिली दुर्लभ खोज
मोदी ने 'मन की बात' में एक और महत्वपूर्ण सूचना साझा की। उन्होंने बताया कि 'ज्ञान भारतम् अभियान' के तहत छत्तीसगढ़ के मल्हार में तीन दुर्लभ ताम्र पट्टिकाएँ मिली हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये पांडुवंशी राजवंश के महर्षि बालार्जुन के शासनकाल से जुड़ी हैं और छठी-सातवीं सदी की मानी जा रही हैं। ये पट्टिकाएँ प्राचीन ब्राह्मी लिपि और पाली भाषा में लिखी गई हैं, जिनसे तत्कालीन शासन-व्यवस्था, धर्म और संस्कृति की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण पर सरकार का संकल्प
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि चोल साम्राज्य के समृद्ध इतिहास और संस्कृति पर सभी भारतीयों को गर्व है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार भारत की अमूल्य धरोहरों के संरक्षण और पुनर्प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयासरत है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भारत ने विदेशों से प्राचीन कलाकृतियाँ और धरोहरें वापस लाई हों — पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया से भी कई मूर्तियाँ और पुरावशेष भारत को लौटाए जा चुके हैं।